मुशर्रफ अली
2025 को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे आये और एनडीए की इतनी बड़ी जीत और महागठबंधन की अप्रत्याशित हार ने राजनैतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया। लोग तरह-तरह से इसकी व्याख्या करने लगे। इन्डिया महागठबंधन की हार के लिए किसी ने वोट चोरी को ज़िम्मेदार बताया तो किसी ने चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाये।
हालांकि यह बात भी सामने आयी कि 75 लाख महिलाओं के खाते में चुनाव से ठीक पहले दस हज़ार रुपये डालने और प्रवासी बिहारियों को अपने पैत्रिक गांव मुफ़्त में वापस लाने को भी, राजनीतिक विश्लेषकों ने एनडीए की जीत का कारण बताया लेकिन इस जीत के लिए कोई हार्मोन भी ज़िम्मेदार हो सकता है इस बात की शायद किसी ने कल्पना नहीं की होगी। इस लेख में इसी बात पर ग़ौर किया गया है। महागठबंधन की हार का अगर प्रमुख कारण हम खोजें तो ओक्सीटोसिन नामक हार्मोन है।
यह हार्मोन मस्तिष्क के हाईपोथेलेमस में बनता है और पीयूष ग्रन्थि से छोड़ा जाता है। इसको लव हार्मोन और बाउंडिंग केमिकल भी कहते हैं। यह तब निकलता है जब व्यक्ति सुरक्षित, महत्वपूर्ण और किसी से जुड़ा हुआ महसूस करता है। कंपनियां बाज़ार में अपना उत्पाद बेचने में इसका बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करती हैं। जब आप किसी को मुफ़्त में कोई चीज़ देते हो चाहे वह भौतिक हो या अभौतिक तो इस हार्मोन का रिसाव होता है।
भौतिक में उपहार, पैसा या कोई भी वस्तु हो सकती है जबकि अभौतिक में सम्मान, प्रेम होता है। जब कोई मुफ़्त में कोई चीज़ किसी को देता है तो लेने वाले का उससे जुड़ाव हो जाता है और लेने वाला न सिर्फ़ देने वाले से प्रेम करने लगता है बल्कि वह उसका एहसानमंद हो जाता है और फिर वह उस अहसान को किसी न किसी रुप में चुकाना चाहता है।
लोगों में यह हार्मोन पैदा हो और लोग उनके उत्पाद को खरीदने के लिए विवश हों इसके लिए उत्पाद निर्माता कंपनियां जो तरीके अपनाती हैं उन्हीं में से एक तरीका फ्री देने का है। एक शर्ट के साथ एक फ्री, इतना प्रतिशत सामान फ्री, शॉपिंग माल वाले भी फ्री के फ़ार्मूले का इस्तेमाल बिल्कुल ऐसे ही करते हैं जैसे कि चूहा पकड़ने के लिए चूहेदान में घी लगा रोटी का टुकड़ा लगाया जाता है। आप खुद सोचिये कि अगर कोई कम्पनी एक के साथ एक फ्री सामान देने लगे तो उसको दिवालिया होने में ज़्यादा समय नहीं लगेगा। इसलिए वह सामान फ्री होता नहीं बल्कि फ्री लगता है।
आमतौर पर वह और भी ज़्यादा महंगा होता है लेकिन यह तरीका इतना कारगर है कि लोग जाल में फंस ही जाते हैं। ओक्सीटोसिन का इंजेक्शन प्रसव के दौरान लगाया जाता है और इससे प्रसव जल्दी और आसानी से हो जाता है। इस इंजेक्शन का इस्तेमाल दूध देने वाले पशुओं में किया जाता है। जिन पशुओं के बच्चे मर जाते हैं उनके थनों में दूध आसानी से नहीं उतरता तब ऐसे पशुओं को यह इंजेक्शन लगाया जाता है और उसके परिणामस्वरुप शरीर में रासायनिक क्रिया तेज़ हो जाती है और न चाहते हुये भी पशु के स्तनों में दूध उतर आता है हालांकि इसका पशुओं पर इस्तेमाल प्रतिबंधित है।
