कितने रिश्तों को बातों ने तोड़ दिया !
अपनों ने ही खुद अपनों को छोड़ दिया !
फिर आँखें जीवन भर यूं ही शरमाती हैं।
बोले तो पर बगैर सोच समझ कर ना बोलें
हृदय के पट बगैर सोच समझ कर ना खोलें ,
ऐसी ही कुछ बातें घर कर जाती हैं !
रिश्तों के ये जाल कटीले होते हैं ,
कुछ अपने ही बड़े हठीले होते हैं ,
बस फिर यादें ही यादें रह जाती हैं !
रहें अकेले ही अकेले क्या रहना !
कहें किसी से कहें नहीं तो क्या कहना !
कहने में भी जीभ बड़े बल खाती है !
रिश्तों का कोई मोल नहीं हमनें जाना !
ना जीवन का सच्चा रस हमनें पहचाना !
सर्प निकल जाता फिर लीक-लीक रह जाती हैं !
मैं के चक्कर में हम सब कुछ खो बैठे !
दाग समझ गोबर के सब कुछ धो बैठे !
सब को चींटी मान बने खुद हाथी बन बैठे हैं !
बिन हड्डी की जिव्हा कुछ कह तो जाती है !
कुछ बातें कुछ घाव बड़े दे जाती है !
साभार-सुप्रसिद्ध जनकवि हंसराज भारतीय, गुड़गांव, संपर्क- 98136 13075
संकलन -निर्मल कुमार शर्मा, 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र- पत्रिकाओं में पाखंड, अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक, पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ', गाजियाबाद, उप्र,
