मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर है खजुराहो मंदिर। जहां 20 लाख से ज्यादा देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं। इसकी बाहरी दीवारों पर एक से बढ़कर एक प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। किसी में प्रेमिका से मिलने की खुशी झलक रही है, तो किसी में प्रेमी से बिछड़ने की टीस। किसी प्रतिमा में प्रेमी-प्रेमिका आलिंगन कर रहे हैं, तो किसी में सहवास की मुद्रा में हैं।
लोग मंदिर की दीवारों पर टकटकी लगाए देख रहे हैं। गाइड उन्हें मूर्तियों के बारे में समझा रहे हैं। इनमें अच्छी खासी संख्या में विदेशी टूरिस्ट भी हैं। मेरे मन में सवाल उठता है कि भगवान के मंदिर में कामुक मूर्तियां क्यों? धर्म और आस्था से इनका क्या कनेक्शन है?कहानी इसी खजुराहो मंदिर की…
खजुराहो मंदिर की बाहरी दीवारों पर बनी कामुक प्रतिमाएं। इनमें धर्म, अध्यात्म, समाज, जीवन, रिश्ते, श्रृंगार, प्रेम, गुस्सा और मानव जीवन की स्थितियां उकेरी गई हैं।
खजुराहो मंदिर करीब एक हजार साल पुराना है। यह यूनेस्को के वर्ल्ड हैरिटेज साइट की लिस्ट में शामिल है। यहां पहले 85 मंदिर थे। जिनमें से अभी सिर्फ 25 बचे हैं।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर कामुक प्रतिमाओं के साथ ही अप्सराएं, सुर-सुंदरियां और नाग कन्याओं की मूर्तियां उकेरी गई हैं। ऐसी मान्यता है कि अप्सराएं देवलोक की नर्तकी होती हैं और सुर-सुंदरियां देवताओं की सहायिका होती हैं। जबकि नाग कन्याएं सुरक्षा का प्रतीक हैं।
मंदिर से जुड़े चिन्मय मिश्र मुझे इसकी परंपरा के बारे में समझाते हैं। वे बताते हैं, ‘हिंदू धर्म में चार पुरुषार्थों का जिक्र है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। खजुराहो मंदिर में इन चारों का समन्वय है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर सृष्टि है। सृष्टि में जीना, मरना, यश, अपयश, योग, साधना, भोग-विलास सब है। इन सब से होते हुए इंसान को प्रभु की शरण यानी गर्भगृह में जाना है। आखिर यही तो संसार की सच्चाई है।’
मंदिर की दीवारों पर भगवान विष्णु की प्रतिमा। इस मंदिर में 20 लाख से भी ज्यादा देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं।
चिन्मय मिश्र बताते हैं, ‘ऐसा नहीं है कि किसी कलाकर के मन में कुछ आया और उसे मंदिर की दीवारों पर उकेर दिया। बहुत सोच-समझकर और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इसे तैयार किया गया है। इनमें धर्म, अध्यात्म, समाज, जीवन, रिश्ते, श्रृंगार, प्रेम, गुस्सा और मानव जीवन की स्थितियां उकेरी गई हैं।
सहवास करना या नहीं करना कोई पाप या पुण्य नहीं है। यह एक सामान्य प्रवृत्ति है। पशुओं में तो सहवास एकदम सहज और सामान्य है। इसमें कोई दोष नहीं है। दोष है आदमी की प्रवृत्ति और अतृप्ति में। इस मंदिर में लाखों मूर्तियां हैं। इनमें से महज 5% ही काम की मुद्रा में हैं। फिर भी लोग इस मंदिर को सिर्फ काम के प्रतीक के रूप में ही प्रचारित-प्रसारित करते हैं। यह ठीक नहीं है।’
खजुराहो मंदिर के धर्म और अध्यात्म के विषय में स्टडी करने वाले अनुराग शुक्ला बताते हैं, ‘ये प्रतिमाएं तांत्रिक साधना का प्रतीक भी हैं। जैसे एक प्रतिमा इड़ा पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी के संदर्भ में है। यह नाड़ियां शरीर को शक्तिशाली बनाने वाली एनर्जी क्रिएट करती हैं। इन्हें भौतिक रूप से नहीं देखा जा सकता। प्रतिमा के जरिए ही इन्हें जागृत किया जा सकता है।’
करीब एक हजार साल पुराना खजुराहो मंदिर। 950 से 1050 ईस्वी के दौरान चंदेल वंश के राजाओं ने इसका निर्माण कराया था।
