~ नीलम ज्योति
पुराण कथाओं के पशु-पक्षी सामान्य पशुपक्षी नहीं है, वहाँ उनका अर्थ कुछ गहरा है, जिसे हम गणगोत्र के सूत्र से समझ सकते हैं। टोटम का इतिहास मानवीय धारणाओं, देवताओं और जन जातियों की युगगात्रा और सामाजिक विकास की आत्मकथा है, जिसको हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, वह वास्तव में समुद्र की भांति है, जिसमें संस्कृतियों की अनेक धाराएँ समायी हुई है।
रांगेय राघव ने “महायात्रा गाथा” में टिप्पणी की है कि भारतीय पौराणिक-जीवन की अनेक समस्याएं प्राचीन जातियों के” टोटम” में ही छिपी हुई हैं ।आचार्य क्षिति मोहन सेन और डा. राम विलास शर्मा ने भी टोटम या गणगोत्र के सिद्धान्त के प्रकाश में पुराकथाओं की समीक्षा की है । एक युग था, तब वर्ण नहीं था, जाति नहीं थी,कबीले थे। किसी का गणगोत्र [ totem ] नाग था, कोई सुपर्ण था,कोई जटायु था, मत्स्य, कूर्म, गज, सिंह, महिष, मयूर, अश्व, हंस, शुक, काक, नंदी, वाराह आदि हजारों गणगोत्र [ totem ] थे।
एक दिन फ़ेसबुक पर मैंने गणगोत्र पर लिखा तो फ़ेसबुक पर ही मेरे एक मित्र गंगा महतो ने बतलाया था कि हमारे कुड़मी में टोटल 81 टोटेम (गणगोत्र ) हैं। जिसमें सभी पशु पक्षियों और पेड़ पौधों से ही सम्बंधित है। मेरा टोटेम ‘कटियार’ है । जिसका अर्थ होता है ‘रेशम का कीड़ा’. हनुमान जी सुग्रीव बाली ये सब झारखंड से सम्बन्ध रखने वाले हैं इनका टोटेम ‘बन्दर’ था। और ये अपने कबीले की पहचान के लिए बन्दर का मुकुट या मुखौटा धारण करते थे।
जैसा कि काड़ा भैंसा वाले काड़ा का मुकुट धारण किये हुए मिल जाते हैं और नाग टोटेम वाला नाग का मुकुट धारण किये। हमारे टोटेम चिह्न पहले शरीर में गुदवाए जाते थे , ताकि कबीले की पहचान हो सके।
रांगेय राघव ने लिखा है कि भय भूख और आवश्यकता ने टोटम को जन्म दिया । उन्होंने लिखा है कि संसार में एक लंबा समय टोटम का रहा है । केवल भारत में ही नहीं , मिस्र में थोट देवता गरुडमुखी है , चीन में ड्रेगन की कथाएं हैं । बैबीलोनिया में जू गरुड देवता है । भरतीय पुराकथाओं में जनमेजय का नागयज्ञ , गज-ग्राह युद्ध और नाग-गरुड-युद्ध प्रसिद्ध हैं।
युगांत प्रलय के समय मत्स्य [विष्णु के प्रथम अवतार) का प्रादुर्भाव हुआ । यह नौका पर बैठे मनु की कथा है , मत्स्य पुराण भी है। मत्स्यकन्या की कथा में मल्लाहों ने मछली का पेट चीर कर एक कन्या और बालक को निकाला था । वह उपरिचर वसु का वीर्य था। पुराण की कथा है कि अमृत प्राप्त करने के लिए देवता और दैत्य समुद्र मंथन करने लगे उस समय भगवान विष्णु ने कछुआ [ कच्छप या कूर्म अवतार ] का रूप धारण किया । समुद्र में प्रवेश करके मंदराचल को पीठ पर धारण किया।
कुर्मी नाम का एक जनसमूह अभी भी है । इसका संबंध कूर्म गणगोत्र से है । वाराह पुराण की कथा के अनुसार जब हिरण्याक्ष धरती की चटाई कर के पाताल ले गया, तो वाराह भगवान ने हिरण्याक्ष का वध किया और अपने एक ही दंष्ट्र पर धारण करके पृथ्वी का उद्धार किया और उसे शेषनाग के फण पर प्रतिष्ठित किया। इस प्रकार विष्णु के दस अवतारों में से प्रथम तीन अवतार मानवेतर हैं।
