,मुनेश त्यागी
सम्मानित और आदरणीय साथियों, मैं एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक रखता हूं। मेरे परिवार में एक साथ ही मेरे तीन सगे संबंधी जेल में थे। उनका नेतृत्व मेरे स्वतंत्रता सेनानी दादाजी महाशय सागर सिंह कर रहे थे और उनके नेतृत्व में मेरे दो स्वतंत्रता सेनानी ताऊजी श्रध्देय ओम प्रकाश त्यागी उर्फ़ “कानूनी” और प्रणाम सिंह त्यागी उनके साथ जेल में गए थे। वे ग्राम व पोस्ट रासना जिला मेरठ के थे। आजादी के आंदोलन के दौरान “करो या मरो और भारत छोड़ो आंदोलन 1942” के दौरान जिला मेरठ के ग्राम कैंथवाडी और ग्राम रासना आजादी के आंदोलन के बडे केंद्र थे। कैंथवाड़ी से 19 और रासना से 17 स्वतंत्रता सेनानी जेल गए थे।
गांव रासना के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल गए स्वतंत्रता सेनानियों के नाम इस प्रकार हैं महाशय सागर सिंह, ओम प्रकाश त्यागी, प्रणाम सिंह त्यागी, मास्टर रघुवीर सिंह त्यागी, रतिराम त्यागी, रेवा सिंह त्यागी, सूरत सिंह त्यागी, काले सिंह त्यागी, भ्रंग शर्मा, भिक्कन त्यागी, सेठ फूल सिंह, मास्टर सुंदरलाल छज्जू, जहरिया, मिट्ठन लाल, डालचंद त्यागी, उमराव सिंह और मुंशी सिंह।
ऐतिहासिक आंदोलन “करो या मरो” और “भारत छोड़ो आंदोलन” में हमारे दादा जी और दोनों ताऊजी तीनों एक साथ जेल में थे। यह मेरठ जिले का अद्भुत केस था कि जिसमें एक बाप अपने दो बेटों के साथ देश की जंगे आजादी की खातिर जेल में बंद थे। जेल से आने के बाद भी मेरे ताऊजियों ओमप्रकाश जी और प्रणाम सिंह में वही इंकलाबी और क्रांतिकारी जज्बा और जोशो-खरोश बरकरार था जो उन्होंने जंगे आजादी के दौर में दिखाया था। हमारे दोनों ताऊजी उस समय के क्रांतिकारी गीत, शेर और कुछ पंक्तियां हमें समय-समय पर सुनाया करते थे और हमारे घर पर जो भी कोई प्रोग्राम होता तो उसमें भी पूरे गांव के लोगों और हमारे सारे रिश्तेदारों के सामने, वे उसी जोशो खरोश के साथ अपने गीत और गाने सुनाया करते थे।
आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हमारे दिमाग में हमारे श्रद्धेय दादाजी और ताऊजियों की याद आई। हमने सोचा कि क्यों ना उनकी अनुपस्थिति में मैं ही, आपको उनसे रूबरू कराऊं और उनके गाए गए गीत और गाने और शेर आपके सामने पेश करूं और उन्हें अपनी क्रांतिकारी श्रद्धांजलि पेश करूं, तो इसलिए भारत की आजादी के महान पर्व 15 अगस्त के मौके पर, हम उन आजादी के दीवानों के गाए गीत और गानों की कुछ पंक्तियां आपके सामने पेश कर रहे हैं ,,,,,,
गाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की
तख्त लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की।
दिल फौलाद का पत्थर का जिगर रखते हैं
जान जोखों में हथेली पर सिर रखते हैं
क्यों न तड़पाए वतन की उल्फत
सोजे-दिल रखते हैं दर्दे-जिगर रखते हैं।
ना मुँह छिपा के जिये ना सिर झुका के जिये
सितमगरों की नजर से नजर मिला के जिए
एक रात कम जिये तो कम ही सही
ये बहुत है कि मशालें जला जला के जिये।
क्या भगत सिंह वीर को यूं ही भुलाया जाएगा
बेशकीमत लाल क्या यूंही का खपाया जाएगा
तोड़ दो एसेंबली घर फूंक दो सैय्याद का
तीन के बदले में यह जालिम मिटाया जाएगा।
उन्हें फ़िक्र है हरदम नया तर्जे जफ़ा क्या हो
हमें शौक है देखें जुल्म की इंतहा क्या है।
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।
अब ना अहले वलवले हैं और ना अरमानों की भीड़
देश पर मिटने की हसरत अब दिले बिस्मिल में है।
हो गए खाक तो क्या अब भी असर रखते हैं
इसी शान से शानों पर सिर रखते हैं
अब भी रखते हैं तमन्ना ऐ शहादत दिल में
आजमाले है अगर शौक दिले कातिल में।
हर सितम का हिसाब लेकर उठो
फैसलाकुन जवाब लेकर उठो,
खुद बदल जाएगा निजामे कुहन
कुव्वत ए इंकलाब लेकर उठो।
बढ बढ रे नौजवान चल चल रे नौजवान
रुकना तेरा काम नहीं बढना है तेरी शान।
उठो नौजवानों क्या सोते रहोगे
जुलम जालिमों के यूं सहते रहोगे?
