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पाली के बूसी गांव में 500 साल पुरानी विवाह की परंपरा: धुलंडी पर फिर सजेंगे मौजीराम-मौजनी देवी के फेरे

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  राजस्थान की धरा अपनी परंपराओं और लोक संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में विख्यात है. पाली जिले के सोमेसर कस्बे के बूसी गांव में इतिहास एक बार फिर जीवंत होने जा रहा है. पाली जिला मुख्यालय से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में सदियों पुरानी परंपरा के तहत मौजीराम और मौजनी देवी के विवाह समारोह का आयोजन किया जाता है. होली दहन के दूसरे दिन धुलंडी पर ग्रामीणों की ओर से प्रतिवर्ष धूमधाम से बारात निकाली जाती है और विधि विधान से विवाह संपन्न कराया जाता है. विवाह के बाद मौजीराम और मौजनी देवी के बिछड़ने की रस्म भी निभाई जाती है.पाली के बूसी गांव में 500 साल पुरानी मौजीराम और मौजनी देवी के विवाह की परंपरा धुलंडी पर धूमधाम से निभाई जाती है, जिसमें सभी धर्मों के लोग उत्साह से भाग लेते हैं. ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा करीब पांच सौ वर्षों से चली आ रही है. मान्यता है कि लगभग 500 वर्ष पूर्व बूसी गांव के जैन बोहरा परिवार ने मौजीराम और मौजनी देवी की प्रतिमाओं की स्थापना की थी.

ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा करीब पांच सौ वर्षों से चली आ रही है. मान्यता है कि लगभग 500 वर्ष पूर्व बूसी गांव के जैन बोहरा परिवार ने मौजीराम और मौजनी देवी की प्रतिमाओं की स्थापना की थी. मौजीराम को भगवान शंकर का रूप माना जाता है, जबकि ब्रह्मपुरी में मौजनी देवी की तीन फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां मन्नत मांगने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. धुलंडी के दिन शाम करीब 5 से 6 बजे नारियल चढ़ाकर विशेष पूजा अर्चना के साथ विवाह समारोह की शुरुआत होती है, जिसमें गांव और आसपास के क्षेत्रों के लोग बड़ी संख्या में भाग लेते हैं.

गाजे बाजे के साथ निकलती है बारात
रावले के बाहर करीब एक घंटे तक कथा वाचन के बाद बारात गाजे बाजे के साथ रवाना होती है. बारात कुम्हारों के वास से गुजरती है और इस दौरान गली मोहल्लों की छतों से लोग रंग, गुलाल और पुष्प वर्षा करते हैं. ब्रह्मपुरी में मौजनी देवी के घर पहुंचने पर महिलाएं पुष्प वर्षा और पारंपरिक गालियों के साथ दूल्हे का स्वागत करती हैं. यहां हिंदू परंपरा के अनुसार मौजनी देवी और मौजीराम का विवाह संपन्न कराया जाता है.

कंधे पर उठाकर निकलती है बंदोली
बंदोली कार्यक्रम इस विवाह की विशेष परंपरा है. मौजीराम को घोड़े पर नहीं बैठाया जाता बल्कि एक व्यक्ति अपने कंधे पर उठाकर ले जाता है. बंदोली की शुरुआत जैन मंदिर से होती है. वहां से बारात सुनारों के बास में पहुंचती है जहां सोनीजी की ओर से सोने के आभूषण पहनाए जाते हैं. इसके बाद बंदोली पुनः वर के घर पहुंचती है और रावले के बाहर चौक में बिठाकर मौजीराम की कथा का वाचन किया जाता है. यह दृश्य श्रद्धा और उल्लास से भरपूर होता है.

3 मार्च को होगा भव्य आयोजन
मौजीराम और मौजनी देवी के विवाह महोत्सव की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है. लोगों को पीले चावल और पत्रिका देकर आमंत्रित किया जा रहा है. प्रतिमाओं का विभिन्न रंगों, पदार्थों और सुगंधित द्रव्यों से आकर्षक श्रृंगार किया जाता है जो अत्यंत मनमोहक दृश्य प्रस्तुत करता है. बैठक में 3 मार्च 2026 को आयोजित होने वाले विवाह महोत्सव तथा 12 मार्च 2026 को होने वाले श्रीराम हनुमान गांव शाही गैर नृत्य कार्यक्रम को लेकर विस्तार से चर्चा की गई. दोनों आयोजनों को भव्य और व्यवस्थित रूप से संपन्न कराने के लिए अलग अलग जिम्मेदारियां तय की गई हैं.

72 वर्षों से निभा रहे साक्षी
आयोजन समिति से जुड़े गणपत ने बताया कि कार्यक्रमों के सफल संचालन के लिए बोली लगाने वाले भामाशाहों से संपर्क कर उन्हें मंच सज्जा, प्रसादी व्यवस्था, विद्युत प्रबंधन, सुरक्षा, साफ सफाई और अतिथि स्वागत जैसी जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं. समिति का उद्देश्य है कि दोनों धार्मिक महोत्सव अनुशासन और श्रद्धा के साथ संपन्न हों. उन्होंने कहा कि वह 72 वर्ष के हैं और बचपन से इस विवाह की रस्म को देखते आ रहे हैं. परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है और इसमें सभी धर्मों के लोग भाग लेते हैं.

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