मथुरा को आदिवाराह क्षेत्र माना जाता है। सोरों शूकर क्षेत्र है। विष्णु के चौथे अवतार नृसिंह का स्वरूप अर्द्धमानुषी है अर्थात आधा शरीर मनुष्य का और आधा सिंह का। नृसिंह की तरह और भी देवता हैं , जिनका रूप अर्द्ध-मानुषी है। हयग्रीव-अवतार [चौबीस अवतारों में] है – हयग्रीव [मुख घोडा का, शरीर आदमीका, हनुमान [मुख वानर का,शरीर आदमी]।
गणेश (हाथी जैसा मुँह बाकी शरीर मनुष्य जैसा), और हनुमान ( मुख और पूंछ बंदर की तथा शेष शरीर मानवीय ] प्रमुख है। चीन, जापान और तिब्बत में भी नागकन्या का आधा रूप सर्प का तथा आधा मनुष्य जैसा है। गरुड़ के संबंध में पुराणों में बताया गया है कि उसका मस्तक गरुड पक्षी के समान तथा शरीर और इंद्रियां मनुष्य-जैसी थी।
रामकथा का स्रोत भुशुंड काक है। योगवासिष्ठकार ने भुशुंड को अत्यन्त रूपवान् और श्यामवर्ण बतलाया है । भुशुंड की गणना महामनीषियों में होती थी ! और स्वयं वसिष्ठ भुशुंड से मिलने के लिये मेरुपर्वत पर गये थे। भुशुंड के पिता चंड काक ही थे किन्तु माँ हंस गणगोत्र की थी। भागवत-कथा का स्रोत शुक है।शिव पार्वती को मुंडमाला का रहस्य समझा रहे थे।
पार्वती सो गयीं। तोता हूंकरा देने लगा। शिव ने देखा तो त्रिशूल ले कर दौडे। शुक उडा, व्यासपत्नी जंभाई ले रही थीं। शुक व्यासपत्नी के गर्भ में चला गया (शुकदेव)।
जब रावण सीता का अपहरण करके ले जा रहा था तो जटायु ने रावण को वेदतत्व का प्रमाण देते हुए परस्त्री हरण का निषेध किया था और जब रावण नहीं माना तो इसने रावण को घायल कर दिया। राम को सीता हरण की प्रथम सूचना जटायु से ही मिली थी. इतना ही नहीं, जटायु ने राम को बताया कि सीता का हरण ‘बिंद’ मुहूर्त में हुआ है, इसलिए वह तुम्हें अवश्य प्राप्त होगी।
स्पष्ट है कि वेद का प्रमाण और ज्योतिष का संदर्भ देना किसी भी पक्षी के वश की बात नहीं हो सकती। जटायु गृद्ध गणगोत्र का था।
यों तो गरुड़ पक्षी का ही नाम है , विष्णु का वाहन ! लेकिन वेद और पुराकथाओं में जिस गरुड़ की कहानियाँ हैं, वह गणगोत्र अथवा टोटम-जाति अथवा कबीला है । रांगेय राघव ने महायात्रा गाथा में एक पूरे अध्याय में नाग और गरुड़ के संघर्ष का वर्णन किया है। वेद में वह श्येन का पुत्र है।
पुराकथाओं में कश्यप और विनता का पुत्र और अरुण का भाई है । गरुड़ की दो बातें ध्यान देने लायक हैं , पहली बात यह कि उसकी माँ अपनी ही सौत कद्रू की दासी है । गरुड़ उसे दासता से मुक्त करने के मिशन पर लग जाता है ,उसे निषादों , गजों , कच्छपों , और अन्य कितने ही गणगोत्रों से युद्ध करना पड़ता है । वह यक्ष ,गंधर्व और देवों से भी युद्ध करता है।
अन्त में यह अपनी माँ को दासता से मुक्त करता है। बालखिल्य उसका अभिषेक करते हैं। दूसरी महत्त्व की बात है कि, यह स्वर्ग से अमृत ले कर आया था। बाद में नाग और गरुड़ दोनों की अन्तर्भुक्ति विष्णु में हो जाती है।तैत्तिरीय उपनिषद का तीतर गणगोत्र है।
*हस्तिगण :*
हस्तिगण का देवता गजेंद्र या गणेश है। हस्तिनापुर के संबंध में डा. राम विलास शर्मा ने कहा था कि निश्चित ही इसका सूत्र हस्ति से जुडता है । रांगेय राघव ने भी लिखा है कि हस्तिनापुर हस्तिन ने बसाया था।
एक बहुत पुरानी लोककहानी है , जिसमें गान्धारी ने सोने के हाथी की पूजा की थी किन्तु जब कुन्ती पूजन को आयी तो उसे मना कर दिया गया , तब अर्जुन ने ऐरावत को धरती पर बुलवाया।
