*प्रोफेसर राजकुमार जैन*
*”हिंदू धर्म ने कभी जीवन की असलियतों से बिल्कुल इंकार नहीं किया बल्कि वह उन्हें एक घटिया किस्म का सत्य मानता है और आज तक हमेशा ऊंचे प्रकार के सत्य की खोज करने की कोशिश करता रहा है। यह लोगों के ,साधारण विश्वास का अंग है।*
*एक बड़ा अच्छा उदाहरण मुझे याद आता है। कोणार्क के विशाल लेकिन आधे नष्ट मंदिर में पत्थरों पर हजारों मूर्तियां खुदी हुई मिलती है। जिंदगी की असलियतो की तस्वीर देने में कलाकार ने किसी तरह की कंजूसी या संकोच नहीं दिखाया है। जिंदगी की सारी विभिन्नताओं को उसने स्वीकार किया है। उसमें भी एक क्रमबद्ध व्यवस्था मालूम पड़ती है। सबसे नीचे की मूर्तियों में शिकार, उसके ऊपर प्रेम, फिर संगीत और फिर शक्ति का चित्रण है। हर चीज में बड़ी शक्ति और क्रियाशीलता है। लेकिन मंदिर के अंदर कुछ भी नहीं है, और जो मूर्तियां हैं भी उनमें शांति और खामोशी का चित्रण है। बाहर की गति और क्रियाशीलता से अंदर की खामोशी और स्थिरता मंदिर में बुनियादी तौर पर वही यही अंकित है। परम सत्य की खोज कभी बंद नहीं हुई।”*
*,-डॉ राममनोहर लोहिया-*
*”हथियारों के अलग-अलग स्वरूप को ने बताकर ,खाली इतना कह दूं कि आज आठ खरब रुपया हर साल दुनिया हथियारों पर खर्च कर रही है। अगर पारस्पिक संदेश और शक की यही हालत रही तो वह बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं। इसके साथ-साथ एक अजीब बात और आ गई है। 1945 के पहले तो हथियार कारगर होते थे उनमें हार जीत हुआ करती थी। अच्छे लोग, बड़े लोग, मतलब सचमुच महात्मा गांधी के अर्थ में, जैसे ईसा मसीह, महात्मा गांधी हथियार को गंदा कहा करते थे और हर अच्छा आदमी हथियारों को गंदा मानता था। हथियार गंदे हैं, हथियार खराब है, हथियार अनुचित है, यह भावना तो बहुत जमाने से मनुष्य समाज के दिमाग में रही है। लेकिन उस देश की जीत हो जाया करती थी जिसके पास ज्यादा कारगर हथियार होते थे बनिस्पत ऐसे देश के जिसके पास कम हथियार होते थे, इसलिए हथियारों का इस्तेमाल हमेशा होता था। चाहे नैतिक दृष्टि से हथियार हमेशा बुरे रहे हो लेकिन भौतिक दृष्टि से 1945 तक हथियार हमेशा अच्छे रहे। 1945 में अणु बम फूटा और उसके बाद से उद्जन और अब यह जो फेंके जाने वाले हथियार हैं, प्रक्षेपास्त्र, और न जाने क्या-क्या चीज सुनने में आ रही है, बनने लगे। आज स्थिति पैदा हो गई है कि अब चाहे कोई नए हथियार बने या ना बने, रूस और अमेरिका अगर चाहे तो दोनों एक दूसरे का और संसार का नाश कर सकते हैं। अगर युद्ध शुरू हुआ हो और दोनों में से किसी एक को ऐसा लगे कि अब तो हमारी हार हो रही है तो फिर वह आखरी हथियार इस्तेमाल कर ले तो दुश्मन का नाश कर देगा और फिर खुद का भी नाश हो जाएग और दुनिया भी नष्ट हो जाएगी। तीन अरब आदमियों में से दो ढाई अरब आदमियों का खात्मा हो जाएगा और दुनिया में जो भी बड़े-बड़े शहर हैं वह तो बिल्कुल खत्म हो जाएंगे। वहां राख भी नहीं रहेगी क्योंकि इतनी गर्मी निकलेगी कि उसमें सब उड़ – उड़ा जाएंगे और गड्ढे वगैरह बन जाएंगे।”*
