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*पौराणिक मिथकीयता की एक यथार्थपरक मीमांसा*

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            ~ डॉ. नीलम ज्योति 

     मनु के पुत्र नाभाक के वंशज रथीतर क्षत्रिय थे। उनका पुत्र जन्मना क्षत्रिय था, पर वह आंगिरस बन गया, इसलिए उनकी गणना आंगिरसों में होती है।  राजा भरत ने आंगिरस ऋषि भरद्वाज को  अपना   दत्तक पुत्र बना लिया जिससे वितथ पैदा हुए और उनसे पौरव  वंश परंपरा चली। परिणाम  यह  कि  भरत गण  अपने  क्षत्रियत्व  या  ब्राह्मणत्व या दोनों का दावा करते थे।

       इस अंश को जिसे पार्जिटर ने एक ऐतिहासिक पाठ के रूप में स्वीकार कर लिया है, परयह  किसी विक्षिप्त के प्रलाप जैसा लगता है। पर प्रलाप के भी कुछ अकाट्य सच होते हैं।    

   विक्षिप्त व्यक्ति अपने एकांत में जो कुछ बड़बड़ाता रहता है उसे ध्यान से सुनें तो  पाएंगे  कि उसमें सच्चाई है परंतु वह इसे सही क्रम और सही अनुपात में रख नहीं पा रहा है।

       वह जिस मनोदशा में बक रहा है उसमें मिलावट नहीं हो सकती, इसलिए उसका सार सत्य पूरी सावधानी से तैयार किए गए बयान से अधिक विश्वसनीय है। ये  उसके  अनुभवों, आकांक्षाओं से जुड़े तथ्य हैं, पर अपने संदर्भ से कटे हैं,इसलिए बे-सिर-पैर के (incoherent) लगते हैं।

      ये  स्मृतियां अंतर्विरोधी होने के कारण, उसके भीतर भी बेचैनी पैदा करती हैं और ये बड़बड़ाहट उसी की अभिव्यक्ति हैं।  इस तरह बकवास में दो सच्चाइयां सामने आरही हैं। एक उसके वर्तमान मनोभग्नता और दूसरा उसके विच्छिन्न अतीत के अंश जो गड्डमड्ड हो गए हैं। 

व्यर्थ कुछ नहीं होता, अनर्गलता तक नहीं।  बुरा कारीगर औजार को कोसता है और बुरा इतिहासकार सूचना के स्रोतों की अपर्याप्तता या अपवित्रता (मिलावट) को। चिकित्सक, विशेषतः मनोवैज्ञानिक किसी को नहीं कोसता। वह समस्या का सामना करता है।

      हमें ऐतिहासिक स्रोतों का उपयोग एक मनेविश्लेषक की समझ से सुलभ व्यवस्थित और बेतुकी सूचनाओं का कल्पना के उपयोग से अधिकता सार्थक उपयोग किया जा सकता है और इसकी सर्वसंगति के आधार पर उतना ही विश्वसनीय बनाया जा सकता है, जितना पुरातत्व।  

       पुराणों के  रचनाकारों द्वारा  अतीत का खंडित और असंबद्ध सूचनाओं विश्वसनीय या बनाने के लिए या अपनी इच्छापूर्ति के लिए  कुछ तालमेल बैठाते हुए एक बोधगम्य पाठ तैयार किया गया है जो  पुराणों के लेखकों और कथावाचकों को संतुष्ट कर सकता था; क्योंकि इससे उनकी जरूरतें पूरी होती थीं, पर हमारी जिज्ञासा शांत नहीं कर सकता।

       यही स्थिति उन  व्याख्याकारों की होती है  जो पौराणिक परिधि में ही खींचतान  कर संगति पैदा करने का प्रयत्न करते हैं जब कि महाकाल की झंझा से इसके खंड दूर दूर तक विखरे हैं और उनको दूसरे अनुशासनों में भी पाया जा सकता है।

      यह एक ऐसा मलबा है जिसमें कोई चीज अपनी सही जगह पर नहीं है। 

अब हम उद्धृत अंश पर विचार करें तो इसका कोई कथन सही नहीं है, पर कोई निरर्थक नहीं है।  मनु राजा नहीं हो सकते क्योंकि वह जिस अवस्था की उपज हैं वह समाज बनने की प्रक्रिया में है, पर बन नहीं पाया है। कुल या  परिवार की अवस्था में जिसकी तुलना कम्यून से की जा सकती है।  

      अभी वर्ण व्यवस्था भी स्थापित नहीं हुई है, इसलिए वह किसी वर्ण के नहीं हो सकते। उनके पुत्र नाभाक क्षत्रिय नहीं हो सकते। नाभाक एक वैदिक ऋषि हैं, काण्व वंशीय हैं और काण्व पौराणिक विवरणों के अनुसार ही आंगिरस है, इनके सूक्त में प्रतिभा का असाधारण उत्कर्ष दिखाई देता है और  बहुत से दावे अलौकिक हैं यह उसी के आधार पर मनु के पुत्र मान लिए गए हैं:[1].

उपलब्ध पुराणों और  महाकाव्यों के रचनाकारों ने ऋग्वेद का बड़े मनोयोग से अध्ययन किया था और उसका अपनी  रचनाओं में उपयोग किया था  परंतु यह देख कर हैरानी होती है कि उनका श्रम तो दिखाई देता है पर वेदों की समझ नहीं दिखाई देती।    

       मनुस्मृतिकार ने  यह सुझाया था कि वेदों की व्याख्या इतिहास और पुराणों की  सहायता से ही की जा सकती है। यह किसी ने नहीं समझाया कि पुराणों की रचना वेद की सहायता के बिना संभव नहीं है, क्योंकि इसमें स्वप्नतंत्र काम करता है। कल्पना को खुली छूट दी जाती है परंतु तर्क को स्थान नहीं दिया जाता।  

      नाभाक को उनकी  प्रचारित महिमा के अनुरूप  मनु का पुत्र बना दिया गया। पर वह तो काण्व हैं, काण्व आंगिरस हैं[2].