जिसे हम आकाशगंगा कहते हैं उसे इस कहानी ने ” ऐरावत हाथी की गैल” बतलाया है। अर्जुन इस रास्ते से ऐरावत को धरती पर ले कर आया। सूत्र तो यहां हस्ति-पूजन का ही है।
यही टोटम शिव-महादेव के साथ जुडता है , जब पार्वती अपने मैल से पुतला बना कर उसमें प्राण संचार करके द्वार पर नियुक्त कर देती हैं , शिव आते हैं तो द्वाररक्षक गणेश शिव महादेव को रोकते हैं , शिव त्रिशूल से गर्दन काट देते हैं , पार्वती रूठती हैं , कहती हैं कि इसे पुनर्जीवित करो।
उधर हाल का जनमा हस्ति मिल जाता है और शिवमहादेव हस्तिमुख जोड कर द्वारदेव को प्रतिष्ठित कर देते हैं। ध्यान रहे कि यह कहानी मिथकीय-भाषा में है, इसका अभिप्राय अभिधा से नहीं किया जा सकता।
यही गणेश शिवपार्वती की परिक्रमा करके प्रथम पूजा के अधिकारी बन जाते हैं। कोई भी कार्य विघ्नेश्वर की पूजा के बिना संपन्न नहीं किया जाता। ये विघ्नेश्वर कैसे बने , इसे लेकर जनपदों में भिन्न-भिन्न कहानियां हैं।
गणेश को लेकर अपने लोकायत नाम के ग्रन्थ में डी पी चट्टोपाध्याय ने एक अध्याय लिखा है। मूषक भी एक गण था। उसे लेकर भी लोक में कहानियां हैं। दीपावली पर गणेश के साथ विष्णुपत्नी लक्ष्मी की उपस्थिति का कारण लक्ष्मी के साथ जुड़े गज तत्व में देखा जा सकता है इसी के साथ हस्तिगण और मूषक जनजाति की अंतर्भुक्ति गणेश के वाहन के रुप में प्रत्यक्ष होती है। हस्तिगण के विश्वास के अनुसार धरती को दिशाओं के अधिपति दिग्गज धारण किये हैं।
*वानर गोत्रीय हनुमान :*
वाल्मीकि रामायण के अनुसार हनुमान संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाएं जानते थे। हनुमान से पहले वार्तालाप में ही राम जान लेते हैं कि हनुमान चारों वेदों का ज्ञाता है । ‘अशोक वाटिका’ में सीता से भेंट करते समय हनुमान सोचते हैं कि मैं कौन-सी भाषा में बात करूं
‘यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम्।
रावणं मन्यमानां तो सीता भीता भविष्यति।
क्या भाषाओं पर ऐसा अधिकार किसी कपि , मर्कट या बंदर का हो सकता है? इसीलिए डॉ. कामिल बुल्के ने स्पष्ट बताया था कि हनुमान वास्तव में वानरगोत्रीय आदिवासी थे।
इसी प्रकार जिस ऋक्षराज जांबवान से कृष्ण का अट्ठाईस दिनों तक युद्ध चला था और जिसकी कन्या जांबवती कृष्ण की आठ पटरानियों में से एक थी, वह रीछ नहीं हो सकता। महिष भी गणगोत्र है। महिषासुर ब्रज में भी लोकदेवता है। महिषासुर के जन्म की कथा में उल्लेख है कि रंभासुर ने महिषी को गर्भ प्रदान किया था।
नागसभ्यता बहुत व्यापक है। नाग शक्तिशाली थे। परीक्षित को नाग ने मारा था। कृष्ण ने कालिय को यमुना से दूर भगाया था। नागों ने नगर बसाये थे।तक्षशिला। नागलोक। नाग रसायन के जानकार थे। अमृत। नागों की अन्य जातियों से अंतर्भुक्ति हुई।
तब नागदेव तत्व का सूत्र व्यापक हुआ। शिव के साथ नाग, विष्णु के साथ नाग [शैया] बलराम शेषनाग के अवतार हैं।गूगापीर। उलूपी नागकन्या अर्जुन को व्याही थी। पार्श्वनाथ।
यह नाग-गाथा लंबी है।नाग , पुराण कथाओं मे दूर-दूर तक फैला हुआ है। नाग-संस्कृति में धरती को शेषनाग के फण पर प्रतिष्ठित होने का विश्वास है।