*– डॉ राममनोहर लोहिया-*
*,”अलगाववाद और सांप्रदायिकता की राजनीति का परिणाम जड़ता और बिखराव होता है। जब अलगाववाद की पार्टी बहुसंख्यक समूह से बनती है तो अल्पसंख्यक समूह बगावत करते हैं। अगर वह पार्टी सफल हो जाती है तो अल्पसंख्यकों का दमन होता है और उनमें मुरदनी छा जाती है। यदि वह विफल होती है तो अल्पसंख्यक पृथक राज्य की मांग करने लगते हैं। अल्पसंख्यक समूहों से बनी पार्टी की सफलता के भी यही परिणाम होते हैं देश का विघटन यदि वह असफल भी होता है तो भी राजनीतिक जीवन में जहर घोल देता है” ।*
*”रोटी और संस्कृति के विरोध की अमूर्त बहस करने के बजाय इसे उस वस्तुस्थिति के साथ जोड़ा जाना चाहिए जो दो तिहाई भूखी जनता की है। यहां रोटी और संस्कृति को अलग-अलग नहीं किया जा सकता अगर एक कोई इंतजार करने के लिए कहा जाता तो दूसरी को भी इंतजार करना पड़ेगा। रोटी का स्वाद और मात्रा संस्कृति की गुणवत्ता पर और संस्कृति की गुणवत्ता रोटी के स्वाद और उसकी मात्रा पर निर्भर करती है”।*
*- डॉ राममनोहर लोहिया-*
*,”हमें इस तरह जीना चाहिए, जैसे हम कल ही मरने वाले हैं, हमें इस तरह सीखना चाहिए, जैसे हम वर्षों जीवित रहने वाले हैं,”*
*-महात्मा गांधी,-*
*” शिक्षा का यही महत्व है कि वह, समाज हित में सदैव प्रयासरत रहती है, ताकि एक सभ्य समाज का निर्माण हो सके। शिक्षा के माध्यम से मानव आवश्यक कौशल और ज्ञान की प्राप्ति करता है, जिसमें सफलता मानव के पग पखारती है शिक्षा हमेशा धर्मनिरपेक्ष होनी चाहिए। शिक्षा को किसी विशेष धर्म या संप्रदाय से नहीं जोड़ा जाना चाहिए”।*
*–डॉ बी आर अंबेडकर-*
*”संपूर्ण क्रांति से मेरा तात्पर्य समाज के सबसे अधिक दबे – कुचले व्यक्ति को सत्ता के शिखर पर देखना है। संपूर्ण क्रांति में साथ क्रांतियां शामिल है: राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति इन सातों क्रांतियां को मिलाकर संपूर्णक्रांति होती है”*
*-लोकनायक जयप्रकाश नारायण-*
*उपरोक्त सूक्तियां पुणे के समाजवादी एकजुटता सम्मेलन के अवसर पर 300 पृष्ठ में प्रकाशित स्मारिका भारतीय समाजवादी आंदोलन के 90 वर्ष 1934 से 2025 से उद्मृत की गई है। अगर कोई भी सुघी पाठक इस स्मारिका के लेखो को पढ़ ले तो शर्तिया तौर पर हैरत में आ जाएगा।*
मैंने अपनी जिंदगी के तकरीबन 45 साल दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ते पढ़ाते हुए गुजारे तथा सोशलिस्ट पार्टी के 1970 में सोनपुर बिहार में हुए राष्ट्रीय सम्मेलन से लेकर बुलंदशहर के अंतिम राष्ट्रीय सम्मेलन तक में शिरकत की है। वहां के शैक्षणिक तथा राजनीतिक सभा, सेमिनार, गोष्ठियों, जन सभाओं को देखा सुना तथा भागीदारी की है। बिना किसी विश्वविद्यालय अथवा राजनीतिक पार्टी के द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में सैकड़ो लोगों की उपस्थिति में उच्च स्तरीय वैचारिक आदान-प्रदान को अनुशासित एवं व्यवस्थित रूप से देख कर अचंभित हूं।
