भारत में एक बहुत पुरानी मनोवैज्ञानिक बीमारी है—हमें ‘कीमत’ से ज्यादा ‘डिस्काउंट’ से प्यार है। दुकानदार अगर 500 रुपये की शर्ट पर “5000 रुपये” का टैग लगाकर, फिर उसे काटकर “1000 रुपये” में बेचे, तो हम घर आकर नाचते हैं कि “भाई, 4000 बचा लिए!” भले ही हमारी जेब से असलियत में 500 रुपये ज्यादा निकल गए हों।
आज भारत की कूटनीति उसी “ग्रेट इंडियन सेल” वाली मानसिकता का शिकार हो गई है।
बोरिंग था वो पुराना दौर!
बेचारे अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह… राजनीति के कितने कच्चे खिलाड़ी थे!
उनके दौर में अमेरिका हम पर सिर्फ 2.93% से 3.31% का टैक्स लगाता था। न कोई शोर, न कोई हंगामा, न कोई “डंका बजना”। सब कुछ कितना नीरस था! वो लोग चुपचाप व्यापार करते थे। उन्हें मार्केटिंग का यह मूल मंत्र पता ही नहीं था कि— “जनता को 3% की हकीकत मत दिखाओ, उन्हें 50% का डरा हुआ सपना दिखाओ, और फिर 18% पर लाकर कहो—देखो, हमने तुम्हें बचा लिया!”
गणित का नया ‘वर्जन’
आंकड़े पुराने जमाने की बातें हैं। अब ‘भावनाएं’ महत्वपूर्ण हैं।
2004: प्रतिबंधों के बावजूद 3.31% टैक्स। (इसे हम कूटनीति कहते थे।)
2014: परमाणु डील के बाद 2.93% टैक्स। (इसे हम अच्छे रिश्ते कहते थे।)
2026: 18% टैक्स। (इसे हम ‘ऐतिहासिक जीत’ कह रहे हैं।)
सोचिए, हम उस दौर में आ गए हैं जहाँ हम अपनी जेब से 6 गुना ज्यादा पैसा देकर खुश हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि अमेरिका ने हमारी पूरी जेब नहीं काटी। यह वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर कहे— “पैर काटना पड़ सकता था, लेकिन बधाई हो… हमने सिर्फ घुटने तोड़े हैं!” और मरीज अस्पताल में मिठाइयां बांट दे।
हताशा या मास्टरस्ट्रोक?
अमेरिका ने हमें कहा, “हम तुम पर 50% टैक्स लगाएंगे।”
हमने हाथ-पैर जोड़े, कूटनीति के घोड़े दौड़ाए और कहा, “प्रभु, थोड़ा कम कर लो।”
वे 18% पर मान गए।
और इधर मीडिया में हेडलाइन बन गई— “भारत ने अमेरिका को झुकाया!”
अरे भाई! अमेरिका झुका नहीं है, वो तो पहले से ही कुर्सी लगाकर बैठा था। हम जो पहले 3 रुपये देते थे, अब 18 रुपये देकर आ रहे हैं और गेट के बाहर आकर कह रहे हैं— “देखा? वो 50 मांग रहा था, मैंने अपनी शर्तों पर 18 दिए। मेरा जलवा है!”
निष्कर्ष
वाजपेयी और मनमोहन के दौर में हम ‘पार्टनर’ थे, इसलिए रियायत मिलती थी। आज हम ‘ग्राहक’ हैं, जिससे वसूली की जा रही है। लेकिन उदास मत होइए। जेब हल्की हुई तो क्या हुआ? ‘नैरेटिव’ तो भारी है!
जश्न मनाइए, क्योंकि 18% टैक्स अब नया ‘विकास’ है, और गणित… वो तो वैसे भी हार्डवर्ड ने नहीं दिया था!
लेखक – अश्विनी कुमार मिश्रा

