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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को समर्पित 3 रचना!

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आदि #अंत #नारी

जन्म,वजूद
हैसियत,अस्तित्व
व्यक्ति,व्यक्तित्व
जीवन और मृत्यु
मुझसे है
मेरी प्रतिशोध प्रतिज्ञा में
सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं
मेरे प्रण से धरती फट जाती है

मैं रस्मो रिवाज़ का ठीहा नहीं हूँ
सिंदूर पोतने और मंगल सूत्र
चढ़ाने वाला पत्थर नहीं हूँ
मैं आग हूँ
मेरा अंश ही है वंश
अपने रक्त,मेरु,मज्जा से
अपने ही ममत्व में भीगती हुई
दुनिया को रचती हूँ
मैं आदि और अंत हूँ!

2.
हे निर्मात्री तुझे सलाम!
-मंजुल भारद्वाज
महिला निर्मात्री है
मेरा सलाम इस मेहनतकश महिला को
जो लड़ रही है
गरीबी के अभिशाप से
जिसने अपने श्रम से तोड़ा है
जन्म का संयोग
भूख का घेरा
चूल्हा,चक्की के दायरे को लांग
कदम रखा है अपने
हिस्से की धूप को
हासिल करने के लिए
नाजुक,कमज़ोर,अबला के
कलंक को मिटाते हुए
अपने सृजन अवतार की
शक्ति को सिद्ध करते हुए
मध्यमवर्ग की चारदीवारी में
सजधज कर
किसी धनपशु की हवस का
निवाला बनने की बजाए
थपेड़ा है पितृसत्तात्मक समाज को
ममता मेरा आंचल है
सृजन जवाबदेही
बराबरी भीख में नहीं मिलती
हासिल की जाती है
तू शायरों का भोग्या कलाम नहीं
न्याय संगत व्यवस्था का इंकलाब है
हे निर्मात्री तुझे सलाम!


शाहीन बाग़ हैं !

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