15 राज्यों के प्रतिनिधियों की हाजिरी से शुरू हुआ 19 सितंबर का उद्घाटन सत्र सविता शिंदे के स्वागत भाषण से शुरू हुआ, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी 100 वर्ष की आयु को प्राप्त हुए सोशलिस्ट बब्बन डिसूजा, तथा 101 साल के स्वतंत्रता सेनानी सोशलिस्ट डॉक्टर जीजी पारीख के संदेश का वाचन एस एल गुड्डी, युसूफ मेहर अली सेंटर ने वाचन किया। ,जिसमें कहा गया की “90 साल पहले भी समाजवादी आंदोलन की प्रासंगिकता थी और आज भी है”।
प्रसिद्ध समाजशास्त्री तथा जेएनयू के भूतपूर्व प्रोफेसर आनंद कुमार द्वारा आधार विचार पत्र प्रस्तुत किया गया। उसके बाद सुभाष वारे, पूर्व अध्यक्ष राष्ट्र सेवा दल द्वारा संविधान की प्रस्तावना का वाचन तथा गीत प्रस्तुति हुई।
*प्रथम सत्र,: विषय,: समाजवादी आंदोलन के 90 वर्ष,: चुनौतियां और संभावनाएं* पर आधारित था। जिसका उद्घाटन श्री माता प्रसाद पांडे, नेता प्रतिपक्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा किया गया। उन्होंने कहा कि समाजवादी आंदोलन के 90 साल पूर्ण होने के बाद भी समाजवादियों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं, इन चुनौतियों का मुकाबला व्यापक समाजवादी एकता और डॉक्टर लोहिया द्वारा प्रतिपादित वोट, जेल, और फावड़े के सिद्धांत से ही किया जा सकता है। इस सत्र की अध्यक्षता मध्य प्रदेश विधानसभा के तीन बार सदस्य एवं मंत्री रहे, रमाशंकर सिंह ने की। इस सत्र में राष्ट्र सेवा दल, एसएम जोशी सोशलिस्ट फाऊंडेशन, युसूफ मेहर अली सेंटर, समाजवादी समागम, महाराष्ट्र गांधी स्मारक नीति के प्रतिनिधि वक्ता रहे। तथा साथ ही मराठी स्मारिका का लोकार्पण भी हुआ। प्रोफेसर विनोद प्रसाद सिंह एवं डॉ सुनीलम की पुस्तक समाजवादी आंदोलन के दस्तावेज के दोनों खंड के दूसरे संस्करण का लोकार्पण हुआ। इसी सत्र में जीवन के 80 वर्ष पूरे कर चुके उपस्थित वरिष्ठ समाजवादियों का सम्मान सत्कार हुआ। पंडित रामकिशन, प्रो राजकुमार जैन, सुश्री चंद्रा अय्यर, गजानंद खातू, भीमराव पाटोले, रावसाहेब पवार, वर्षा गुप्ते, राधा शिरसेकर, उमाकांत भावसार, विजया चौहान। सत्र का धन्यवाद ज्ञापन संदेश दिवेकर द्वारा प्रस्तुत किया गया।
रात को 9:00 बजे से 10:00 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम। राष्ट्र सेवा दल कला पथक गीत और नृत्य गीत, लेक लाड़की अभियान निर्मित संगीत फ्यूजन पथ नाट्य, “महिलाओं के मुद्दों की चर्चा” राष्ट्र सेवा दल, स्मिता पाटिल कला पथक इचलकरजी की पथ नाट्य “पुनहा गांधी” गीत प्रस्तुति की गई ।
*दूसरे दिन के दूसरे सत्र में,: विकास की अवधारणा संबंधी चुनौतियां,: पर्यावरणीय -सामाजिक -आर्थिक- और सामाजिक विकल्प।* अध्यक्षता सुश्री मेधा पाटकर, सामाजिक कार्यकर्ता,