मैं फानी नहीं हूं फनाह क्या करेंगे
मेरा मारकर वो भला क्या करेंगे
हथेली पर जो सर लिए फिर रहा हो
वो सर उसका धड़ से जुदा क्या करेंगे?
यह आरजू हमारी तुम मर मिटो इसी पर
आजाद होके रहना लो हम तो जा रहे हैं।
सितमगर की हस्ती मिटानी पड़ेगी
हमें अपनी करके दिखानी पड़ेगी,
कभी उफ न लायेंगे अपनी जुबां पर
मुसीबत सभी कुछ उठानी पड़ेंगी।
बताएं तुम्हें हम कि क्या चाहते हैं
गुलामी से होना रिहा चाहते हैं,
फकत इस खता के सजावार हैं हम
कि दर्द ए वतन की दवा चाहते हैं।
शहीदों के खूं का असर देख लेना
मिटायेंगे जालिम का घर देख लेना,
झुका देंगे गर्दन को हम जेरे खंजर
खुशी से कटा देंगे सर देख लेना।
परवाह अब किसे है जेल-ओ-दमन की यारों
इक खेल हो रहा है फांसी पर झूल जाना,
भारत वतन हमारा भारत के हम हैं बच्चे
भारत के वास्ते है मंजूर सिर कटाना।
आजादी के आंदोलन के दौरान एक बहन अपने भाई यानी बीर से एक चुनरिया मांग रही है और वह कहती है कि इस चुनरिया पर किस-किस की तस्वीर हों, ऐसी ही चुनरिया मुझे लाकर देना,,,,,
आजाद हिंद के वीर सिपाही सुभाष भी हो खड़े हुए
हाथ तिरंगा झंडा लेकर आजादी को अड़े हुए
राजगुरु सुखदेव भगतसिंह फांसी पर हो चढ़े हुए
तस्त में शाह बहादुर के लड़कों के सर हो धरे हुए
लाखों ही नर नार जेल दुश्मन की में हो पड़े हुए
मार खा रहे हों डंडों की भोजन मिलते सड़े हुए
तेग बहादुर गोविंद सिंह की खड़ी हो दो तस्वीर
चुनरिया मोको ऐसी मंगा दे मोरे बीर।
उपरोक्त गीत गानों के आलोक में हम तो यही कहेंगे कि भारत की जिस आजादी के लिए हमारे करोड़ों लोग जेल गए थे और लाखों लोगों ने अपनी जिंदगी की कुर्बानियां दी थी, वह आजादी हमें नहीं मिली है। अभी हमारे देश के एक अरब से ज्यादा लोगों को बेरोजगारी गरीबी शोषण जुल्म अन्याय भेदभाव उच्च नीच और छोटे-बड़े की सोच की गुलामियों पीड़ित हैं उन्हें उनसे वह आजादी नहीं मिली है। उपरोक्त गीत गानों और उस जज्बे का इस्तेमाल कर हम उसे सीखें और आधुनिक ज्ञान विज्ञान के आधार पर भारत में उस आजाद भारत की स्थापना करें जिसमें स्वास्थ्य रोजगार शिक्षा समता समानता और न्याय हो, आपसी भाईचारा हो। जिससे शोषण जुल्म गरीबी अन्याय और भेदभाव का पूरी तरह से विनाश हो पूरी तरह से खात्मा हो।