मंडूकों (मेंढकों) का राजा आयु था और उसकी कन्या सुशोभना से परीक्षित का विवाह हुआ था। जब सुशोभना परीक्षित को छोड़कर चली गयी तो परीक्षित ने मंडूक वध-सत्र किया, जिससे घबराकर मंडूकराज सुशोभना को लेकर शरण में आ गया , स्पष्ट है कि मंडूक शब्द यहाँ गणगोत्र वाचक है। मांडूक्योपनिषद है।
कपिध्वज , मूषकध्वज , मकरध्वज के उल्लेख मिलते हैं। पुराण कथाओं के पशु-पक्षी पात्रों का एक तीसरा रूप देवता के वाहन रूप में है जैसे ऐरावत हाथी (इंद्र का वाहन), गरुड़ (विष्णु), सिंह (दुर्गा), हंस (ब्रह्मा तथा सरस्वती), बैल (शिव), कुत्ता (भैरव), मूषक (गणेश), मयूर (कार्तिकेय स्वामी), महिष ( यमराज तथा शनि), उल्लू (लक्ष्मी का वाहन)। देवताओं के वाहनों से जुड़े अभिप्राय वास्तव में गणगोत्र जातियों की अन्तर्भुक्ति की कथाएं हैं।
नरक चतुर्दशी को यमराज का तर्पण करके दीप जलाकर कुत्ते की पूजा की जाती है। भागवत में पंचम स्कंध में , कंक गिद्ध बगुला और बटेर जैसे देवताओं का उल्लेख है. (भागवत ५-१४-२९)
भारत के लोकजीवन के विश्वबोध में , आचार-प्रणाली और विश्वासप्रणाली में गणगोत्र तत्त्व समाया हुआ है। भारत के जनगण को और भारत की लोकसंस्कृति को समझने के लिए गणगोत्र को समझना अनिवार्य है , नहीं तो अध्ययन के निष्कर्ष गलत ही निकलेंगे।
मानव के पशु-पक्षी और वृक्षों के गोत्र
ऋग्वेदके ऐतरेय आरण्यक में कहा है जो वङ्ग ,मगध और चेर देश के वासी हैं ,यही तो पक्षी हैं।
‘तानि यानि वयांसि वङ्गा मगधाश्चेरपदा: (ऐतरेयआरण्यक ).
महाभारत में पशु पक्षी गोत्र के राजाओं का वर्णन है :
उलूक (उल्लू ) सभापर्व 27
काक (कौआ ) भीष्म पर्व 9
कुक्कुर (कुत्ता) सभा पर्व 19
शृंगाल (लोमड़ी) हरिवंश पर्व 100
रासभ (खच्चर) सभा पर्व 51
मत्स्य (मछली) भीष्म पर्व 9
गोधा (मोनिटर लिजार्ड ) भीष्म पर्व 42
कुक्कर (कुत्ता ) भीष्म पर्व 42
महीषक् (भैंसा) भीष्मपर्व 59
मूषक (चूहा) भीष्म पर्व 59
कौक्कुटक (मुर्गा) भीष्म पर्व 60
पशु (पशु ) भीष्मपर्व 67
काक (कौआ ) भीष्मपर्व 64
नाकुल (नेवला) भीष्मपर्व 59
वृक (भेड़िया ) भीष्मपर्व 51
युधिष्ठिर के यज्ञ में भेंट लेकर आये राजा
रोमशा(सुअर ) सभापर्व 51
कंक (हंस) सभापर्व 51
कौकुर (कुत्ता) सभापर्व 52
तार्क्ष्य (गरुड़) सभापर्व 52
कुक्कुर (कुत्ता) सभापर्व 52
दुर्योधन के मामा शकुनि (चील)
शकुनि के पुत्र उलूक (उल्लू)
यादवों का एक गण कुक्कुर (कुत्ता)
कंक (हंस) शांतिपर्व 65
भीष्म पर्व 9 में वक ,कौक ,सुमल्लिका पक्षी गोत्र के राजा
तैत्तिर (तीतर) भीष्म पर्व 50
शशक (खरगोश) वनपर्व 254
अश्वक (घोड़े) भीष्मपर्व 9
वृक्षों के नाम पर गोत्रके राजा
तालचर उद्योगपर्व 140
तालजंघ वनपर्व 106
तालवन सभापर्व 31
शाल्व सभापर्व 14
करूष आदिपर्व 123
कीचक सभापर्व 52
दार्व भीष्मपर्व 9
औदुम्बर सभापर्व 52
रामायण के वानरों के गोत्र उरांव , मुंडा , तिग्गा , हलमान , बजरंग , रेद्दी , बरई , बसारे ,भैना व खंगार जातियों में मिलते हैं। भुइयां जाति का गोत्र हनुमान् है।
रेद्दी ,बरई ,गदवा ,केवत ,सुध ऋक्ष गोत्र के हैं। भैना ,उराँव ,विर्होर गिद्ध जाति हैं। उराँव ,असुर ,खरिया जातियों में रावण गोत्र होता है। रामायण के वानर , ऋक्ष , गृध्र और राक्षस आदि मनुष्यों के ही गोत्र हैं।

