Site icon अग्नि आलोक

*सौ साल पहले ओडिशा में महात्मा गांधी:सत्य, न्याय व अहिंसा , सत्याग्रह के हथियार से ब्रिटिश विरोधी संघर्ष का नेतृत्व*

Share

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष के साथ-साथ समाज सुधार और आत्मनिर्भरता की अलख जगाने वाले महात्मा गांधी का ओड़िशा प्रवास स्वतंत्रता आंदोलन का ऐतिहासिक अध्याय बन गया। 1921 और 1925 में कटक में हुए उनके प्रवास ने खादी, चरखे और ग्रामोद्योग के जरिए स्वदेशी की ताक़त का एहसास कराया। अस्पृश्यता उन्मूलन और नशाबंदी का संदेश देते हुए बापू ने ओड़िशा की जनता को आज़ादी की लड़ाई से गहराई से जोड़ा।

डॉ. विश्वजीत
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के चंगुल से भारत को मुक्त करने के लिए आंदोलन और रचनात्मक दोनों मार्ग अपनाए थे। गांधीजी समझते थे कि स्वदेशी और स्वावलंबन के साथ-साथ अस्पृश्यता उन्मूलन और सांप्रदायिक एकता के माध्यम से ही भारतीयों को एकजुट कर स्वतंत्रता संग्राम के लिए तैयार किया जा सकता है। खादी और चरखे की पुनर्स्थापना, ग्रामोद्योग के माध्यम से ग्रामीण भारतीयों को रोजगार देना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली आध्यात्मिकता और सत्य, न्याय व अहिंसा के मार्ग पर सत्याग्रह के हथियार से निडर होकर ब्रिटिश विरोधी संघर्ष का नेतृत्व करते थे।

1921 के मार्च महीने में गांधीजी पहली बार कटक आए थे। बिनोद बिहारी में महिलाओं को संबोधित करने के बाद, जब उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम निधि के लिए चंदा मांगा, तो महिलाओं ने अपने शरीर से सोने-चांदी के गहने उतारकर गांधीजी के हाथों में दे दिए। तभी एक घूंघट वाली महिला ने खादी के सूत का एक माला उनके हाथ में दे दिया। इस घटना ने महात्माजी को आश्चर्यचकित कर दिया। उत्कल जैसे पिछड़े इलाके में उनके सपनों का खादी सूत! उन्हें पता चला कि रमादेवी चौधुरी ने अपने ताउ मधुसूदन दास से पत्थर के चरखे पर सूत कातना सीखा था, और यह सूत का माला उसी की उपज था। उसी दिन से महात्माजी के आजीबन प्रिय बने रहें मधुसूदन और उनकी भतीजी रमादेवी।

उत्कल टैनरी जिस सपने के साथ बनाई गई थी, वह धीरे-धीरे विफल होने लगी थी। मामूली खामी देखते ही जूतों को खारिज कर दिया जाता था। सिर्फ मृत गाय-बैलों की खाल से जूते बनाने का फैसला लिए जाने के कारण पर्याप्त मात्रा में कच्चा माल मिल पाना संभव नहीं हो पा रहा था। साहूकारों की बार-बार की तागीद मधुसुदनजी को बेचैन किए दे रही थी। कांग्रेस में न होने के बावजूद, अपने पुत्रतुल्य मोहन दास गांधीजी के काम और योजनाओं से काफी प्रभावित थे। इसीलिए 1924 में 5 फरवरी को मधुसूदन साबरमती जाकर गांधीजी से मिले और उत्कल टैनरी की स्थिति के बारे में बताया तथा इसे बचाने के लिए गांधीजी की सहायता मांगी।
1925 की 19 अगस्त, सुबह 4 बजकर 46 मिनट। कटक स्टेशन पर पुरी एक्सप्रेस रुकी। गांधीजी के साथ गोरक्षा कार्यकर्ता रंगलाल मोदी और गांधीजी के सचिव महादेव देसाई तथा एक दिन पहले से आए बंगाल के प्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्रामी और रसायनशास्त्री सतीश चंद्र दासगुप्ता मौजूद थे। स्टेशन पर ओड़िया जाति के तीन सिरमौर उत्कल गौरव मधुसूदन, उत्कलमणि गोपबंधु और पुण्यात्मा गोपबंधु चौधुरी ने गांधीजी का स्वागत किया। स्वयंसेवकों ने पहले से ही पूरे कटक शहर में घूमकर स्टेशन पर न जाने की जितनी मनाही की थी, भीड़ उतनी ही उमड़ पड़ी। किसी तरह भीड़ को चीरकर मोटर कार में बैठाकर गांधीजीको मधु कोठी (अब शैलबाला महिला महाविद्यालय) की ओर ले जाया गया।

