(5 सितम्बर, 2012 को अस्तित्व में आया डॉ. सदानंद शाही का प्रतिसंवेदन)
~ मीना राजपूत
बहुदेवोपासना वाले देश में देवताओं का दिवस मनाने का संस्कार हमें घुट्टी में मिला है | प्रमुख देवी-देवताओं के अलावा छोटे-छोटे देवताओं के भी दिन बहुरते हैं | उन्हें पूजा जाता है फिर अगले वर्ष के लिए सहेज कर रख दिया जाता हैं |
तमाम दिवसों की तरह साल में एक दिन शिक्षक के नाम भी हैं | ५ सितम्बर को प्रसिद्ध दार्शनिक राधाकृष्णन का जन्म दिन है | अध्यापक, दार्शनिक और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे डॉ० सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत के उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति बने. शिक्षक देश का प्रथम नागरिक बन जाए, शिक्षकों के लिए उससे ज्यादा गौरव की बात क्या हो सकती है. इसीलिए राधाकृष्णन के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है |
शिक्षक भावी पीढियों का निर्माण करता है, समाज में उसको विशेष सम्मान हासिल है. वैसे भी हम गुरुमहिमा के कायल हैं | शिक्षक और गुरु में काफी समानताएँ हैं, परम्परा से शिक्षक को गुरु जैसा सम्मान प्राप्त है | शिक्षक दिवस इस सम्मान भाव को संस्थागत रूप देता है | आखिर भावी पीढियों को शिक्षित करने वाले समुदाय के प्रति कृतज्ञ राष्ट्र की कुछ भूमिका बनती ही है इसलिए आज के दिन विभिन्न स्तरों पर शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है | विद्यालय, विश्वविद्यालय अवकाश प्राप्त शिक्षकों को सम्मानित करते हैं |
विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं से लेकर राज्य और केन्द्र सरकार भी शिक्षक पर मेहरबान होती है | विशिष्ट सेवा के लिए उन्हें कई तरह के ईनाम इकराम दिये जाते हैं. इधर बाजार ने भी इस अवसर के लिए कुछ खास उत्पाद तैयार किये हैं जिन्हें छात्र अपने शिक्षक को भेट करते हैं और गुरुऋण से मुक्त होने का एहसास करते हैं | फोन, एसएमएस और तमाम इलेक्ट्रॉनिक माध्यम भी शिक्षक को सम्मानित करने के आसान उपाय मुहैया कराते हैं. इस तरह सीमित होती जा रही सामाजिक भूमिका वाले शिक्षक समुदाय को सम्मानित करने के लिए शिक्षक दिवस आता है |
एक स्वस्थ और विकसित लोकतान्त्रिक समाज में शिक्षक बुद्धिधर्मी (Intellectual) की भूमिका निभाता है. इस रूप में वह सच कहता है और सच को बरतता है. लेकिन इस भूमिका में आने पर शिक्षक की स्थिति असुविधाजनक जनक हो जाती है | दुर्भाग्य से हमारा लोकतन्त्र इतना विकसित नहीं हुआ है कि वह सच सुन सके | यदि ऐसा होता तो ऐसी संस्थाएँ विकसित होतीं जहाँ सच के लिए अवकाश होता. लेकिन ऐसी संस्थाएँ विकसित नहीं हुई | कम से कम शिक्षण-संस्थाओं में हम सच के लिए गुंजाइश बना सकते थे | लेकिन ऐसा होने के अपने खतरे हैं | यदि संस्थओं में ऐसा माहौल होगा तो ऐसे छात्र भी निकलेंगे जो समाज में जाकर सच से समझौता नहीं करेंगे |