      यदि आंगिरस होना ब्राह्मण होना है तो नाभाक क्षत्रिय नहीं हो सकते।  उनके वंशधर रथीतर को को भी क्षत्रिय कहना ठीक नहीं। उसका पुत्र जिसका नाम नहीं दिया गया है, आंगिरस हो गया यह बेतुका है, वह तो पहले से आंगिरस या काण्व था। 

———————-

[1]  तं ऊ षु समना गिरा पितृणां च मन्मभिः।

नाभाकस्य प्रशस्तिभिः यः सिन्धूनां उपोदये सप्तस्वसा स मध्यमो नभन्तां अन्यके समे।।  

स क्षपः परि षस्वजे नि उस्रो मायया दधे स विश्वं परि दर्शतः।

तस्य वेनीरनु व्रतं उषः तिस्रो अवर्धयन् नभन्तामन्यके समे।। 

यः ककुभो निधारयः पृथिव्यामधि दर्शतः।

स माता पूर्व्यं पदं तद् वरुणस्य सप्त्यं स हि गोपा इवेर्याे नभन्तामन्यके समे।। 

 यो धर्ता भुवनानां य उस्राणां अपीच्या वेद नामानि गुह्या।

स कविः काव्या पुरु रूपं द्यौरिव पुष्यति नभन्तामन्यके समे।।

यस्मिन् विश्वानि काव्या चक्रे नाभिरिव श्रिता।

त्रितं जूती सपर्यत व्रजे गावो न संयुजे युजे अश्वान् अयुक्षत नभन्तामन्यके समे।।

    ~ऋग्वेद (8.41.2-6)

[2]  The genealogy says there were 15 parties {pakm) among the Angirasas, but 16 or 17 names are given^ namely, Ayasya, Utathya (Ucathya), Yamadeva, Ausija, Bharadvaja, Sankrti, Garga, Kanva, E-athltara, Mudgala, Yisnuvrddha, Harita, Kapi, Ruksa (read Uruksaya), Bhai’advaja, Arsabha and Kitu. Matsya 196 names all these as gotras except the last two.

     Of these parties, however, the nine, Sankrtis to Uruksayas, were not Angirasas by origin, but sprang from ksatriyas and were incorporated among the Angirasas. The Kanvas became brahmans straightway, as will be now explained, but all the rest of these became ksatriyan brahmans, as will be explained in chapter XXIII, and ultimately wholly brahmans. Most of these names are also mentioned as those of celebrated Angirasa hymn-makers.  

      Among the Angirasas were the Kanvas, and they were an offshoot from the Paurava line, as all the authorities agree, but two distinct points are assigned for their branching off in two different accounts. Both accounts say, Kanva had a son Medhatithi, and from Medhatithi were descended the Kanvayanas who were brahmans.

पुराणों का जिस तरह का पाठ पार्जिटर ने किया, उसके अनुसार आर्य आक्रमण का सिद्धान्त गलत ही नहीं असंभव है।

      [1]  भारतीय परंपरा के अनुसार आर्यों/ऐलों का अभ्युदय भारत में प्रयागराज से हुआ था। साथ ही  इससे यह भी स्पष्ट है कि वे बाहर से आए थे।

     [2] इस आधार पर  कि भारतीय राजा, ऋषि-मुनि हिमालय को और उत्तर दिशा को श्रद्धा भाव से देखते रहे हैं वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि  आर्यों (ऐलों) का भारत में प्रवेश बहुत पहले उत्तर की दिशा से और मध्य हिमालय के पार के  किसी देश से हुआ था।

     [3]  यहां पार्जिटर खींच तान करते हुए ऐलों को मानवाें से अलग और विरोधी मान लेते हैं जब कि परंपरा के अनुसार इला, मनु की दस संतानों में से एक है जिसका लिंग परिवर्तन हो गया था। इला के पुरुष से स्त्री बनने/ या कन्या के रूप में पैदा होने  की कहानी और उसका बुध के योग से पुरूरवा को पैदा करनेके बाद पुरुष (सुद्युम्न) बन जाना एक ऐसा जटिल रूपक है जिसे समझने में सभी से चूक हुई है।

       इसका व्याकरण  जरूरी है।  इ/ई, इर्/ईर् किसी पतली नली से निकलने वाले जल की ध्वनि है। इसका अर्थ जल है इसके ध्वनिभेद इल/ईल, इळ/ईळ, इड/ईड, इड़/ईड़  का जल तथा जलीय विशेषता वाले पदार्थो और  क्रियाओं और गुणों में अर्थविस्तार हुआ है। इसका विवेचन मेरे भाषा विषयक फेसबुक के लेखों में है फिर भी संक्षेप में इसे गति, कांति, आहार, आदर, ऐश्वर्य  और धरती या भूमि का आशय निहित है।

     इसे ध्यान में रखते हुए, इनसे आरंभ होने वाले और ऋग्वेद मे प्रयुक्त शब्दों के सायण द्वारा किया गया अर्थ देखें: 

      इयथ (8.1.7) गतवानसि पुरा; इयत्यै (7.42.4) उपगच्छन्त्यैः, इयर्ति (1.7.8; 1.56.4) प्राप्नोति, (8.12.31) पूजयन्तीं प्रीणयन्तीं ; इयर्मि (1.116.1) संपादयामि ;(3.34.2) प्रकर्षेण उच्चारयामि; इयानः (2.34.14) याचमानाः; (7.68.3) याच्यमानः सन्;  इयानासो (5.22.3) उपगच्छन्तः; इरज्यति (1.7.9) ईष्टे, इरज्यत् (8.40.5) प्र इरज्यत् प्रेरयति; इरज्यथः (1.151.6) ईश्वरो स्वामिनो भवथः; इरज्यन्ता (6.60.1) ईशानौ, स्वामिनौ, इरज्यसि (8.39.10) ईश; इरधन्त (1.129.2) संराधन्ते सेवन्ते; इरध्यै (1.134.2) प्रापयितुं परिचरतुं वा; इरस्या (5.40.7) अन्नेच्छया, इलयत (1.191.6) ईरयत गच्छत ; इरावती (7.99.3) अन्नवती, इलां (1.31.11) एतन्नामधेयां पुत्रीं; इलाभिः (5.53.2) बहुविधैरन्नै; इलीबिशस्य (1.33.12) इलायाः बिले शयानस्य। 

यही दशा इकार के दीर्घत्व के साथ  है:

ईजानः (4.51.7) =यागं कुर्वाणः;  (7.59.2) इष्टवानः सन् ;  ईजानं (1.125.4) =अनुतिष्ठनतं, ईजानस्य (6.48.20) =इष्टवतः;  ईजानाय (1.113.20) = हविर्भिः इष्टवते;  ईजे (6.1.9) =यजते, (6.16.4) इष्टवान्; ईट्ट (1.180.2) =स्तौति;  ईट्टे (1.134.5) = स्तौति, (5.12.6) यजति;  ईळा (8.39.1)= स्तुत्या;   ईळानाय (2.6.6) पूजयित्रे; ईळित (1.13.4) =अस्माभिः स्तुतः सन्;  ईळे (3.1.15) =याचे, (6.16.4) स्तुतवान्;  ईळेन्यः=स्तुत्यः; ईड्यः (1.1.2; 12.3) =स्तुत्यः, ईमहे (1.6.10) =याचामहे, (1.10.6) प्राप्नुमः, (1.106.4) याचामहे, ईं (1.71.4) एनमग्निं; ईयते (6.59.5) अभिगच्छति;  ईयन्ते (5.55.1) =प्राप्यन्ते; ईयसे (2.6.7) गच्छसि जानासि वा;  ईयिवांसं (3.9.4) =गच्छन्तं; ईयुः (7.18.9) आययां चक्रुः; ईयुषीणां (1.113.15) गमनवतीनां पूर्वोत्पन्नानां; ईरते (1.187.5) गच्छति संचरति,\ 

