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शहीद-ए-आजम भगत सिंह का फांसी से एक दिन पूर्व लिखा उनका देश के नाम लिखा अंतिम पत्र  

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शहीद-ए-आजम भगतसिंह को वर्ष 1931 के 23 मार्च को शाम 7.30 बजे ही ब्रिटिश साम्राज्य वादियों ने फांसी के फंदे पर झूला दिया ! उन्हें तत्कालीन लाहौर हाईकोर्ट के अंग्रेज जज जी सी हिल्टन द्वारा फांसी के निर्धारित समय 24 मार्च 1931 को सुबह फांसी देने की सजा देने के आदेश से ठीक 11 घंटे पहले ही फांसी दे दिया ! शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने अपनी फांसी से ठीक एक दिन पहले मतलब 22 मार्च को देशवासियों के नाम एक संक्षिप्त पत्र लिखकर अपना संदेश दिया था । शहीद-ए-आजम भगत सिंह ने बुलंद आवाज में देश के नाम एक संदेश भी दिया था। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते हुए कहा..,
‘ मैं ये मानकर चल रहा हूं कि आप वास्तव में ऐसा ही चाहते हैं। अब आप सिर्फ अपने बारे में सोचना बंद करें, व्यक्तिगत आराम के सपने को छोड़ दें, हमें इंच-इंच आगे बढ़ना होगा। इसके लिए साहस, दृढ़ता और मजबूत संकल्प चाहिए। कोई भी मुश्किल आपको रास्ते से डिगाए नहीं। किसी विश्वासघात से दिल न टूटे। पीड़ा और बलिदान से गुजरकर आपको विजय प्राप्त होगी। ये व्यक्तिगत जीत क्रांति की बहुमूल्य संपदा बनेंगी। ‘
भगत सिंह 23 मार्च 1931 की उस शाम के लिए लंबे अरसे से बेसब्र थे। एक दिन पहले यानी 22 मार्च 1931 को अपने आखिरी पत्र में भगत सिंह ने इस बात का ज़िक्र भी किया था। भगत सिंह ने खत में लिखा-

        ' साथियो !,
    स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता। लेकिन मैं एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ, कि मैं क़ैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता।
     मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है - इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज़ नहीं हो सकता।
    आज मेरी कमज़ोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं. अगर मैं फाँसी से बच गया तो वो ज़ाहिर हो जाएँगी और क्रांति का प्रतीक-चिन्ह मद्धिम पड़ जाएगा या संभवतः मिट ही जाए. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फाँसी चढ़ने की सूरत में हिंदुस्तानी माताएँ अपने बच्चों के भगत सिंह बनने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आज़ादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जाएगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या तमाम शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रहेगी.
      हाँ, एक विचार आज भी मेरे मन में आता है कि देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थी, उनका हजारवाँ भाग भी पूरा नहीं कर सका। अगर स्वतंत्र, ज़िंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता।
      इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच फाँसी से बचे रहने का नहीं आया। मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा? आजकल मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व है। अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है। कामना है कि यह और नज़दीक हो जाए। '

   आपका साथी - भगत सिंह, 22-3-1931 साभार 

(मूल पत्र यहीं समाप्त होता है इस पत्र में अन्तिम अक्षर कुछ अस्पष्ट हैं )

     संकलन -निर्मल कुमार शर्मा, 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पाखंड, अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक, पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ', गाजियाबाद, उप्र,
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