वक्ता, हितेश पोतदार अर्थशास्त्री, सौम्य दत्त पर्यावरणविद् तथा आराधना भार्गव ,प्रदेश अध्यक्ष किसान संगठन समिति मध्य प्रदेश। संचालन,- प्रफुल्ल सामंतरा, संयोजक, लोक शक्ति अभियान उड़ीसा द्वारा किया गया तथा उपस्थित साथियों ने इस पर 5 मिनट की संक्षिप्त अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत की।
*तृतीय सत्र : सामाजिक न्याय,- जन आंदोलन और व्यवस्था परिवर्तन* अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश बी जी कोसले पाटिल द्वारा की गई।
वक्ता के रूप में श्री निरंजन टकले, वरिष्ठ पत्रकार, मधु मोहिते, युसूफ मेहर अली सेंटर। सुश्री सुशीला ताई मोराले, अरुणा आसफ अली महिला मंडल,। तथा रत्ना बोरा अंबेडकर कारवां, अहमदाबाद, टीपी जोसेफ, सोशलिस्ट केंद्र केरल तथा सत्र का संचालन सुभाष लोमटे, जय किसान आंदोलन, स्वराज अभियान द्वारा किया गया। साथियों की 5 मिनट की संक्षिप्त टिप्पणियां भी होती रही।
*चतुर्थ सत्र,: समाजवादी आंदोलन के 90 वर्ष: व्यापक एकजूटता की आवश्यकता,* स्मारिका का लोकार्पण, तथा विभिन्न राजनीतिक पार्टियों, संस्थाओं के नेताओं का संबोधन,
अध्यक्षता बी आर पाटील विधायक एवं उपाध्यक्ष योजना आयोग कर्नाटक सरकार,
वक्ता, राम धीरज, सर्व सेवा संघ, जावेद अली, सांसद, समाजवादी पार्टी, अली जावेद भूतपूर्व सांसद हर्षवर्धन सपकाल महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस, अशोक घवले,सीपी एम, कामरेड उदय भट्ट सीपीआई, किशोर कईक अध्यक्ष फॉरवर्ड ब्लॉक, एस एन देवरावर कार्यकारी अध्यक्ष सोशलिस्ट पार्टी इंडिया, संचालन डॉक्टर सुनीलम ने किया, धन्यवाद ज्ञापन सुश्री साधना शिंदे द्वारा दिया गया।
रात्रि को 9:00 बजे से 10:30 बजे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम, अंजोर निर्मित “मै सावित्रीबाई फुले” गीत प्रस्तुति हुई।
तीसरे दिन 21 सितंबर 2025 रविवार
*पांचवा सत्र: संविधान और लोकतंत्र पर आसन्न खतरे; सांप्रदायिकता की देश तोड़क जहरीली चुनौती,* अध्यक्षता-अनवर राजन, महाराष्ट्र गांधी स्मारक निधि,
वक्ता- डॉ मनीष गुप्ते , सामाजिक कार्यकर्ता, जयशंकर पांडे, पूर्व विधायक उत्तर प्रदेश, प्रो शशि शेखर सिंह, लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण अभियान, मीर शाहिद सलीम सिटिजन फॉर डेमोक्रेसी कश्मीर, राघवेंद्र दुबे वरिष्ठ पत्रकार, संचालन सुश्री गुड्डी एस एल, युसूफ मेहर अली सेंटर, इच्छुक उपस्थित साथियों द्वारा इस विषय पर संक्षिप्त टिप्पणी 5 मिनट की की गई।
सुबह 10:30 से 11:00 तक ,:थियेटर आफ रेलीवेंस आयोजित “जागर संविधान का”
11:00 बजे से 12:00 तक
*छठवां सत्र :अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विचार*
विषय -शांति और न्याय के लिए अंतरराष्ट्रीय एकजुटता प्रस्ताव, अध्यक्षता-, विजय प्रताप, दिल्ली, मुख्य वक्ता- फिरोज मीठीबोर वाला, गीत प्रस्तुति
