Site icon अग्नि आलोक

पुरानी डायरी से गोर्की की एक कविता

Share

रेंग रहे हैं इस धरती पर
मानव रूपी ऐसे कीड़े
जो डरते हैं संघर्षों से
जो घबराते तूफानों से
ढूंढ रहे हैं ऐसा कोना
जहां न हो जीवन का रोना।
ऐसे ढोंगी ऐसे कायर
आंहे भरे कराहे पालें
इस आशा में रहे भटकते
पा जाएं सुख सुविधा दौलत
मोल बिना, बिन हाथ हिलाए
सुख घर बैठे भागा आए।
यह सब बातों के व्यापारी
सुंदर शब्दों के अधिकारी
जहां-तहां से चोरी करके
घटिया- घटिया भाव जुटाते
उन्हें ओढ़ते उन्हें बिछाते
उन पर अपनी सेज सजाते
ये घटिया , ये बोने लोग
है इनको बातों का रोग।

मैक्सिम गोर्की

Exit mobile version