शरीर में निकलने वाले रसायन जिनको हार्मोन कहा जाता है वह मानव व्यवहार को निर्देशित करते हैं। मार्केटिंग कम्पनियों ने इसे पहचाना और उसके अनुसार अपने उत्पाद की बिक्री की रणनीति बनाई। बाज़ार में इसके कामयाब इस्तेमाल के बाद पूंजीवाद ने इसको राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल किया। यह प्रयोग बेहद कामयाब रहा। हालांकि चुनाव से पूर्व मतदाताओं को रिश्वत पहले भी दी जाती रही है। शराब, सामान और पैसे बांटना पहले भी होता था लेकिन इसके पीछे कोई वैज्ञानिक खोज नहीं थी लेकिन अब इस पर इतना ज़्यादा शोध कार्य हो चुका है कि इसे चुनाव में ज़्यादा दक्षता से इस्तेमाल किया जाता है।
सरकार जो करोड़ों लोगों को पांच किलो अनाज मुफ्त में दे रही है उसके पीछे यही रिसर्च है कि मुफ्त दिये गये अनाज से मतदाताओं मे ओक्सीटोसिन हार्मोन का ब्लड में रिसाव होगा और उससे देने वाले से लगाव व जुड़ाव पैदा होगा। उसमें प्रेम और अहसान का भाव पैदा होगा और वह इस अहसान को वोट देकर चुकायेगा। इसी तरीके को कांवड़ियों पर इस्तेमाल किया जाता है। पुलिस प्रशासन द्वारा हेलीकाप्टर से फूल बरसाना इसी रणनीति का हिस्सा है।
ग़रीब कांवड़िये जिनमें अधिकांश अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े वर्ग से आते हैं वह आम तौर पर सार्वजनिक सम्मान से वंचित होते हैं उन पर उस पुलिस द्वारा फूल बरसाये जाते हैं जिनसे उनको सम्मान की जगह अपमान मिलता रहा है तब उनके द्वारा मुफ्त में सम्मान मिलना उनमें एक अभूतपूर्व खुशी का अहसास पैदा करता है। उनके अहम को इससे संतुष्टि मिलती है। उन्हें पता है कि कांवड़ यात्रा के बीच जो भोजन, महिलाओं और पुलिस द्वारा उनके पांव दबाना और उन पर आकाश से पुष्प वर्षा का होना इसके पीछे बीजेपी सरकार है इसलिए वह उससे उपकृत होकर बदले में उसको वोट देते हैं।
एहसानमंदी का यह हार्मोन चुनाव जीतने में बेहद अहम भूमिका निभाता है यह वामपंथियों ने कभी सोचा नहीं होगा कि जो पश्चिम बंगाल में 34 साल कम्युनिस्टों का शासन रहा उसके पीछे इसी ओक्सीटोसिन नामक हार्मोन की भूमिका रही है। 1978 में वाम मोर्चे की सरकार ने आपरेशन बर्गा चलाकर बटाईदारों को स्थायी किया और कृषि भूमि सीमा हदबंदी से हासिल ज़मीन का भूमिहीन किसानों में बड़े पैमाने पर बंटवारा किया गया। उस काम से किसानों का कम्युनिस्टों से जुड़ाव हुआ वह उनके एहसानमंद हुए और भूमि से वंचित किसानों को जब मुफ्त में ज़मीन मिली तो उन्होंने इस एहसान के बदले में 34 साल तक कम्युनिस्टों को वोट देकर एहसान चुकाया।
यहां वामपंथियों से चूक यह हुई कि वह इस बात को पहचान नहीं पाये कि 34 साल में वह पीढ़ी जिसे ज़मीन मिली थी और जो एहसानमंद थी वह बूढ़ी हो गई या मर गई। इस बीच उसका परिवार बढ़ गया और युवा पीढ़ी ने उसकी जगह ले ली। इस युवा पीढ़ी को मुफ्त में कोई चीज़ हासिल नहीं हुई थी इसलिए उस पर कम्युनिस्टों का कोई भी एहसान नहीं था जिसे वह चुकाते। यह युवा पीढ़ी बेरोज़गार थी और उसका समाधान कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार नहीं कर पा रही थी इसलिए उस पीढ़ी ने कम्युनिस्टों को हटाकर ममता बनर्जी से अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीदें बांध ली और इसके नतीजे में कम्युनिस्टों को सत्ता छोड़नी पड़ी।
अगर कम्युनिस्ट जन मनोविज्ञान को अपने अध्ययन में शामिल करते और प्रचार के आधुनिक मनोविज्ञान पर अपडेट रहते तो वह युवाओं के लिए भूमि का कोई विकल्प तलाश करते। उद्योग एक विकल्प था लेकिन उसको देर में शुरू किया गया और उससे पहले जो व्यापक स्तर पर जन सहमति निर्माण करना था वह नहीं किया गया। त्रिपुरा में भी बीजेपी ने इस हार्मोन को वहां के सरकारी कर्मचारियों में सक्रिय करने के लिए सातवें वेतन आयोग को लागू करने का वायदा किया और चार्ट बनाकर उन कर्मचारियों को बताया गया कि ऐसा करने से हर व्यक्ति को कितना अप्रत्याशित लाभ मिलेगा बस उनका जुड़ाव बीजेपी से हो गया।