1:00 से 3:30 बजे तक,
*सातवां सत्र,: पुणे घोषणा पत्र* प्रस्ताव- गीता आर, राष्ट्रीय अभियान समिति की दक्षिण भारत संयोजिका तमिलनाडु तथा सुनीति राष्ट्रीय समन्वयक जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय,
अध्यक्षता, अविनाश पाटील, अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति, महाराष्ट्र,
वक्ता-, योगेंद्र यादव, स्वराज इंडिया,
उल्का महाजन, सर्वहारा जन आंदोलन,
अशोक चौधरी, सचिव, आदिवासी एकता परिषद गुजरात,अमूल्य निधि जन स्वास्थ्य अभियान इंदौर, विनोद सिरसाट संपादक साधना सप्ताहिक पत्रिका महाराष्ट्र, हरिशंकर मिश्रा हिंद मजदूर सभा, छत्तीसगढ़, प्रभात, किसान ट्रस्ट पटना,
रपट पेश हुई, केरल समूह (रेजिनाक,), लोकतांत्रिक राष्ट्र निर्माण समूह (मंथन)
समाजवादी समागम (डा हरीश खन्ना), छात्र युवा संघर्ष वाहिनी (पुतुल) तथा आयोजन संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए।
अपराह्न साढे तीन से चार बजे सांस्कृतिक कार्यक्रम- स्मितालय निर्मित “शिवाजी” नृत्य नाटिका,
गीत प्रस्तुति,
*समापन सत्र* : अध्यक्षता प्रोफेसर राजकुमार जैन ,समाजवादी समागम
मुख्य अतिथि -एल, कालप्पा, समापन वक्तव्य- रमाशंकर सिंह, पूर्व मंत्री मध्य प्रदेश, संचालन डॉक्टर सुनीलम,
धन्यवाद ज्ञापन- दत्ता पाकिरे,
यह एक हकीकत है की सोशलिस्टों की आज कोई एक पार्टी नहीं है। मुख्तलिफ पार्टीयों, समूह, संगठनों, व्यक्तियों में इस विचारधारा को मानने वाले लोगों की बड़ी तादाद अपने-अपने ढंग से सोशलिस्ट विचार दर्शन, सिद्धांतों ,नीतियों, कार्यक्रमों के प्रचार प्रसार के साथ-साथ जुल्म ज्यादती अन्याय के खिलाफ जमीनी संघर्ष भी कर रहे हैं। सम्मेलन में सभी वक्ताओं ने समाजवादी एकता को वक्त की जरूरत बतलाया। जहां एक तरफ समाजवादी विचार दर्शन के मुख्तलिफ मुद्दों को दोहराया गया वहीं मुल्क की सत्ता पर काबिज भाजपा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मोदी सरकार के राज में सांप्रदायिक एकता के माहौल को खत्म कर हिंदू मुसलमान के झगड़ों की आग को भड़काने के साथ-साथ मूल्क की अब तक की कमाई गई पूंजी को अंबानी अडानी जैसे मालदारो के हाथों लूटाने पर गहरा रोष प्रकट किया गया। आज भी जातिवाद का नंगा नाच, जिसमें शोषित, पीड़ीत, दमित, दलित लोगों पर हो रहे जुल्मों की वेदना तथा उसके प्रतिकार के हुंकार की आवाज हाल में सुनाई देती रही। *आजकल के सियासी माहौल जिसमें दलित वोटरों को झांसा देकर अपने पाले में खड़ा करने के लिए बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का “जय भीम” का नारा जिनके द्वारा लगाया जा रहा है, क्या सचमुच में यह तबका बाबा साहब के विचारों का हामी, समर्थक दिल से मानने वाला है? वहीं सोशलिस्टों के साथ डॉ अंबेडकर का शुरू से ही गठबंधन रहा। लोकसभा चुनाव में उस समय दोहरी सदस्यता होती थी अर्थात एक साधारण तथा दूसरी आरक्षित संयुक्त सीट होती थी। एक बैलट पेपर पर ही दो नाम होते थे। 