सुबह के समय उत्कल टैनरी में एक घंटे तक घूमकर बापू ने देखा। घुमाकर दिखा रहे थे स्वयं मधुबाबू। चमड़ा कसने से लेकर चमड़ा रंगने और जूता बनाने तक सब कुछ देखकर महात्माजी अभिभूत हो गए। टैनरी के बाहर बबूल के पेड़ों के बगीचे में सजे मंडप में महात्माजी को टैनरी श्रमिक संघ की ओर से एक अभिनंदन पत्र दिया गया। हल्के भूरे रंग के चमड़े पर नीले रंग के चमड़े की बॉर्डर वाले इस मोमेंटो को, जो कटक प्रिंटिंग कंपनी द्वारा छापा गया था, एक दलित बच्चे ने पढ़ा-“पतितबांधव महात्मा श्री मोहन दास करम चंद गांधी उदारचरितेषु”! इसके जवाब में गांधीजी ने कहा कि टैनरी में अस्पृश्य जातियों को काम करने का मौका देकर जिस तरह से प्रोत्साहित किया जा रहा है, उससे वे अत्यंत प्रसन्न हैं। हिंदू धर्म में अस्पृश्यता नहीं है। जब तक भारत से अस्पृश्यता नहीं हटेगी, तब तक स्वराज नहीं आएगा। उन्होंने सभी श्रमिकों से टैनरी के प्रति सहानुभूति रखकर काम करने की अपील की। वहां से पास के कुष्ठाश्रम गए। बापू ने कुष्ठ रोगियों की स्थिति का जायजा लिया और साथ में मौजूद लोगों को दिखाया कि कुष्ठ एक छूत की बीमारी नहीं है।

पुण्यात्मा गोपबंधु चौधुरी की इच्छा थी कि बापू जगतसिंहपुर स्थित अलका आश्रम का दौरा करके वहां का काम देखें। गांधीजी का जल्दबाजी में वहां जाना संभव नहीं हो पाया, इसलिए दो-तीन लॉरी में भागीरथी महापात्र के नेतृत्व में अलका आश्रम के कार्यकर्ता, कुछ छात्र और सामान मधुबाबू के घर लाए गए और एक दिन के अंदर वहां एक प्रदर्शनी लगा दी गई। कपास से लेकर खादी बुनने तक का हर काम उस प्रदर्शनी में दिखाया गया और कार्यकर्ताओं को कैसे प्रशिक्षण दिया जा रहा है, सब दिखाया गया। गांधीजी प्रदर्शनी देखकर बहुत खुश हुए और अलका आश्रम के छात्रों, शिक्षकों और कार्यकर्ताओं के लिए संदेश दिया कि “तुम्हारा अपना जो एक-एक मन है, तुम सभी लोगों के सभी मनों को पाश्चात्य सभ्यता की इतनी-इतनी फर्द ब्लॉटिंग पेपर में परिवर्तित न कर दो।” ब्लॉटिंग पेपर की उपमा समझाने के लिए मधुबाबू के कहने पर महात्माजी ने उसका अर्थ स्पष्ट रूप से समझाया।