         हमने ऊपर का यह विस्तृत शब्दभंडार  उन लोगों को कायल  करने के लिए दिया है जो पौराणिक मान्यताओं की पवित्रता को बनाए रखने के लिए किसी तरह की छेड़छाड़  पर  बेचैन हो जाते हैं। वे पढेंगे नहीं.  सिर थाम कर बैठ जाएंगे। दूसरे आरोप अपनी जगह पर अडिग रहने के लिए ढूढ़ेंगे। परंतु उन लोगों को भी रास नहीं आएगा  जिन्होंने पौराणिक  विवरणों को  न तो समझा है न ही समझना चाहते हैं।

      इस बोझिल उद्धरण  से गुजरना उनके लिए भी संभव नहीं है,  जो इन दोनों शिविरों नहीं आते। वे केवल उतने ही प्रमाण चाहते हैं, जिससे  कथ्य की प्रामाणिकता सिद्ध की जा सके।  

    उनको मैं उन कतिपय शब्दो  की याद दिलाना चाहूंगी:

      इरस्या (5.40.7) अन्नेच्छया, इलयत (1.191.6) ईरयत गच्छत ; इरावती (7.99.3) अन्नवती, इलां (1.31.11) और उस मूल  रूपक की ओर लौटना चाहेंगे और निवेदन करना चाहेंगे कि इला या उर्वरा भूमि मनु की संतानों  में सबसे उल्लेखनीय है, इसका प्रतीकात्मक चरित्र जगत/धरा का लिंग परिवर्तन होता रहता है।  कभी पुल्लिंग द्युम्/अन्न, पृथुद्युम्न  – समृद्ध, कभी स्त्री लिंग – धरा, पृथ्वी, भूमि। 

      ऋग्वेद में  द्युम्न से संबंधित शब्दों का सायण ने जो अर्थ किया है उस पर ध्यान दें :

   द्युमत् (3.13.7) दीप्तिमत् रत्नकनकादिकयुक्तं;  द्युमत्तमं (5.24.2) अतिशयेन दीप्तिमन्तं; द्युम्न  (1.9.8) धनं, (3.59.6) धनं; द्युम्नं (1.77.5) द्योतमानं सोमं; द्युम्नसाता (1.131.1) अन्नस्य यशस्य वा लाभाय;  द्युम्नसाहं (1.121.8) धनस्य अभिभवितारं (यहां अर्थ करने में सायण से चूक हुई है। ग्रिफिथ इसका अनुवाद that giveth splendour किया है जो संगत है); द्युम्नहूतौ (6.26.7) धननिमित्ते स्तोत्रे; द्युम्नानि (3.40.7) द्योतमानानि; द्युम्नितमं (8.19.6) धनवत्तम; द्युम्निनः (1.138.2) द्योतनवतः यशवन्तः अन्नवन्तः वा;  द्युम्नेन (1.48.1) अन्नेन। 

       अब हम पौराणिक कथा पर आएं तो इला मनु के दस पुत्रों में सबसे बड़ा था जो उमा द्वारा शिव के साथ अपने विहार क्षेत्र में प्रवेश करने पर उसके स्त्री बन जाने का शाप दिया था।[5].

        यह विशेष प्रसंग पार्जिटर की उस स्थापना के विपरीत है जिसमें वह ऐलों को मानवों से अलग करते हुए प्रयागराज से उनका उत्थान दिखाते है।

       यह निषिद्ध क्षेत्र वह पर्वतीय ढलान है जिसमें जाने या बसने का कोई साहस नहीं कर सकता था पर मनु के सबसे बड़े और साहसी पुत्र ने इसे स्थायी कृषि के लिए चुना या कहें मनु इस कष्टसाध्य और बनों से भरे क्षेत्र को चुना। उमा और शिव का यह क्षेत्र पर्वतीय ही हो सकता था।

      जन संख्या बढ़ जाने पर उनका यहां से नीचे उतरने और क्रमशः नदियों के कछारों पर अधिकार करते हुए पूरे मध्यदेश में फैल जाने की कहानी है यह। इला का बुध से विवाह बुद्धिमानों (कृषिकर्म अपने समय का सबसे बड़ा आविष्कार था और  इस दिशा मेंअग्रसर लोगों को मनु, दक्ष, बुध, आर्य कहना उसी का द्योतक है) को इस दिशा में प्रेरित करने की ओर इंगित करता है।

      इला और  बुध की संतान  पुरुरवा  में दूसरे जन-समुदायों को कृषि की ओर आमंत्रित करने का प्रतीक लगता है। इला का  पुनः पुरुष रूप में आ जाना और उसका नाम  समृद्धि का  द्योतक है जो कृषि से पैदा हुई।

       मनु के दस पुत्रों का होना और पूरे मध्यदेश को आपस में बांट कर राज्य करना बहुत सारे समुदायों के कृषि अपनाने का द्योतक है।

        इस तरह हम पाते हैं की उत्तर की दिशा से ऐलों का आना और प्रयाग पर अधिकार करना भारत से बाहर के किसी देश से उनके आगमन का सूचक नहीं। उनका प्रसार भी इलाहाबाद से आरंभ नहीं हुआ।

      उनको संगम क्षेत्र  अधिक पसंद था इसे गर्व के साथ ऋग्वेद में दुहराया भी गया है।

        इसके मर्म को अपनी  कोशिश के बाद पार्जिटर समझ नहीं सके।  वह  उतनी प्राचीन भारतीय इतिहास की कल्पना भी नहीं कर सकते थे।  संभव है मनु के पुत्रों  का विजय अभियान अनेकानेक जनों द्वारा कृषि कर्म अपनाने  को प्रकट करता है। 

अब इस दृष्टि से देखा जाए तो भारतीय आर्य या कृषि कर्म अपनाने वाले किसी एक रक्त के नहीं थे। देव,  ब्राह्मण,  ऐल, आर्य  उन्ही जनों  से  निकले थे  जिनमें से अधिकांश नैतिक वर्जना के कारण अंत तक  कृषि कर्म से बचते रहे, आर्यों के संपर्क में आए भी तो उद्योग विद्या में तरह-तरह की योग्यताएं अर्जित करके अपनी सेवाएं प्रदान करते रहे। 