1952 में मुंबई नॉर्थ सीट से बाबा साहब अंबेडकर जहां शेड्यूल कास्ट फेडरेशनपार्टी की ओर से तथा अशोक मेहता सोशलिस्ट पार्टी की ओर से संयुक्त उम्मीदवार लड़े थे।, 1954 में भंडारा संसदीय क्षेत्र से दोबारा डॉक्टर भीमराव अंबेडकर शेड्यूल कास्ट फेडरेशन की तरफ से तथा अशोक मेहता सोशलिस्ट पार्टी के संयुक्त उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े थे। यही नहीं अपनी जिंदगी के अंतिम दिनों में डॉक्टर अंबेडकर तथा डॉक्टर लोहिया के बीच एक पार्टी बनाने पर पत्र व्यवहार भी हुआ था। मगर अफसोस इसी बीच डॉक्टर अंबेडकर का देहांत हो गया।*
इस सम्मेलन से एक बात साफ रूप से उभर कर आ रही थी कि समाजवाद की कोई एक पार्टी बने ताकि समाजवाद के साथ-साथ जुल्म ज्यादती ,सांप्रदायिकता, दौलत की लूट पर अंकुश लग सके। सम्मेलन की तैयारी तथा कामयाबी में राष्ट्र सेवा दल, एसएम जोशी फाउंडेशन, युसूफ महरौली सेंटर के कार्यकर्ता और नेताओं द्वारा सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों के रहने खाने, सभा के लिए सभी प्रकार के उपक्रम जुटाने ंसे लेकर कला पथक के कलाकारों द्वारा समय-समय पर गीतों, नाटक, नृत्य तथा जोशीले नारों के बिना यह भव्य आयोजन मुमकिन नहीं था।
इस सम्मेलन के रूहेरवा डॉक्टर सुनीलम तथा वी आर पाटिल, अरुण कुमार श्रीवास्तव ,प्रोफेसर आनंद कुमार, रमाशंकर सिंह के द्वारा सम्मेलन के लिए तैयार किए गए आधार पत्र, प्रस्ताव, साहित्य प्रकाशन, बुलेटिन तैयार करने के साथ-साथ उद्घाटन से लेकर समापन के साथ भाषणों की दुरूह जिम्मेदारी संभाली गई। सम्मेलन में बड़े पैमाने पर समाजवादी साहित्य की हिंदी, अंग्रेजी, मराठी पुस्तको, पत्रिका, नेताओं के फोटो तथा अन्य साहित्य की बिक्री हुई।
सम्मेलन में बड़ी शिद्दत के साथ महसूस किया गया कि समय की आवश्यकता है कि समाजवादी विचार से सम्बद्ध सभी संस्थाओं, संगठनों, मंचों एवं सक्रिय या निष्क्रिय हो चुके संगठनों की एक व्यापक एकता बने। राष्ट्रीय व आंचलिक स्तर पर जितने भी ऐसे संगठन चिन्हे जा सकते हैं उनकी पहचान कर पूरे सम्मान व समन्वय के साथ अखिल भारतीय स्तर पर एक फेडरेशन बने। इसी परिसंघ (फेडरेशन) के जरिए समाजवादी विचारों के प्रसार प्रचार वह प्रशिक्षण का समयबद्ध कार्यक्रम तय हो और सहमति के आधार पर ही जनपक्षीय मुद्दों पर सिविल नाफरमानी वह प्रतिरोध के कार्यक्रम भी।
समाजवादी विचार का प्रशिक्षण सुनियोजित व्यवस्थित और करीने से हो इसलिए स्कूल ऑफ सोशलिज्म समाजवादी पीठ की स्थापना नितान्त जरूरी है, जिसमें मात्र प्रशिक्षण के विभिन्न कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किए
जाएं। यह सर्वोच्च प्राथमिकता का काम होना चाहिए। इसके विभिन्न अंगों में मदद हेतु अनुभवी समाजवादियों को आगे आना चाहिए।

