Site icon अग्नि आलोक

*थोड़ी- सी बात संस्कार की*

Share

           पुष्पा गुप्ता

‘संस्कार’ शब्द सुनते ही हमारे मन में सहसा जो विचार उत्पन्न होता है, वह उस सूक्ष्म तत्व की ओर संकेत करता है जो हमें सुधार की ओर अग्रसर करे। 

जो सुसंस्कृत करे, वही संस्कार है। पर मूल रूप से देखा जाये तो ऐसा नहीं है। 

   संस्कार को भले ही हमने सुधारात्मक तत्व मान लिया हो पर यह एक सूक्ष्म तत्व होता है। इसका अच्छे से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह अच्छा भी हो सकता है और बुरा भी। यह श्रेष्ठ भी हो सकता है और निकृष्ट भी।

    यदि हम विचार पूर्वक देखें तो संस्कार चार प्रकार के होते हैं-

१. भावजन्य संस्कार, 

२. इच्छाजन्य संस्कार, 

३. मनोजन्य संस्कार और 

४. आत्मजन्य संस्कार। 

*भावजन्य संस्कार :*

   हमारे मन में कोई भाव उत्पन्न हुआ लेकिन किसी कारणवश विचार-शक्ति के रूप में परिवर्तित न हो सका फिर भी वह समाप्त नहीं होगा। वह अपने स्थान पर बना रहेगा। उसी जन्म में अथवा अगले किसी जन्म में अवसर देखकर वह विचार शक्ति के रूप में परिवर्तित हो ही जायेगा – इसमें संदेह नहीं। 

     भाव सूक्ष्म होता है जो पहले जन्मता है और विचार उसकी तुलना में स्थूल होता है। भाव कारण है और विचार उसका कार्य।

*इच्छाजन्य संस्कार :*

  हमारे मन में कोई इच्छा उत्पन्न हुई, मगर वह पूरी नहीं हुई। बस, समझिए वह इच्छा, भले ही बड़ी हो या छोटी, तत्काल उसका संस्कार बन जाता है और वह संस्कार अवसर खोजने लगेगा अपने को साकार करने के लिए।

*मनोजन्य संस्कार :*

  अपने मन में कोई कामना की, कोई संकल्प किया, कोई योजना बनायी, कोई काम करने के लिए सोचा और वह साकार नहीं हुआ, यदि हुआ भी तो अधूरा ही। अब वह मनोजन्य संस्कार बन गया। अवसर मिलते ही वह कर्म में नियोजित हो जायेगा। 

    रही बात अवसर की तो वह इसी जन्म में उपलब्ध् होगा या अगले किसी जन्म में , यह अनिश्चित है।

*आत्मजन्य संस्कार :*

    इसका सम्बन्ध सीधा आत्मा से समझना चाहिए। तप, साधना, उपासना, देव-दर्शन, तीर्थयात्रा आदि आत्मजन्य संस्कार हैं। जिसे साधारणतया हम मनोरथ कह देते हैं, वह वास्तव में आत्मा में आविर्भूत होता है। 

     तप, साधना, तीर्थयात्रा, देव-दर्शन का मनोरथ है, वह पूरा नहीं हुआ तो संस्कार बन गया। वह संस्कार भी पूरा होने के लिए अवसर खोजेगा। मिल गया तो ठीक, नहीं तो अगले किसी जन्म में। मानव जीवन में जो एकाएक परिवर्तन हो जाते हैं, वे चाहे अच्छे हों या हों बुरे, उनके मूल में वे संस्कार ही होते हैं एकमात्र।

Exit mobile version