      इनके सहयोग के बिना सभ्यता का उत्थान नहीं. लगातार दुहराते हुए जब किसी झूठ को विश्वास में बदल दिया जाता है तो उसका खंडन करके भी निर्मूल नहीं किया जा सकता।

      हमारी अंतश्चेतना का अंग बन जाने के बाद वह इतना प्रबल हो जाता है कि जब उसका खंडन ऐसे प्रमाणों और तर्कों से किया जाता है हम जिनके कायल हो जाते हैं वहां भी विश्वास बना रहता है।  धर्म, कर्मकांड, पुराण, राजनीतिक प्रतिबद्धता आदि के मामले में इसे देखा जा सकता है।

       इतिहास में इसे लक्ष्य करना कुछ कठिन होता है, क्योंकि जिन तथ्यों की उपेक्षा या तोड़-मरोड़ के साथ भ्रामक प्रचार किए जाते हैं उनसे हितबद्ध लोग झूठ जिलाने के प्रयत्न में रहते है। इस को ध्वस्त करने के लिए, लगातार, कई दिशाओं से, कई अध्येताओं शोधों से उनका खंडन होने के बाद ही गांठें शिथिल होती हैं, जिसमें कहीं से कोई क्षीण से क्षीण कारण तलाश कर लोग पुराने विश्वास पर लौट आते हैं।

       इस लेखक ने भाषा से लेकर नृतत्व, पुरातत्व, वेद, उपवेद, पुराण सभी में  हस्तक्षेप करने का दुस्साहस और इन सभी की मान्य  अवधारणाओं का खंडन करने साहस यही सोच कर किया और अपने प्रमाणों से उन क्षेत्रों के मूर्धन्य विद्वानों को निरुत्तर तो किया, पर कायल न कर सका, इसका दावा  केवल पुरातत्व विदों के संदर्भ में ही कर सकता है।  

मार्क्सवादी इतिहासकारों ने तो निरुत्तर होने के बाद भी खासी फजीहत  कराने के बाद आक्रमण का राग अलापना बंद किया। पर खुल कर स्वीकार आज तक नहीं किया।  जहां तक जानकारी का प्रश्न है इन अनुशासनों में से  कोई ऐसा नहीं है जिसके विषय में मैं अपनी जानकारी को संतोषजनक मान सकूं, पर साथ ही कोई ऐसा भी नहीं जिसमें अपनी समझ को दूसरे किसी से अधिक दुरुस्त होने का दावा करने में संकोच से काम लूं।

      कारण यह था  वे सभी आर्य आक्रमण की कहानी को वास्तविकता मान  कर अपने क्षेत्र के कामों को उसके अनुसार समायोजित करते आए थे। मुझ जैसी अदना-सी और  ज्ञान और अनुसंधान के उच्च संस्थानों से विलग रहने वाली अन्वेषिका द्वारा उनकी स्थापनाओं के अंतर्विरोधों और असंगतियों को उद्घाटित करते हुए अपने प्रमाणों से उनकी  मान्यता का साधिकार और निर्णायक खंडन करने के बाद भी सभी क्षेत्रों के विद्वानों को इसकी जानकारी तक नहीं है।

     परंतु इत्तेफाकन जब उनसे सामना होता तो पहले मेरे विचार सुनकर ठहाका वे लगाते, और मैं मुस्कुराती रहती। जब मैं अपना पक्ष रखती तो चेहरे का रंग उनका बदलता था और मुझे मुस्कुराने की भी जरूरत नहीं पड़ती थी।  

यह तो आज की बात है जब आर्य आक्रमण/ आव्रजन की मान्यता ध्वस्त हो चुकी है। पर  ऐसे विद्वान, संस्कृत, इतिहास के उच्च पदों पर आसीन ‘विद्वान’  आज भी  मिल जाएंगे  जो किसी न किसी प्रसंग में आर्यों के आक्रमण  की कहानी  दोहराते हुए  ही अपनी बात शुरू करते हैं।

        मैंने उक्त बातें इस तथ्य  को रेखांकित करने के लिए लिखी कि पार्जिटर जो इतने  साहसी थे कि ब्रिटिश सत्ता के हित-अनहित की चिंता किए बिना, दावा किया था  कि पश्चिम उत्तर से भारत पर कोई भी आक्रमण नहीं हो सकता। यह असंभव है।

      यह दावा उन्होंने ग्रियर्सन और हार्नले के तर्कों और प्रमाणों की हास्यास्पदता दिखाते हुए किया था,  बार बार दुहराए गए  असत्य को सत्य सिद्ध करने के लिए जो आक्रामक- आक्रांत के तर्क सहारा देने के लिए जो प्रमाण गढ़े गए थे उनसे वह भी न बच सके। इसलिए पश्चिमोत्तर से आक्रमण की मान्यता को असंभव  मानने वाले हैं पार्जिटर भी प्रस्तावित काल से बहुत पहले हैं।   

     आर्यों के  मध्य हिमालय के उत्तर से  आर्यों या ऐलों के उससे भी अधिक असंभव आर्य आक्रमण  के शिकार हो गए। उन्हें कल्पित करना पड़ा कि ऐल या आर्य क्षत्रिय थे। ब्राह्मण,  जिनके संस्कृत पर एकाधिकार के कारण विलियम जोंस ने यह समझा था या इसकी आड़ लेकर यह समझाने का कुतर्क तैयार किया था कि उस भाषा का व्यवहार करने वाले बाहर से आए होंगे, जिसने एक एक कदम बढ़ते हुए असभ्य और दुर्दांत आर्यों के लिए आक्रमण अथवा  आव्रजन  का रूप लिया था, उसे  पार्जिटर ने  उलट दिया। 

       आक्रमणकारी,  युयुत्सा  के अनुरूप क्षत्रिय हो गए।  ब्राह्मण  इसी देश के मूल निवासी हो गए। आक्रमण का आधार ही खंडित हो गया, फिर भी आक्रमण को जारी रखना ही होगा। मुझे लगता है कि पार्जिटर की इसी मान्यता को शिरोधार्य करके कोसंबी ने अपनी वह स्थापना दी होगी जिसके प्रति अपना असंतोष मैंने इसी पुस्तक में अन्यत्र  लिखा है, “उनकी सूझ से वर्ग संघर्ष दो ऊपरी वर्णों की श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा बन जाता है, जिसमें आर्थिक पक्ष ही गायब है।

       जिन ब्राह्मणों के बीच सीमित रह जाने के आधार पर विलियम जोन्स ने यह सुझाया था कि यह भाषा भारत से बाहर कहीं और बोली जाती थी और  ब्राह्मण इसे अपने साथ लेकर भारत में घुसे होंगे, और जिसके साथ इतना भयानक और सदियों चलने वाला वैचारिक बवंडर खड़ा हुआ जो आज तक जारी है, उन ब्राह्मणों को कोसंबी ने सैंधव नगरों का पुरोहित बना दिया फिर भी भारत पर एक पर एक कई आक्रमण कराते रहे। 

