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इतिहास में दर्ज है 7 अगस्त 1947

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हिंदुस्तान के आजाद होने की मुनादी कर दी गई थी। मगर चालाक अंग्रेजी हुकूमत ने जाते-जाते हमारे मुल्क को दो हिस्सों, हिंदुस्तान पाकिस्तान में बांट दिया। तमाम सोशलिस्ट नेता और कार्यकर्ता लंबी-लंबी जेल की यातनाओं को सहकर बाहर निकले थे। उन्होंने तय किया कि हम नयी बनने वाली सरकार में शामिल न होकर जम्हूरियत को मजबूत करने के लिए सोशलिस्ट पार्टी बरकरार रखकर विपक्ष की भूमिका निभाएंगे। हिंदुस्तान के बटवारे की मर्माहत पीड़ा से आहत सोशलिस्ट नेताओं ने एक साझा बयान जारी किया।

दोस्तों,

हम आजादी की दहलीज पर हैं। 15 अगस्त को हमारा मुल्क खुदमुख्तार (Self government) तथा जल्द ही गणराज्य बनेगा। कई नस्लो के लंबे संघर्ष और कुर्बानी का यह फल चखने को मिलेगा। हालांकि यह फल दर्द और दुख के साथ कड़वा है। 150 सालों के ‘बाटों और राज करो’ तथा हमारे राष्ट्रीय जीवन की बुराइयों के कारण हमारे मुल्क के कुछ हिस्से अलग कर दिए गए हैं। जब तक दर्द और क्रोध में बांटे गए हिस्से मोहब्बत तथा स्वेच्छा से एकता में शामिल नहीं हो जाते तब तक भारतीय भाग्य अधूरा रहेगा और उसकी आजादी अधूरी रहेगी।

हमारा मानना ​​है कि समाजवाद ही वह सीमेंट है जो बटे हुए इस हिस्से को एकता के सूत्र में पिरो देगा।

          *अपील कर्ता* 
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आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, यूसुफ मेहरअली, कमला देवी चट्टोपाध्याय, अच्युत पटवर्धन, अशोक मेहता, पुरुषोत्तम त्रिकम दास, डॉ. राममनोहर लोहिया, अरुणा आसफ अली और मुंशी अहमदद्दीन।
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बंटवारे की आग ने हिंदू-मुस्लिम को एक दूसरे के खून का प्यासा बना दिया था। गांधीजी नोआखाली में दंगों को रोकने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर डटे थे। उनके साथ सुचेता कृपलानी और डॉ. राममनोहर लोहिया भी लगे हुए थे। अगर सोशलिस्टों की इस अपील को सुना जाता, तो हिंदुस्तान-पाकिस्तान में हो रहे आपसी मजहबी झगड़ों तथा बांग्लादेश में हो रहे नरसंहारों से बचा जा सकता था।
प्रोफेसर राजकुमार जैन

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