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समझदार को इशारा काफ़ी है

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शशिकांत गुप्ते

सीतारामजी को पचास, साठ और सत्तर के दशक में निर्मित फ़िल्मों के गाने सुनने और उन्हें गुनगुनाने का बहुत शौक है।
आज जब मैं सीतारामजी से मिलने गया तब वे सन 1962 में प्रदर्शित दो फिल्मों के गीतों को सुन रहे थे।
सीतारामजी व्यंग्यकार है,यह स्मरण होते ही मैं समझ गया कि, जो गाने सीतारामजी सुन रहे है?
इन गानों के शब्दों में आज की व्यवस्था पर निश्चित ही व्यंग्य होंगे।
सीतारामजी ने कहा आज एक सुनियोजित साज़िश के तहत हर क्षेत्र में भ्रम फैलाया जा रहा है।
इस भ्रम के कारण आमजन की मूलभूत समस्याओं को नजर अंदाज करने का षडयंत्र रचा जा रहा है।
मूल समस्याओं को ताक में रख कर बेफजूल मुद्दों पर समय नष्ट किया जा रहा है।
किसी की शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण पत्र के नकली होने पर सवाल पूछा जा रहा है?
सवाल पूछने वाले भी सिर्फ पढ़े लिखे ही दिखाई दे रहें हैं, यदि ये स्वयं शिक्षित होते तो क्या जनता को नशा सुलभ रीति से उपलब्ध करवाने के लिए शराब की
“अ” नीति बनाते?
शिक्षित होने पर सवाल पैदा करने वालों ने तनिक अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए? एक बैरिस्टर (barrister) महात्मा गांधीजी,बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी नेहरूजी आदि थे। जिन्होंने स्वतंत्रता के आंदोलन किया और जेल गए?
एक अब्दुल रहमान अंतुलेजी थे ये भी बैरिस्टर थे। इन पर प्रख्यात व्यंग्यकार स्व.शरद जोशीजी ने व्यंग्य लिखा था।
अंतुले आए अन (un) तुले गए,सीमेंट के चक्कर में मिट्टी में मिल गए
आज सैकड़ों पढ़े लिखे laptop (लैप टॉप) लैप का हिंदी में मतलब होता है गोदी,अर्थात गोदी में रखने वाला संगणक। पीठ पर लाद कर यातायात के नियमों का उल्लंघन करते हुए प्रत्यक्ष देखें जातें हैं।
सीतारामजी ने कहा जब ऐसे दृश्य प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं,तब
सन1962 में प्रदर्शित फिल्म (61वर्ष पूर्व)। अनपढ़ के गीत की ये पंक्तियां याद आती है।
पी यू टी पुट है,तो बी यू टी बट है
ज़माने का दस्तूर कितना उलट है।
पढ़ाते हैं सब मुझको उलटी पढ़ाई
तो मैं क्या करूं

61वर्ष पूर्व की इन पंक्तियों भी सटीक व्यंग्य है।
ये बी ए हैं लेकिन चलाते है ठेला
ये एम ए हैं लेकिन बेचते करेला
ये जाहिल घसीटा मगर खाए हलवा
ये दूध में पानी मिलाता है भाई

इसी तरह सन 1962 में ही प्रदर्शित फिल्म असली नकली के इस गीत की ये पंक्तियां भी स्मरणीय हैं।
गीतकार शैलेंद्रजी रचित ये पंक्तियां व्यंग्य के लिए हितकारी हैं।
तोड़ के झूठे नाते रिश्ते आया मैं दिलवालों में
सच कहता हूं चोर थे ज्यादा दौलत के रखवालों में
बैठा मन के राजमहल में सपनों का संसार दिया
आसमान पर रहने वालों धरती को तो पहचानो
फूल इसी मिट्टी में महके तुम मानों या मानो
असली क्या है नकली क्या है पूछो दिल से…?

सिर्फ पढ़ा लिखा होना पर्याप्त नहीं शिक्षित होना अनिवार्य है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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