एक लंगड़ी मौलिकता अपने सहारे के लिए दूसरी लंगड़ी मौलिकता को जन्म देती है और कोसंबी में और उन्हीं की अनुकृति में मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को लंगड़ी मौलिकताओं की लड़ी बना दिया और इसके बावजूद मैदान में जमे रहने के लिए दूसरे सभी इतिहासकारों को पाठ्यक्रम से ही नहींं सभी मंचों से बाहर कर दिया और अपने गोबेलियन रट से उनको सामान्य पाठकों के बीच भी निषिद्ध करते हुए  इतिहास और संस्कृति के सत्यानाश का वह काम भी पूरा कर दिया जो कलाकृतियों, देवालयों, विद्यालयों, पुस्कालयों को ध्वस्त और राख करने वालों से छूट गया था।“

       यदि कोसंबी ने अपने इस दृष्टिकोण को प्रकट करते हुए   पार्जिटर  का हवाला दिया होता तो इस मूर्खता के लिए मैं उनको उत्तरदाई नहीं मानता।   वह व्यस्त थे और जो कुछ पढ़ा था उसे व्यवस्थित ढंग से नोट नहीं किया था. इसलिए जिनको उनका अपना विचार माना जाता है उनमें से अनेक के लिए चोरी का आरोप लगाया जा सकता है, क्योंकि लिखते समय  वह अपनों में रहते थे,  विचार दूसरों के हैं , यदि  खोजें उनको रास आ गए तो वह उन्हें अपने विचार या  खोज के रूप में  पेश कर दिया करते थे। 

       इस  समय हम पार्जिटर के  आर्यों और उनके विरोधी ब्राहमणों पर विचार कर पर विचार कर रहे हैं इसलिए पार्जिटर  के  इन अंशों  पर ध्यान दें :

      Tradition thus alleged that at the earliest time all the kings and chiefs throughout India, with two exceptions, belonged to one common stock descended from Manu; and it says so doubly, because it declares, first, with regard to his sons that he divided the earth (that is, India) among them, and secondly, with regard to the offspring of his son Iksvaku that they were kings throughout the whole of India according to both the versions given (p. 257). 288

  2. The Aryans could not have established themselves in India without long and arduous warfare. Among the hostile races who possessed the country before them were not only rude tribes but also communities in a higher state of civilization (chapter XXV). The Aryans not only subdued them, but also gradually cleared much of the country of the forests which occupied a large portion of its surface, so as to render it fit for themselves, their cattle and their cultivation.  

   पार्जिटर, भारतीय पौराणिक इतिहास सही क्रम में इसलिए नहीं रख सके कि, उन्हें अपने पाठ को उन मान्यताओं से समायोजित करना पड़ रहा था, जिनको बिना परखे सर्वानुमति सी मिल गई थी और वे दूसरे प्रमाणों का निकष बन गई थीं। पुराणों में मनु को अनेक रूपों में दर्शाया गया है।

      पुराण राज्य सत्ता स्थापित होने के  हजारों साल बाद लिखे जा रहे थे,  इसलिए इनमें पृथु और उनके पिता वेन को, और असुर बलि को  राजा के रूप में दिखाया गया है और मनु को भी प्रथम राजा के रूप में चित्रित किया गया है। 

      परंतु इन सभी के साथ कुछ अन्य विशेषताएं भी जुड़ी हुई हैं, जिनसे इनकी  वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका का पता  चलता है। पुराणों  में ब्राह्मणों ने अपनी महिमा दिखाने के लिए अनेक चरित्रों  का  सत्यानाश कर दिया है। इनमें वेन भी आते हैं।

 ऋग्वेद में उनकी भूमिका कुछ अधिक सुलझे रूप में आई है। ‘अथर्वा ने  सबसे पहले यज्ञ से मार्ग प्रशस्त किया और उसी का अनुगमन व्रतनिष्ठ वेन ने किया, जिससे एक नया आलोक पैदा हुआ। उशना काव्य ने अपने जनों के साथ अन्यत्र प्रस्थान किया।

       हम यम से उत्पन्न अमरता  की साधना (यजन) करते हैं।’

यज्ञैरथर्वा प्रथमः पथस्तते ततः सूर्यो व्रतपा वेन आजनि।

आ गा आजदुशना काव्यः सचा यमस्य जातममृतं यजामहे।। 1.83.5

        हमने इस ऋचा को जिस रूप में प्रस्तुत किया है वह किंचित अटपटा है।  कारण, इसमें कई अवस्थाओं का एक साथ संयोजन कर दिया गया है।  यज्ञ का मार्ग पहली बार तैयार करना कृषि का आरंभ है। कृषि के आरंभ को सूर्योदय या नए युग का आरंभ  बताया गया है। अन्यत्र भी इसे इसी रूप में प्रस्तुत किया गया है। [0]

       [0] भाषा,  पशुपालन, कृषि, वानिकी, उर्वरा भूमि, खनन  और  जलप्रबंधन के गुर सिखाते हुए सूर्योदय करते हुए समूचे जगत में आर्यव्रत  का प्रसार किया ( ब्रह्म गां अश्वं जनयन्त ओषधीः वनस्पतीन् पृथिवीं पर्वतान् अपः । सूर्यं दिवि रोहयन्तं सुदानव आर्या व्रता विसृजन्तः अधिक्षमि। ऋ. 10.6.11) 

उशना या शुक्राचार्य जो असुरों के  गुरु हैं  और जिन्हें राजा बलि का गुरु बताया जाता है. उनका प्रस्थान, बलि के पाताल जाने के विवरण से  मिलाकर देखा जा सकता है।  कृषि का आरंभ  दुर्दिनों में हुआ था।  प्राकृतिक साधनों के क्षीण हो जाने के कारण  दुर्भिक्ष की स्थिति आ गई थी। कृषि को अमरता प्रदान करने वाले प्रयास के रूप में चित्रित किया गया है (यह है  यम से अमरता की उत्पत्ति)।

       शतपथ ब्राह्मण में यह कुछ अधिक स्पष्ट रूप में  वर्णित  है – 

वरुणप्रघासैः वै प्रजापतिः प्रजा प्रामुंचत् ता अस्य अनमीवा अकिल्विषाः प्रजाः प्राजायन्त. ( शत.ब्रा. 5.2.4.2.)