शोध से पता चलता है कि उपहार प्राप्त करना, खासकर अप्रत्याशित उपहार, मस्तिष्क के उन क्षेत्रों को सक्रिय करता है जो सुख और सामाजिक संबंध से जुड़े हैं, जिससे ऑक्सीटोसिन के साथ-साथ डोपामाइन और सेरोटोनिन जैसे अन्य फील-गुड रसायनों का स्राव होता है। इससे वार्म ग्लो प्रभाव पैदा होता है, जो देने वाले और प्राप्तकर्ता के बीच भावनात्मक बंधन को मजबूत करता है। उदाहरण के लिए अध्ययनों में उपहार प्राप्त करने के तुरंत बाद व्यक्तियों में ऊंचे ऑक्सीटोसिन स्तर मापे गए हैं, जो विश्वास और संबद्धता की भावनाओं से जुड़े हैं। राजनीतिक संदर्भ में, उपहार में नकद वितरण, भोजन, कपड़े या सेवाएँ (जैसे मेडिकल कैंप या बुनियादी ढांचे के वादे) शामिल हो सकते हैं, जो उम्मीदवारों या पार्टियों द्वारा अभियान के दौरान वितरित किए जाते हैं। पारस्परिकता और उसका मतदाता व्यवहार से संबंध होता है।
पारस्परिकता एक मौलिक सामाजिक मानदंड है जब कोई आपको कुछ देता है, तो आप मनोवैज्ञानिक रुप से बाध्य महसूस करते हैं कि बदले में कुछ दें। उपहार कर्ज की भावना पैदा करते हैं जो वोट को प्रदाता की ओर झुकाते हैं। ऑक्सीटोसिन इसे विश्वास और सहानुभूति बढ़ाकर सुगम बनाता है, जिससे मतदाता, दानदाता के दोषों को नजरअंदाज करके, प्रतिस्पर्धी विकल्पों को भूलने की अधिक संभावना रखते हैं और मतपेटी पर फायदा लौटाते हैं।
राजनीतिक विश्वास में ऑक्सीटोसिन की भूमिका इसे विस्तारित करती है। प्रयोग दिखाते हैं कि यह प्राथमिकताओं को बदल सकता है, विपक्षी समूहों या व्यक्तियों के प्रति गर्मजोशी बढ़ाकर, जिससे स्विंग वोटर, तोहफ़ा देने वाले उम्मीदवार के प्रति अधिक अनुकूल हो जाते हैं। ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन राजनीतिक राय और विश्वास को प्रभावित करते हैं, अध्ययन दिखाते हैं कि वे सहानुभूति या समूह संबद्धता बढ़ाकर भी वोटिंग प्राथमिकताओं को बदल सकते हैं।
हालांकि, प्रभाव व्यक्तिगत कारकों जैसे लिंग, संबद्धता की मजबूती या सांस्कृतिक मानदंडों पर निर्भर करते हैं उदाहरण के लिए, ऑक्सीटोसिन मजबूत पक्षपाती मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकता। हालांकि मतदाता बिना वोट बदले तर्कसंगत रूप से उपहार स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन अवचेतन में ऑक्सीटोसिन-चालित खिंचाव अक्सर जीत जाता है। राजनेता, राजनीतिक व्यापार में इसका उपयोग करते हैं ताकि नीतियों पर निर्भर रहने के बजाय, मतदाताओं की भावनात्मक वफादारी बनाई जा सके।
फ्री गिफ्ट कैसे ओक्सीटोसिन रिलीज़ करती है इसका प्रयोग मार्केट रिसर्च कम्पनियां करती रहती हैं इसी तरह का एक प्रयोग एक रेस्तरां ने किया। उसने एक से दो सप्ताह की अवधि में अपने यहां आने वाले ग्राहकों की खरीद के आंकड़े एकत्रित किये। उन्होंने उन परिवारों पर अपने प्रयोग को केन्द्रित किया जो अपने बच्चों के साथ आते थे। उन परिवारों में से कुछ परिवार के बच्चों को रेस्तरां में प्रवेश करते समय फ्री में रंग बिरंगे गु़ब्बारे दिये गये। इसके साथ ही माता-पिता को थैक्यूं लिखे कार्ड दिये।