मुख्य द्वार से 150 मीटर पश्चिम चलने पर मतंगेश्वर शिव मंदिर है। इस मंदिर की दीवारों पर कोई मूर्ति नहीं है। नीचे फर्श पर ऊबड़-खाबड़ पत्थर हैं। मतंगेश्वर मंदिर ही एक मात्र मंदिर है, जहां विधि-विधान से पूजा होती है।
बाकी मंदिरों में लोग दर्शन के लिए तो जाते हैं, लेकिन धूप-दीप नहीं जलाते, जल नहीं चढ़ाते हैं। क्योंकि इन सभी मंदिरों की मूर्तियां अपने वास्तिवक रूप में हैं। कोई साज-सज्जा और श्रृंगार नहीं किया गया है।
यहां का शिव विवाह उत्तर भारत में सबसे मशहूर है। पहले खजुराहो का राज परिवार ही शिव बाराती बनता था, लेकिन अब सभी श्रद्धालु शिव के बाराती बनते हैं।
महा शिवरात्रि के दिन शाम करीब 4 बजे नगर पालिका दफ्तर से बारात निकलती है। रास्ते में शोभायात्रा और झांकियां निकाली जाती हैं। फिर बारात मंदिर पहुंचती है। यहां मंत्रोच्चारण के साथ पंडित शिव-पार्वती विवाह कराते हैं।
मतंगेश्वर मंदिर का निर्माण 900 से 925 ईस्वी के बीच हुआ। ऐसी मान्यता है कि मतंग ऋषि के नाम पर इसका नाम मतंगेश्वर पड़ा।
गर्भगृह में करीब 9 फीट लंबा शिवलिंग है। ऐसा कहा जाता है कि यह 18 फीट जमीन के अंदर भी है। इसे मृत्युंजय शिवलिंग भी कहा जाता है। शिवलिंग के पास ही पुजारियों के बैठने का आसान हैं। भक्त आ रहे हैं और शिवलिंग से लिपटकर मन्नतें मांग रहे हैं। बेल पत्र और जल चढ़ा रहे हैं।
मान्यता है कि शिवलिंग के नीचे सोने की मणि है, जिसे भगवान शिव ने युधिष्ठिर को दिया था। युधिष्ठिर ने मणि मतंग ऋषि को दी और मतंग ऋषि ने चंदेल वंश के छठे राजा हर्षवर्मन को दी। राजा ने उस मणि को शिवलिंग की नींव में स्थापित करवाई। ऋषि मतंग के नाम पर ही इस मंदिर का नाम मतंगेश्वर पड़ा।
मंदिर के पास ही एक कुटिया है। जहां एक मूर्ति रखी है और उसके सामने एक झाड़ू रखा है। धूणा जल रहा है। यह मंदिर धूणे वाले बाबा के नाम से मशहूर है।
कहा जाता है कि पहले यहां एक बाबा रहते थे, जो झाड़ू से मारकर लोगों की मनोकामना पूरी करते थे। दो साल पहले उन्होंने समाधि ली। मतंगेश्वर भगवान के दर्शन के बाद भक्त इस कुटिया में जरूर आते हैं। महा शिवरात्रि और मौनी अमावस्या के दिन यहां हजारों श्रद्धालु जुटते हैं।
मतंगेश्वर मंदिर के गर्भगृह में करीब 9 फीट लंबा शिवलिंग है। ऐसा कहा जाता है कि यह 18 फीट जमीन के अंदर भी है।
यहां से करीब 500 मीटर आगे तालाब के पास से पश्चिमी द्वार के मंदिरों में जाने के लिए रास्ता है। उन मंदिरों में दर्शन के लिए टिकट लेना होता है। भारत के लोगों के लिए 40 रुपए का टिकट है। जबकि विदेश के लोगों के लिए 600 रुपए का।
सबसे पहले कंदारिया महादेव मंदिर है। इसका निमार्ण चंदेल राजा धंगदेव ने करवाया था। यह खजुराहो का सबसे बड़ा मंदिर है। 117 फीट ऊंचा और करीब उतना ही लंबा है। इसकी बाहरी दीवारों पर 646 मूर्तियां हैं। जबकि अंदर की दीवारों पर 226 मूर्तियां।
मंदिर में बिजली का कनेक्शन नहीं है, लेकिन बनावट ऐसी कि शाम में भी यहां रोशनी होती है। मुख्य द्वार पर एक तरफ गंगा और दूसरी तरफ यमुना की आकृति है। माना जाता है कि मंदिर में जाने से पहले इंसान का पवित्र होना जरूरी है। इसलिए यहां गंगा और यमुना की आकृति है। भक्त उन्हें स्पर्श करके ही मंदिर में प्रवेश करते हैं।
कंदारिया महादेव मंदिर का निमार्ण चंदेल राजा धंगदेव ने करवाया था। यह खजुराहो का सबसे बड़ा मंदिर है। 117 फीट ऊंचा और करीब उतना ही लंबा।
मैं जब पहुंची, तो गर्भगृह में अंधेरा था। जैसे ही मोबाइल का फ्लैश ऑन किया सफेद रंग का चांदी सा चमचमाता शिवलिंग दिखाई पड़ा। बाकी श्रद्धालु भी दर्शन के लिए मोबाइल का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। आमतौर पर शिवलिंग का ऊपरी भाग गोलाकार होता है, लेकिन यह शिवलिंग चौकोर है।