यहां वरुणप्रघास का अर्थ है धान और जव अर्थात् कृषि से उत्पादित अन्न। 

       अर्थात् उत्पादित अनाज से प्रजापति ने प्रजा को अभावों से मुक्ति दिलाई। अब वह नीरोग (अनमीव) और निष्पाप (अकिल्विष) पैदा होने लगी। हम जल को अमृत कहते हैं, कारण जल के अभाव में मृत्यु निश्चित है। अन्न को अमृत कहा गया, कारण स्पष्ट हो गया होगा।

      श्वसन को प्राण कहते हैं और श्वास के व्यायाम को प्राणायाम कहते हैं। हमारी सांस्कृतिक शब्दरचना को बहुत सावधानी से परखा और पढ़ा जाना चाहिए।                                                                                                                   

पृथु या पृथ्वी का विस्तार करने वाले, जिनके  साथ यह विश्वास भी जुड़ा हुआ है कि  उन्होंने यह नियम बनाया कि, जिस व्यक्ति ने  जितनी धरती को, समतल, झाड़-झंखाड़ से मुक्त करके कृषि के योग्य बनाया है और आगे बनाएगा,  उसका उस धरती पर सदा के लिए अधिकार हो जाएगा।   

     वन्य भूमि की आग की सहायता से सफाई  करने वालों को ‘ब्राह्मण’ (भो. बरल-जलना, बारल-जलाना; बरियार –  शक्तिशाली; बरम-अग्नि, ग्राम देवता, गृहदेवता -वास्तोष्पति); या देव (ती-आग, अग्नि के गुणों वाला, तिक्त, तीता, तिग्म, तीक्ष्ण, तिथि) जो घोषप्रेमी समुदाय में पहुंचने पर  दी – आग; देवन – जलाना; दिवस – नया प्रकाश/ तिथि;  देव- आगजनी के कारण इन्हें  कहते थे।

      ये शब्द कर्म प्रधान थे पर  बाद के ‘नकली’ ब्राह्मण  (आज के सभी ) आर्यों के दावेदार बने, नारा लगाते रहे कि,  समस्त पृथ्वी पर  उनका अधिकार था और उन्होंने इसे क्षत्रियों को दे दिया। 

       परंतु न वेन राजा थे, न पृथु ।  इनके बीच पिता पुत्र का संबंध भी नहीं है। क्या संबंध है, यह हम बता चुके हैं।  परंतु ऐसे मामलों में  हम जो कुछ कहते हैं वह संभावना है तथ्य नहीं। हमने वेन को  झूम खेती के चरण का प्रतीक बताया है और पृथु को स्थाई खेती का।  मनु की ऐतिहासिकता कृषि  से जुड़ी है।

  कृषि के आरंभ की पश्चिमी पुराण कथाओं का भारतीय पुराण कथाओं से तुलनात्मक अध्ययन हमने अन्यत्र कर रखा और दोनों में इस बात पर सहमति है कि ईदन का उद्यान  (इंद्रोद्यान) पूरब में था, जहांं देवों को निवास था, जहां से आदम निकाले गए थे और धरती (पश्चिम एशिया) में पहुंचे थे।

      भारतीय पुराणकथा के अनुसार मनु के दश पुत्रों ने समूची धरती पर अधिकार कर लिया था, जिसे राजसत्ता स्थापित करने से जोड़ने के कारण पार्जिटर दुनिया को भारत तक सीमित कर देते हैं, जब कि वास्तविक संदर्भ कृषिविद्या के प्रसार का है। पर ऐसी दशा में मनु का संबंध झूम-खेती के चरण से होना चाहिए जिसमें असुरों-राक्षसों द्वारा उत्पीड़ित देव प्राण रक्षा के लिए चिंतित और कृषिकर्म के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो कर देश-देशांतर में भागते फिर रहे थे।  

       यदि पार्जिटर ने मनु को  कृषि का आविष्कर्ता माना होता तो उनके सामने यह स्पष्ट होता कि  वह राजा नहीं हो सकते थे। संभव है इतना स्पष्ट संकेत होते हुए भी उनके मन में यह झिझक रही हो कि कृषि का आविष्कार तो पश्चिम एशिया में हुआ था, फिर भारत में इसकी कल्पना की ही नहीं जा सकती। 

      इसलिए, उनको मनु की राजा की छवि अधिक रास आई । राज-संस्था का  उदय कृषि के आरंभ के हजारों साल बाद  हुआ। इसलिए उन्हें पश्चिमोत्तर से न सही हिमालय के उत्तर से आर्यों का आक्रमण कराने की आवश्यकता पड़ी। 

      इसका निहितार्थ सभ्यता के प्रसार की दृष्टि से भले यह हुआ कि एशिया और यूरोप में भाषा, धर्म और सभ्यता का प्रसार, भारत से हुआ, जो सभी साक्ष्यों से सही सिद्ध होता है, यद्यपि इसे स्वीकृति नहीं मिल सकी है, परन्तु भारतीय संदर्भ में आर्यों के आक्रमण की सारी अनर्गलताएं कुछ विचित्र रूप में बनी रह जाती हैं।

यहां हम पार्जिटर को, वही राग अलापते देखते हैं जो, पश्चिमोत्तर से  किए गए  आक्रमणों में दोहराए जाते रहे हैं। अर्थात् भारत में उत्तर से दक्षिण तक द्रविड़ जाति के लोगों का अधिकार था। उन्होंने एक  उन्नत सभ्यता का निर्माण कर रखा था।

       आर्यों ने  उनके ऊपर आक्रमण किया। यद्यपि  द्रविड़ों ने आर्यों का बड़ी दिलेरी से मुकाबला किया, सैकड़ों हजारों ने अपने  प्राण देकर अपनी रक्षा करनी  चाही, परंतु  उत्तर के  पहाड़ी क्षेत्रों के  दुर्दांत आक्रांताओं के सामने वे टिक न सके। उनका सारा प्रयास बेकार गया। 

     खुशहाली में पली भारतीय संतानों के मामले में ऐसा ही सदा से होता आया है । आर्य आक्रमणकारियों ने उनकी बस्तियों में आग लगा दी और दुर्गों को ध्वस्त कर दिया और बहुतों को गुलाम बना दिया । उत्तर भारत से उन्हें भगा दिया।  रोचक बात यह है कि अभी तक  हड़प्पा सभ्यता का पता नहीं चला था।

      जिसके विध्वंस के विषय में मॉर्टिमर व्हीलर ने नरसंहार का ऐसा ही चित्र पेश किया था जो जांच के बाद  काल्पनिक सिद्ध हुआ।[1]

    [1] But whatever we may think of their origin, it seems to he certain that the Dravidians predominated both in Northern and Southern India before the Aryan conquest of this country…. The Dravidians had to fight for their very existence, and there are several passages in the Rigveda which indicate the severity of the struggle. But all in vain. History has repeatedly shown thal sons of India, born and brought up in her genial soil, are no match for the fresh hardy mountaineers of the north-western regions who poured into the country at irregular intervals. The Dravidians proved no exception to the rule.

