
विनोद कोचर, पूर्व विधायक
बात अप्रैल1960की है।ग्यारहवीं बोर्ड को उन दिनों ‘प्री यूनिवर्सिटी’कहा जाता था जिसके बाद कालेज में प्रथम वर्ष में दाखिला मिलता था।मार्च में प्री यूनिवर्सिटी की परीक्षा देने के बाद, स्कूली बच्चों के लिए सरकार द्वारा आयोजित उत्तर भारत के पर्यटन टूर में अपने बाबूजी के मना करने के बाद भी, मैं दुकान के गल्ले से200रुपए चुराकर एक महीने के लिए घूमने चला गया तो बाबूजी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया।जब लौटा तो बाबूजी ने ये फरमान सुनाकर मेरी सिट्टी पिट्टी गुम कर दी कि अब मैं आगे नहीं पढ़ सकता
नेहरूजी के निजी सचिव द्वारा मुझे9मई1960को लिखा गया पोस्टकार्ड समय के60साल के थपेड़ों से जर्जर हो जाने के बावजूद, उसे मैंने अब तक संभाल कर रखा है जिसे पहली बार मित्रों के साथ शेयर कर रहा हूँ।इन60सालों में जिंदगी आरएसएस की हिन्दूराष्ट्रवादी संकीर्ण और घृणा फैलाऊ राजनीति में अपनी जोशीली जवानी के14साल बर्बाद करने के बाद विगत करीब44सालों से गांधी-लोहिया-जयप्रकाश-सुभाष-अंबेडकर वादी समाजवादी विचारधारा को ,कुछ वर्षों तक सक्रिय राजनीति के बाद अब मुख्यतः लेखन मनन में ही बीत रही है।नेहरूजी और उनके पूरे खानदान के खिलाफ, वैसे तो1925से ही आरएसएस परिवार नफरत का जहर फैला रहा है लेकिन पिछले8सालों से, केंद्र में इनकी हुक्मरानी के दुर्भाग्यपूर्ण दौर में तो नेहरू के खिलाफ नफरत का और झूठे आरोपों का तो जैसे सैलाब ही उमड़ पड़ा है
ऐसी विषम परिस्थिति में नेहरूजीे का,बच्चों की शिक्षा के प्रति ऐसा उत्साहवर्धक सहयोग,मैंने स्वयं अपने छात्र जीवन में महसूस किया है।शिक्षा के प्रति मोदीजी का नजरिया और बजट में शिक्षा खर्च में कटौती ही कटौती करने वाला उनका राजनीतिक कर्म उन्हें नेहरूजी के बरक्स बेहद बौना साबित करता है।
बकौल दुष्यंत:
मूरत संवारने में बिगड़ती चली गई!
पहले से हो गया है जहाँ और भी खराब