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भगवा रंग के पर थोड़ा स्थूल विमर्श जरूरी है

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केशव कृपाल श्री केशव

भगवा रंग के ऊपर थोड़ा स्थूल विमर्श जरूरी है। इस श्रेणी के रंगों में सिंधुरवर्ण है जिससे हनुमानजी और गणेशजी की मूर्ति का लेपन होता है तथा जो स्त्रियों की मांग का सौभाग्य है। जोगियों यानी नाथसंप्रदाय का रंग जोगिया रंग‌ कहा‌ जाता है, प्रकृति की सुषमा से‌ अलंकृत केसरिया रंग, भारतीय राष्ट्रध्वज का शीर्ष है। 

‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ का बसंती रंग याद होगा। सादृश्यता वश उदय और अस्तकालीन सूर्य का वर्ण तथा प्रज्ज्वलित अग्नि का वर्ण। कुछकुछ गहरी हरिद्रा (हल्दी) और पके संतरे का रंग यानी ऑरेंज कलर आदि का एक ही कुटुंब है। वैसे तो पका आम, पपीता सब भगवा है।

संन्यासियों, ऋषियों और परिव्राजकों द्वारा पुरातनकाल में जिस रंग का प्रयोग हुआ गैरिक वर्ण‌ (गेरुआ) कलर, जिसे अंग्रेजी में ‘ओकर’ कहते हैं। साधकजन रुई से तैयार वस्त्रों को पहाड़ों पर मिलने वाले इस लाल खड़िया और जल में में सान लेते थे। जब यह मद्धिम पड़ता तो उस पर दोबारा वही मिट्टी चढ़ा देते थे जिसे गेरू कहा जाता है। परिधान की दृष्टि से संतों की वेशभूषा यही थी और इसका प्रयोग सनातनधर्मी, सिख और बौद्ध निर्विरोध रूप से करते थे।‌ इसी को काषाय वस्त्र भी कहते थे जो परमहंसों और अनासक्त संतों की रहनी का प्रतीक माना जाता था।

साकार ‌उपासना में इस भगवा नामक रंग का कुछ ज्यादा दखल नहीं रहा है। भगवान शिव कर्पूर गौर हैं, नीलकंठ हैं। सरस्वती श्वेतवस्त्रावृत्ता हैं। राम और कृष्ण पीतांबरधारी हैं। सीताजी, राधाजी पीत-हरित-द्युति हैं।‌ कालभैरव और कालीजी का रंग अलग से क्या बताना! यज्ञादि में जो सर्वतोभद्र पीठ बनाया जाता है उसमें सभी रंग सम्मिलित होते हैं।‌ यह कहना कि भगवा शब्द की व्युत्पत्ति भगवान शब्द से है, कहीं से मान्य नहीं है।

बात करें भगवा की तो किसी धर्मशास्त्र में और शब्दकोश में इस वर्ण समूह के लिए भगवा शब्द प्राप्त नहीं होता। केवल महाराष्ट्र में इस रंग को भगवा केसरी कहते हैं। महाराष्ट्र के गौरव वीर शिवाजी के ध्वज के लिए भी मराठी साहित्य में भगवा शब्द का प्रयोग हुआ हो सकता है। 

नाम जो भी है, प्राचीन काल में सीताहरण के समय रावण और हनुमानजी को‌ छलने के समय कालनेमि के अलावा इस‌ रंग का पहले कभी खास दुरुपयोग नहीं हुआ।

हालिया इतिहास में ‌हिंदूमहासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना मराठी महापुरुषों के द्वारा हुई तो उन्होंने शिवाजी के इसी ध्वज को हिंदू अस्मिता का प्रतीक मानकर अपना ध्वज बनाया। संघ ने तो मात्र इस ध्वज को ही पूजनीय वंदनीय और आदरणीय होने की सर्वस्वता प्रदान कर दी। केसरिया रंग को भगवा रंग के रूप में नामांकित होने का आरंभ शायद यहीं से हुआ।

पूर्व में इस रंग की शोभा की वृद्धि करते हुए महात्मा बुद्ध, शंकराचार्य, गुरु नानकदेव, रामानंदाचार्य, संत रविदास, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस विवेकानंद ने विश्व को अपने ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित किया किंतु इसकी हकदारी पर कोई रार नहीं हुई। 