      They laid down their lives in hundreds and thousands on various battlefields, and ultimately succumbed to the attack of the invaders. They put up indeed a brave fight, but the Aryans destroyed their castles, burnt their houses, and reduced a large number of them to slaves.

     परंतु  पार्जिटर जो विलक्षण काम करते हैं वह है पुराणों में दिखाए गए मनु और  उनके पुत्रों में  से एक ऐल  को मनु पर आक्रमण करने वाला आर्य सिद्ध करना।  उन्हें ऐसा लगता है कि शायद मनु, पुरूरवस, और सुद्युम्न के तीन प्रभावशाली वंशों (रेसेज) की एकमूलीयता सिद्ध करने के लिए उनको एक में पिरो दिया गया है, जब कि  वे प्रकट रूप से तीन  भिन्न वंशों  प्रतीत होते हैं। [2]

[2]  It seems probable that three different myths have been blended together in an attempt to unify the origins of three different dominant races, said to have been derived from Manuj, Pururavas and Sudyumna, and apparently constituting three separate stocks.288.

       इनमें से पहला वंश  विख्यात ऐल या ऐड वंश है जिसे  प्रायः  चंद्रवंशी  कहा जाता है, क्योंकि इसके विषय में यह कथा प्रचलित है कि सोम, अर्थात् चंद्रमा से  उत्पन्न है। दूसरे वंश को सौद्युम्न्य  वंश के रूप में  पहचाना जा सकता है,  और जैसा कि हमने पृष्ठ 255 पर दिखाया है,   इसकी इतिहास में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही।

       तीसरे का कोई आम नाम नहीं है, फिर भी इसकी व्युत्पत्ति विवस्वान् के पुत्र, मनु, से दिखाई गई है इसलिए उसे सूर्यवंश कहा जा सकता है।[3]

[3] The first is the well-known Aila or Aiḍa race, often called the ‘ Lunar race ‘ because myth derived it from Soma, the moon. The second may be distinguished as the Saudyumna race, as already mentioned (p. 255), but it never played any noteworthy part. The third has no definite common name in tradition, yet being derived from the sons of Manu, son of Vivasvant, ‘the sun/ it might be designated the Manava and ‘ Solar ‘ race. 288-89

       परंतु उनका सबसे कमाल का दावा यह कि आर्यों ने मानवों या मनुवंशियों पर आक्रमण किया था और उन्हें दक्षिण की दिशा में पलायन करने को विवश किया था। उनकी हैसियत कम करके गुलाम बनने को बाध्य किया था,  क्योंकि द्रविड़ जन मनु की संतान थे।[4]

[4] The Manva stock, which held all the rest of India including the above three kingdoms, seems naturally to declare itself Dravidian.295

       द्रविड़ों के मध्येशिया से आने और उत्तरी भारत में बसने  और दक्षिण तक फैल जाने की बाकी कहानी वही है, पर इनमें से कोई पौराणिक साक्ष्यों पर आधारित नहीं है। 

      अपने अध्यवसाय के बाद भी पार्जिटर अपनी जमीन पर टिके न रह सके और इतने मौलिक सुझावों के बाद भी अंतर्वस्तु का सही विवेचन न कर सके।

पार्जिटर ने अपनी विफलताओं के बाद भी कुछ प्रश्न ऐसे उठाए हैं, जिनको उस दबाव से बाहर रख कर समझें, जिसमें वह काम कर रहे थे, तो भारतीय इतिहास की अधिक गहरी समझ पैदा होती है।

       इतना ही नहीं, दूसरे स्रोतों से उपलब्ध जानकारी की तुलना में पौराणिक संकेत अधिक भरोसे के सिद्ध होते हैं।  उदाहरण के लिए, इतिहासकारों ने भारतीय समाज को तीन  प्रमुख वंशों में बांट रखा है। सभ्यता के निर्माण और प्रसार का श्रेय वे आर्य जनों को अथवा उनका निषेध करते हुए द्रविड़ जनों को  देते रहे हैं।  ये हैं कोल/मुंडा, द्रविड़ और आर्य। परंतु इनमें से किसी को भारत का मूलनिवासी नहीं माना जाता रहा है।

       यह औपनिवेशिक जरूरतों और गोरी  नस्ल की  श्रेष्ठता  सिद्ध करने के लिए  तैयार किया गया अर्ध सत्य था और इसी को प्रामाणिक इतिहास बना कर शिक्षा संस्थाओं में पढ़ाया और दुहराया  जाता रहा है।  इस  नकली इतिहास से  वे  मौन और मुखर दोनों रूपों में यह संदेश देते रहे हैं  कि इस देश का मूलनिवासी कोई नहीं है।  जो इसे जीतता रहा है वही इस पर राज्य करता रहा है। 

     यह तर्क बाहरी देशों से अपनी जन्मकुंडली मिलाने वालों को भी रास आता रहा है। शिक्षा  का,  अर्थात्  भारतीय चेतना के निर्माण का दायित्व उन्हें ही सौंप दिया गया था   इसलिए स्वतंत्रता के बाद भी उसी औपनिवेशिक राग को  अंतर्राष्ट्र  दुहराया जाता रहा।  इसका सार सत्य  यह है कि भारतीय भूभाग और जलवायु में ऊर्जा और ओजस्विता  घट जाती है और इसलिए इस पर सदा से आक्रमणकारियों का राज रहा है,  जो भी  कुछ समय के बाद अपनी ओजस्विता खो देते रहें,  इसलिए भारतीयों के बस में कुछ नहीं है।

       राष्ट्रीय मनोबल को कुचलने का  इससे बड़ा षड्यंत्र नहीं हो सकता था। इसे प्रगतिशीलता और सेकुलरिज्म का नाम दे कर श्लाघ्य बना दिया गया था, और वामपंथी अंतर्राष्ट्रवाद को भी यह रास आता था।

        इसको तोड़ने के लिए प्रमाणों और तर्कों के साथ खंडन किया जाए, तो  उस मानसिकता में ढले हुए भारतीय सबसे पहले उत्तेजित होते और प्रस्ताव का खंडन न कर पाने की स्थिति में  राष्ट्रवादी,  दक्षिणपंथी  यहां तक की संप्रदायवादी  घोषित करने की चेष्टा करते रहे हैं। इसका दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि जब यही चुनौती अंग्रेजी में दी जाए ओर पश्चिमी देशों के विद्वान कोई, अन्य चारा न देख कर अपनी पुरानी मान्यता में सुधार करने पर और अपनी रही सही साख बचाने के लिए स्वयं भी पुरानी मान्यता को खारिज  करने लगते हैं, उसके बाद इन मार्क्सवादी विद्याधरों  की अकड़  कम होती है। 