मंदिर के बगल में ही मां जगदंबा का मंदिर है। नवरात्र में पहले खजुराहो का राज परिवार माता की पूजा करता है, फिर श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के द्वार खोल दिए जाते हैं। मंदिर में एक जालीदार दरवाजे के पीछे सलेटी रंग की पत्थर की मां की प्रतिमा है। सिर पर कोई मुकुट नहीं, कोई साज-सज्जा और श्रृंगार नहीं।
इस मंदिर के पास ही लक्ष्मण मंदिर भी है। इसे चंदेल राजा यशोवर्मन ने करीब 960 ईस्वी में कालिंजर फोर्ट पर विजय पाने के बाद बनवाया था। आपको जानकर हैरानी होगी कि मंदिर का नाम लक्ष्मण है, लेकिन यहां राम के भाई लक्ष्मण की कोई मूर्ति नहीं है। यहां भगवान विष्णु की प्रतिमा है।
लक्ष्मण मंदिर चतुर्भुज मंदिर के रूप में जाना जाता है। यह लगभग 99 फीट लंबा और 46 फीट चौड़ा है।
इसी तरह पश्चिम भाग में विश्वनाथ मंदिर, वाराह मंदिर, लक्ष्मी जी का मंदिर और सूर्य मंदिर है। इन सभी मंदिरों की दीवारों पर ब्रह्मा, विष्णु, शिव और नवग्रह बने हैं। अनोखी शिल्पकारी की गई हैं। चबूतरें बने हैं, जहां पहले राजा-महाराजा देवदासियों से नृत्य कराते थे। कहा जाता है कि देवदासियों को इन्हीं मंदिरों में नृत्य सिखाया जाता था।
यहां से मैं पूर्व भाग की तरफ आगे बढ़ती हूं। पूर्व में तीन जैन मंदिर हैं। इनमें सबसे खास है पार्श्वनाथ मंदिर, जो राजा धंगदेव के काल बना था। जैन मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीर्थंकरों की प्रतिमाएं हैं।इसके अलावा गंधर्व, किन्नर, विद्याधर शासन देवी-देवता, यक्ष मिथुन और अप्सराओं की मूर्तियां हैं। मंदिर के तोरण में तीर्थंकर माता के 16 स्वप्नों का सुंदर चित्रण किया गया है। जबकि गर्भगृह में प्रथम तीर्थंकर आदि नाथजी की प्रतिमा है।
पार्श्वनाथ मंदिर, जैन मंदिरों में सबसे बड़ा है। यह 69 फीट लंबा और 35 फीट चौड़ा है।
यहां से मैं दक्षिणी मंदिरों की तरफ आगे बढ़ती हूं। यहां खोकर नदी के तट पर दूल्हादेव मंदिर है। यह मंदिर शिव को समर्पित है। इसका निर्माण 12वीं सदी के दौरान हुआ था। यह मंदिर चंदेल वंश के राजाओं की आखिरी धरोहर है। मंदिर के अंदर एक विशाल शिवलिंग पर एक हजार छोटे-छोटे शिवलिंग बने हैं।
दूल्हादेव मंदिर से कुछ दूर चतुर्भुज मंदिर एक साधारण चबूतरे पर बना है। इस मंदिर के गर्भगृह में शिव की प्रतिमा है। यहां से कुछ दूरी पर एक विशाल मंदिर जमीन के नीचे दबा हुआ है। जिसके दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।
दूल्हादेव मंदिर की दीवारों में बनी आकृतियां। कुछ इतिहासकार इस मंदिर को कुंवरनाथ मंदिर भी कहते हैं।
खजुराहो मंदिर के निर्माण को लेकर एक किंवदंती भी है-
‘’एक बार खजुराहो राजपुरोहित हेमराज की बेटी हेमवती तालाब में स्नान कर रही थीं। उसी वक्त आकाश में चंद्रदेव भ्रमण पर निकले हुए थे। जैसे ही उनकी नजर हेमवती पर गई, वे मोहित हो गए। उनके अंदर वासना जाग गई।
उसी पल वे हेमवती के सामने प्रकट हुए और उससे सहवास के लिए आग्रह करने लगे। दोनों के बीच बने संबंध से एक पुत्र पैदा हुआ। समाज के लोकलाज के डर से हेमवती ने उसे जंगल में ही पाला। उन्होंने उसका नाम चंद्रवर्मन रखा, जिसने आगे चलकर चंदेल वंश की नींव रखी।
एक दिन चंद्रवर्मन को हेमवती ने सपने में दर्शन दिया और कहा कि ऐसे मंदिर बनाओ जिससे लोग यह समझ सकें कि जीवन के बाकी पहलुओं की तरह काम भी जरूरी है। यह कोई गलत कृत्य नहीं है। फिर ऐसे मंदिरों के निर्माण के लिए चंद्रवर्मन ने खजुराहो को चुना। इसे अपनी राजधानी बनाकर 85 वेदियों का एक विशाल यज्ञ किया। बाद में इन्हीं वेदियों के स्थान पर 85 मंदिर बनवाए गए।’’