स्वाभाविक है कि महापुरुषों के इस स्वरूप को देखकर महापुरुष बनने के इच्छुक सामान्य लोग, पाखंडी साधुसंत यहां तक कि भिखारी और मंगते भी इस वस्त्र का‌ लाभ लेने लगे। उद्योगपति, फैशन डिजाइनर और फिल्म-मेकर ‌भला इस रंग को‌ क्यों न अपनाते? इसमें बुराई भी क्या थी? अन्य मनमोहक रंगों की तरह मोटर गाड़ी, बंगला और फैशन में इसका स्वच्छंद प्रयोग होता आ रहा है।‌ कानफोड़ू डीजे के पीछे चिलम फूंकते हुए कांवरियों ने तो इस रंग से सड़कें सजा दीं।

यहीं से इस रंग की एक धार फूटकर राजनीति की  ‌पयस्वनी जैसी प्रवाहित होने लगी जो ध्वज से पगड़ी में, पगड़ी से दुपट्टे में, दुपट्टे से होते हुए सदरी, कुर्ता अचकन और रजाई गद्दे तक पहुंच गई। राजनीति में अलग दिखने के लिए किसी खास नैतिक मूल्य और आदर्श की जगह यह कपड़े ज्यादा काम आने लगे।

किसी धर्म, संस्था अथवा मान्यताओं के द्वारा भले ही इस रंग का प्रयोग हो किंतु‌ इसका स्रोत प्राकृतिक है, सार्वदेशिक है और सार्वजनिक है। अगर हम लड्डू का भोग भगवान को लगाते हैं अथवा मांगलिक कार्यों में प्रयोग करते हैं लेकिन दूसरा कोई अपने कुत्ते को लड्डू खिलाना चाहता है तो हम आपत्ति नहीं कर सकते।

जो भी हो इस रंग के झंडे पर किसी का एकाधिकार हो सकता है। इस रंग के यूनिफार्म पर कोई अपना दावा पेश कर सकता है लेकिन पूरे के पूरे‌ पर रंग पर किसी का स्वामित्व संभव ही नहीं है। 

चंद्रमा शिवजी ‌के शिखर पर विराजमान हैं, हमारे नवग्रहों में एक हैं, भगवान राम और कृष्ण को चंद्र कहा गया है। कोटिजनों के आराध्य हैं। फिर भी ईद मनाने के लिए किसी ने कभी मना नहीं किया। यही चांद कई देशों के झंडे में भी है। दुनियां भर के प्रेमी-प्रेमिकाओं को अपने माशूक का मुखड़ा चांद का‌ ही नजर आता है। वे आपस में कभी नहीं झगड़ते कि मेरी प्रेमिका चांद सी है तो तुम्हारी‌ भी कैसे हो गई? मशहूर फिल्म चौदहवीं का चांद सिनेमा हॉल में भर-भर कर देखी गई थी। 

अब बेशर्म रंग पर बिलबिलाने से बेहतर होगा कि लोग अपने भीतर झांकें, आत्मनिरीक्षण करें कि उन्होंने इस रंग को बेशर्मी की हदें पार करते पहले क्यों नहीं देखा? वैसे तो सैकड़ों उदाहरण हैं।

               भावनाएं आहत होने और बॉयकॉट करने‌ का‌ हक केवल उनको‌ है जिन्हें अपने घर के भीतर भी ऐसे कृत्यों से आहत होने का कभी एहसास हुआ हो। हमारे घर रोज ही गुलगुले छनते हों तो हम बाहरी को गुड़ का परहेज नहीं सिखा सकते।‌ मौके से भावनाएं आहत हों तो भी कुछ हर्ज नहीं। किंतु हम हर वक्त आहत होने का इंतजार करते रहें तो कौन से अस्पताल में इलाज होगा?

ऐसी‌ पोस्ट से मैं न‌ किसी को अपमानित करना चाहता हूं न अपने को सम्मानित। बस एक ही उद्देश्य है कि बात जहां तक पहुंचे, खासकर नई पीढ़ी की सोच कैसे बदले जिससे धर्मनीति, न्यायनीति तथा राजनीति अपने-अपने रास्ते चल सकें। वैसे धर्मनीति यह है कि हम अपने दोषों को पहले देखें और दूर करें।‌‌ न कर सकें तो चुप बने रहें। 

Keshav Kripal Shri Keshav

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