आदि #अंत #नारी
- मंजुल भारद्वाज
1.
मैं आदि और अंत हूँ
-मंजुल भारद्वाज
दो स्तन
एक गर्भाशय
एक योनि
मात्र नहीं हूँ मैं
मैं विश्व का
विधान,संविधान हूँ
मैं सृष्टि हूँ
प्रकृति हूँ
मैं ब्रह्म हूँ
जन्म,वजूद
हैसियत,अस्तित्व
व्यक्ति,व्यक्तित्व
जीवन और मृत्यु
मुझसे है
मेरी प्रतिशोध प्रतिज्ञा में
सभ्यताएं नष्ट हो जाती हैं
मेरे प्रण से धरती फट जाती है
मैं रस्मो रिवाज़ का ठीहा नहीं हूँ
सिंदूर पोतने और मंगल सूत्र
चढ़ाने वाला पत्थर नहीं हूँ
मैं आग हूँ
मेरा अंश ही है वंश
अपने रक्त,मेरु,मज्जा से
अपने ही ममत्व में भीगती हुई
दुनिया को रचती हूँ
मैं आदि और अंत हूँ!
…
2.
हे निर्मात्री तुझे सलाम!
-मंजुल भारद्वाज
महिला निर्मात्री है
मेरा सलाम इस मेहनतकश महिला को
जो लड़ रही है
गरीबी के अभिशाप से
जिसने अपने श्रम से तोड़ा है
जन्म का संयोग
भूख का घेरा
चूल्हा,चक्की के दायरे को लांग
कदम रखा है अपने
हिस्से की धूप को
हासिल करने के लिए
नाजुक,कमज़ोर,अबला के
कलंक को मिटाते हुए
अपने सृजन अवतार की
शक्ति को सिद्ध करते हुए
मध्यमवर्ग की चारदीवारी में
सजधज कर
किसी धनपशु की हवस का
निवाला बनने की बजाए
थपेड़ा है पितृसत्तात्मक समाज को
ममता मेरा आंचल है
सृजन जवाबदेही
बराबरी भीख में नहीं मिलती
हासिल की जाती है
तू शायरों का भोग्या कलाम नहीं
न्याय संगत व्यवस्था का इंकलाब है
हे निर्मात्री तुझे सलाम!
शाहीन बाग़ हैं !
- मंजुल भारद्वाज
वो कहते है
यह मुस्लिम महिलाएं हैं
मैं कहता हूँ
यह इंसान है
वो कहते हैं यह
अनपढ़ हैं
मैं कहता हूँ
यह समझदार है
वो कहते हैं
यह पिछड़ी हैं
मैं कहता हूँ
यह इल्म आईन के साथ हैं
वो कहते हैं
यह बुरखे में कैद हैं
मैं कहता हूँ
यह आज़ाद ख्याल
दृष्टि सम्पन्न ख़्वाब हैं
वो कहते हैं
यह गद्दार हैं
मैं कहता हूँ
वफादार हैं
देश के लिय
जान लुटाना जानती हैं
वो कहते हैं
यह कुरान मानती हैं
मैं कहता हूँ
धर्म से ऊपर उठ
वो संविधान मानती हैं
वो कहते हैं
यह चमन कर कालिख हैं
मैं कहता हूँ
यह न्याय,बराबरी का
इंकलाब हैं
वो कहते हैं
यह ख़ाक-नशीं हैं
मैं कहता हूँ
यह भारत का परचम लहराती
शाहीन बाग़ हैं !