दोपहर में कटक म्युनिसिपैलिटी के मैदान में विशाल सार्वजनिक सभा का संचालन कर रहे थे मधु बाबू, उत्कलमणि गोपबंधु और पुण्यात्मा गोपबंधु चौधुरी। म्युनिसिपैलिटी की ओर से मानपत्र दिया गया। गांधीजी ने इस सभा में कहा कि आपका प्रमुख कर्तव्य आलस्य का त्याग है। उत्कल में गरीब और भिखारियों की संख्या इतनी अधिक है कि देश में भी इतने गरीब या भिखारी नहीं हैं। कर्तव्य पथ से विचलित नहीं हुआ जा सकता। भीख मांगकर खाना चोरी की प्रवृत्ति है। चरखे पर सूत कातकर पेट पालना उत्कलवासियों का प्रमुख कर्तव्य है। पलायन की समस्या भी इसके माध्यम से हल होगी। जोरदार बारिश के बावजूद लगभग बीस हजार लोग इस सभा में भीगते हुए गांधीजी को मंत्रमुग्ध होकर सुन रहे थे। बारिश के कारण महिलाएं महात्माजी से मिल नहीं पाईं।
अगले दिन सुबह, वर्तमान स्टुअर्ट विज्ञान महाविद्यालय परिसर स्थित बैपटिस्ट चर्च में आध्यात्म संबंधी चर्चा की। दोपहर में अनाथ आश्रम के नाम से प्रसिद्ध स्वामी विचित्रानंद कल्याण आश्रम जाकर वहां पितृ-मातृहीन बच्चों से मिलकर आशीर्वाद दिया और रमादेवी, सरलादेवी आदि प्रमुख महिलाओं से मुलाकात कर खादी आंदोलन और चरखे के बारे में विस्तार से बात की। वहां से लौटकर बापू ने टाउनहॉल परिसर में एक महिला सम्मेलन को बीस मिनट तक संबोधित कर चरखा और नशाबंदी के बारे में बताया। वहां से जाकर स्वराज आश्रम पहुंचे। वहां ओडिशा के विभिन्न हिस्सों से आए कतार भाई-बहन सूत कात रहे थे। यह देखकर बापू मुग्ध हो गए। स्वराज प्राप्ति के लिए सूत कातना ही एकमात्र कार्य है, यह उन्होंने वहां स्पष्ट रूप से समझाया और दूसरे कतार बैठे लोगों के साथ खुद भी चरखे पर सूत काता। शाम होने लगी। बापू लगातार दौरे में हैं। वहां से निकलकर ओडिआ बाजार स्थित जानकीनाथ भवन की ओर चले पड़े। वहां रायबहादुर जानकीनाथ बोस (नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पिताजी) कटक के प्रमुख बंगाली लोगों की एक सभा महात्माजी के लिए बुलाए गये थे। वहां देशबंधु चित्तरंजन दास के भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान के बारे में चर्चा की और स्वदेशी आंदोलन विशेषकर खादी आंदोलन के प्रति उनकी सहानुभूति के बारे में बात की। देशबंधु की स्मृति में देशबंधु चित्तरंजन दास फंड बनाए जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसके लिए धन संग्रह कर रहे होने की बात कही। इसी धन से मातृ मंगल केंद्र खोलकर गांव की महिलाओं के लिए वैज्ञानिक प्रसव व्यवस्था कराने की जानकारी दी। यहां से इकतीस रुपये एकत्र किए गए। ओडिशा से छात्रों के माध्यम से दो सौ रुपये और नागरिकों से पांच सौ रुपये से अधिक एकत्र कर महात्माजी कलकत्ता वापस चले गए।


मधुबाबू के विशाल व्यक्तित्व से महात्माजी काफी प्रभावित हो गए थे। हालांकि उत्कल टैनरी के उद्धार के मामले में वैचारिक मतभेद के कारण यह संभव नहीं हो पाया। मधुबाबू सोचते थे कि गांधीजी के प्रभाव में मध्यवर्ग और उच्च वर्ग के लोग पैसा लगाएंगे, तो खुद दिवालिया होने से बच जाएंगे और टैनरी भी बच जाएगी। उत्कल टैनरी के क्षेत्र में मधुबाबू जैसे एक भावुक व्यक्ति के ऐसा सोचने के बावजूद, गांधी सोचते थे कि सिर्फ पूंजी निवेश ही नहीं, सफल व्यवसायियों द्वारा चलाए जाने पर ही यह बच पाएगा। प्रबंधनगत कारणों से यह औद्योगिक संस्था बीमार हो रही है, यह मधुबाबू नहीं समझ पा रहे थे। इसके लिए इस संस्था का मालिकाना हक अपने हाथ में लेकर चलाने की तैयारी कर रहे हैं, यह बात घनश्यामदास बिरला को बापू ने पत्र लिखकर बताई थी। हालांकि समय चक्र में दोनों ही बातें संभव नहीं हो पाईं और उत्कल टैनरी काल के गर्भ में लीन हो गई। मधुबाबु के आह्वान पर उत्कल में दूसरी बार दौरे पर आए महात्मा इस धरती के साथ अपने संबंधों को और भी मजबूत कर पाए थे।

Exit mobile version