शिक्षक अगर बुद्धिधर्मी की भूमिका निभाने लगे और अपने छात्रों को बुद्धिधर्मी बनाने लगे तभी हमारा लोकतन्त्र सच्चे अर्थों में विकसित होगा. लेकिन मौजूदा समाज के लिए यह असुविधाजनक प्रस्ताव है. हम जिस तरह के समाज हैं वैसे ही संस्थान बनायेंगे, वैसे ही शिक्षक बनायेंगे और वैसे ही छात्र बनायेंगे | हमारे समाज को ऐसे शिक्षकों की जरुरत है जो अपने में सीमित रहे और धीरे-धीरे एक निरीह प्राणी में बदल जाए |
सच्चा निरीह वह होता है जो और कुछ करे या न करे किसी का नुकसान न कर सके | ध्यान से देखें तो शिक्षक इसी कसौटी पर खरा उतरने लगा है | कहीं हम शिक्षक का सम्मान उसकी निरीहता के लिए तो नहीं करते | बाज दफे यह देखने में आता है की सम्मानित होकर निरीह प्राणी और निरीह हो जाता है | अपनी निरीहता कों बचाये और बनाये रखने की सतर्क कोशिश करता है | जिस तरह शिक्षक दिवस मनाया जाता है और शिक्षक कों सम्मानित किया जाता है वह उसे निरीह बनाये रखने में मददगार साबित होता है | एक समूह के रूप में शिक्षक कों निरीह और सामाजिक प्रक्रिया से अलग-थलग रखना मौजूदा सामाजिक ढाँचे के लिए उपयुक्त है |
शिक्षा जगत में वैचारिक स्वतंत्रता के लिए गुंजाइश सिमटती गई है. उपर से नीचे तक पूरा माहौल विचार विरोधी हो गया है. इसलिए बहुधा शिक्षक धर्म का पालन करने वाले लोग हास्यपद हो जाते हैं जबकि जी हुजूरी करने वाले व्यवस्था चलाते हैं | ऐसी सूरत में बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग भी आस-पास के सत्ता केन्द्रों के सामने दुम हिलाते नजर आते हैं | अस्ल में हमारे समाज में सच का विकल्प हिलती हुई दुम बन गया है. शिक्षकों की तनख्वाहें बढ़ी हैं और सुविधाएँ भी, पर उसी अनुपात में वैचारिक स्वतन्त्रता छीजती चली गई है | इससे कल्पनाशीलता और नवोन्मेष के रास्ते भी बंद होते गये हैं |
प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्चशिक्षा तक यही हाल है. प्राइमरी स्कूल के शिक्षकों के लिए जनगणना, बी.पी.एल. कार्ड, मिड डे मील से लेकर स्कूल की इमारत बनवाने तक इतने काम हैं कि वह भूल ही गया है कि वह शिक्षक भी है. माध्यमिक शिक्षकों के लिए भी इतने तरह की औपचारिकताएं बढ़ी हैं कि शिक्षा और शिक्षण गौण कार्य हो गये हैं | उच्च शिक्षा में थोड़ी बहुत गुंजाइश थी | अमेरिकी नक़ल में सेमेस्टर सिस्टम लागू करके उसे चौपट कर दिया गया है. जहाँ छात्र संख्या सीमित है वहाँ तो फिर भी गनीमत है पर जहाँ छात्र संख्या अधिक है शिक्षक क्रेडिट का हिसाब करने, एसाइनमेंट देखने और सेमेस्टर की कापियाँ जाँचने और झूठी सच्ची ए.पी.आई. बढ़ाने में लगे हैं. ऐसे माहौल में शिक्षकों से यह उम्मीद करना कि वे सच कहने और सच बरतने का साहस करेंगे- दिवास्वप्न देखना है. अमेरिका जैसा बन जाने की हड़बड़ी में ध्यान इस ओर नहीं जाता है कि अमेरिकी विश्वविद्यालय एडवर्ड सईद और नोम चोम्स्की जैसे अमेरिका के धुर आलोचकों के लिए जगह ही नहीं पर्याप्त सम्मान भी है. अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपने बेटे के शिक्षक को लिखे पत्र में कहा था कि आप मेरे बेटे को ऐसी शिक्षा दीजिए कि उसमें अकेले पड़ जाने पर भी सच को कहने का साहस हो और वह गलत लोगों और गलत बातों का विरोध कर सके. क्या शिक्षक दिवस पर शिक्षकों से हम ऐसी माँग कर पाने की स्थिति में हैं