ऐसे परिवार भी चुने जिनके बच्चों को गुब्बारे नहीं दिये गये थे। यह गुब्बारे 500 परिवारों के बच्चों को दिये। एक गुब्बारे पर उनका 5 रुपये खर्च हुये इस तरह 500 गुब्बारों पर 2500 रुपये खर्च हुये लेकिन देखा गया कि उन परिवारों ने जिनके बच्चों को गुब्बारे दिये गये थे ने उन परिवारों की तुलना में जिनके बच्चों को गुब्बारे नहीं दिये गये थे 15 से 20 प्रतिशत ज़्यादा खरीदारी की। इसके अलावा उनमें से 20 प्रतिशत दोबारा रेस्तरां में आये। रेस्तरां ने हिसाब लगाया कि उसने 2500 रुपये गुब्बारों पर खर्च करके लगभग 75000 रुपये अतिरिक्त कमाई की अर्थात लागत से 30 प्रतिशत अधिक कमाई तो यह असर होता है फ्री में उपहार देने का।
आप जानते ही हैं कि बीजेपी जनता को मुफ्त की रेवड़ियां देने की पक्षधर नहीं है लेकिन वोट की शक्ल में मिलने वाले लाभ को देखते हुये वह पांच किलो अनाज दे रही है। बिहार चुनाव इतने बड़े पैमाने पर जीतने का प्रमुख कारण ही मुफ्त उपहार हैं जिसने ओक्सीटोसिन नामक हार्मोन को पैदा किया और वोट बीजेपी को मिले। 10 हज़ार रुपये पाने वाली महिलाओं में इतना ज़्यादा बीजेपी से जुड़ाव हुआ कि उनका वोट प्रतिशत पुरुषों के 62 प्रतिशत की तुलना में 71.6 प्रतिशत रहा। इसी तरह 243 सीटों पर प्रवासी मज़दूरों का मत प्रतिशत बढ़ गया। हालांकि महागठबंधन के हारने के और भी कारण रहे हैं।
महागठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर विवाद रहा जिससे उनमें आपस में तालमेल में कमी आई कई जगह वह आपस में लड़े और कुछ सीटों पर जनसुराज पार्टी और ओवैसी की पार्टी ने गठबंधन के वोट काटे। वामपंथियों का पारम्परिक आधार क्योंकि ग्रामीण दलित, गरीबों और आदिवासियों में था इसलिए जहां सबसे ज़्यादा उनके वोट स्पेशल इंटेन्सिव रिवीज़न में कटने से उनको नुकसान पंहुचा वहीं फ्री की योजनाओं के प्रभाव में उनके मतदाता भी बह गये।
आज अगर चुनाव में विपक्ष को बीजेपी का मुकाबला करना है तो उन्हें प्रचार मनोविज्ञान में दक्षता हासिल करनी होगी। हमारे शरीर से निकलने वाले हार्मोन हमारे अन्दर कौन से भाव पैदा करते हैं और उसका मतदाताओं के व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है इसको जानना होगा। लोग विकास और काम पर वोट नहीं देते बल्कि भावनाओं के आधार पर वोट देते हैं। आज मनोविज्ञान इतना आधुनिक हो गया है कि इसके लिए बाकायदा न्यूरोमार्केटिंग एक विषय के तौर पर पढ़ाया जाता है। न्यूरो मार्केटिंग एक ऐसी तकनीक है जो न्यूरोसाइंस और मार्केटिंग के सिद्धांतों को मिलाकर उपभोक्ताओं के व्यवहार और निर्णय लेने की प्रक्रिया को समझने और प्रभावित करने का प्रयास करती है।यह मस्तिष्क की प्रतिक्रियाओं, जैसे भावनाओं, ध्यान और स्मृति, का अध्ययन करती है ताकि यह जाना जा सके कि लोग किसी उत्पाद, सेवा या संदेश के प्रति कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। जैसे एमआरआई मशीन से शरीर के अन्दर का पता लगाया जाता है वैसे ही एफएमआरआई मशीन पर व्यक्ति को लिटाकर उस पर रंगों, विज्ञापनों का क्या प्रभाव पड़ता है इसकी जांच होती है। किस विज्ञापन से, कौन से भाव पैदा होते हैं यह मशीन उसको रिकार्ड करती है। राजनीति में न्यूरो मार्केटिंग का उपयोग मतदाताओं के दिमाग को समझने और उनके वोटिंग व्यवहार को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। जब पूंजीवाद मतदाताओं के व्यवहार का इतना सघन अध्ययन करता है और उसके अनुरूप अपनी रणनीति बनाता है ऐसे में उसके विरोधियों को भी इन सब में द़क्षता हासिल करनी होगी अब पुराने तरीकों से काम नहीं चलेगा। अगर आप बैलगाड़ी से कार का मुकाबला करेंगे तो आपको पिछड़ना ही है।