      अर्थात् बौद्धिक रूप में आज  हम पहले से अधिक गुलाम ही नहीं है, स्वतंत्रता की इच्छाशक्ति तक खो चुके हैं। यह उसी शिक्षापद्धति की देन है।

पुराणों से जो चित्र उभरता है वह भले ही  धुंधला हो,  उसमें कई तरह की मिलावट भी हो, परंतु इससे अन्य स्रोतों की तुलना में अधिक विश्वसनीय इतिहास सामने आता है। इसके लिए हमें पुराणों  की अंतःसंगति को पहचानना होगा। हम पार्जिटर के हवाले से अपनी बात इसलिए कह रहे हैं कि, उन्होंने सभी पुराणों  और यथासंभव दूसरे पौराणिक स्रोतों का हवाला देते हुए अपनी बात कही है, और इस तरह वह हमारे काम को आसान बनाते हैं। 

      यूं तो  उन्होंने मध्य हिमालय के उत्तर से  ऐलों या आर्यों के पुराने  आक्रमण की बात की है,  परंतु  यह उनकी कल्पना की उपज है।  वह स्वयं स्वीकार करते हैं पुराणों में ऐसा कुछ नहीं है। (These conclusions   are   not put forward anywhere in the  genealogies or Puranas. 301)  हां,   कहा यह गया है कि पूरी धरती पर  ययाति  के पांच  पुत्रों के वंशधरों का आधिपत्य  है परंतु  ना तो इसका सिरा मिलता है  न ही  पुछल्ला (True, it is said that the earth was  dominated  by the five races descended from Yayati, but the ethnical significance of this statement is nowhere noticed, and no precedence is  accorded to those.) परंतु इसकी जरूरत भी नहीं है।

  इस  कन्फ्यूजन  का अपना सच यह है कि भारतीय पौराणिक स्मृतिलोक में यवनों (ग्रीकों), हूणों, चीनों (तुषारों ), दरदों के आक्रमण से पहले के किसी बाहरी आक्रमण की याद नहीं है परंतु इस बात की याद है, कि पूरी दुनिया को भारतीय पुरुखों की संतानों ने आबाद किया है। 

      इसकी पुष्टि महान इतालवी भाषा विज्ञानी Alfredo Trombetti ने अपनी पुस्तक  L’unità d’origine del linguaggio, 1905 में भी की है:

On the basis of extremely wide and detailed study, Trombetti  builds up a scheme including wider and wider groups and  families of languages, making use of surviving similarities in numerals, pronomical forms,  and the like.  Such structural words  are apt to be conservative of their form, and they are not readily borowed from one language by another i most of the cases. He ecords similarities between numerals in Sudanese-Bantu and Munda-Khmer of Austro-Asiatic group; between pronouns in Hamitic-Semitic, Dravidian, Munda, and Polynesian; between  numerals in Indo-Chinese and Uralic(he says “Ural-Altaic”); between verbs in Dacota (American Indian) and Georgian (in the Caucasian territory). He obserbs that the greatest similarities are to be found between groups most widely separated on the periphery of a huge circle having its center in India. (Margret Schlaugh, Gift of Tongues, 1949,p.73)

       इंटरनेट के माध्यम से  जो लेख देखने में आए उनमें इरादतन भारत की केंद्रीयता के पक्ष को गोल कर दिया गया है जो सचेत रूप में त्रांबेत्ती के मंतव्य की हत्या मानी जाएगी :

He formulated the hypothesis of the monogenesis, or common origin, of all languages, basing his argument on extensive parallels in lexicon and correspondences in grammatical formatives. Inadequate comparative methods prevented Trombetti from proving his proposed genealogical classification or his hypothesis of monogenesis; however, the material he collected contains many correlations that deserve further study and verification.  

      ऊपर का उद्धरण Encyclopedia – The Free Dictionary का है। विकीपीडिया में इसे निम्न रूप में  प्रस्तुत किया गया है :

      He is best known as an advocate of the doctrine of monogenesis, according to which all of the world’s languages go back to a single common ancestral language. His arguments for monogenesis were first presented in his book L’unità d’origine del linguaggio, published in 1905.

        त्रांबेत्ती के निष्कर्षों को न तो माना गया नहीं खारिज किया गया।  वास्तव में वह भाषा की उत्पत्ति पर विचार कर रहे थे, जिसके पीछे यह समझ काम कर रही थी कि जैसे दूसरे सभी प्राणियों की आवाज एक जैसी होती है उसी तरह  आरंभ में मनुष्यों की बोली भी एक जैसी ही रही होगी  जिसमें दूरियां बाद में पैदा हुईं।  इसका हमारा समाधान भिन्न है जो आगे चल कर  पुस्तकाकार आएगा।

       वह  एक मूलीयता के सिद्धांत के जनक न भी माने जाएं तो  Nostratic [a proposed language superfamily that includes the Indo-European, Afroasiatic, Dravidian, Uralic, and Altaic families.]  के पूरक तो हैं ही।  न तो उनके विचारों को सही पाया गया, न ही नास्त्रातिक की परिकल्पना को।  इनका समाधान भारतीय पुराण कथाओं से होता है।  

       विगत हिम युग के दौरान दुनिया के लगभग सभी प्रजातियों के जत्थे  प्राणरक्षा के लिए  भारत में एकत्र हो गए थे और अपने पुराने अटन क्षेत्र को  मुग्ध भाव से याद करते थे, जैसा ठंढे भूभागों के लोग भारत की झुलसाने वाली गर्मी और सड़ाने वाली आर्द्रता, मच्छरों मक्खियों सरीसृपों की असंख्य प्रजातियों वाले पर्यावरण से घबराने पर करते रहे हैं।  उन्हें अपनी साइबेरियाई भूमि स्वर्ग प्रतीत होती थी, जैसा कि भारत की संपन्नता के कारण आगे चल कर भारत प्रतीत होने लगा।

        हजारों साल तक एक दूसरे से मिलते और टकराते, छिपते-बचते जीवित रहे थे और  ऊष्म या राहत  का दौर आने पर  भारतीय  भूभाग से उनके अनगिनत जत्थे  सभी  देशों और दिशाओं में  फैले।  पूरे भारत में कभी  कोई एक भाषा नहीं बोली जाती थी। असंख्य भाषाएं थीं। फिर भी हजारों साल के कलह और अपनापे के अनुभवों के कारण,  भारत के सभी नर यूथों का  विविध  रूपों में  मेल मिलाप होता रहा  और उस प्राचीन काल में भी कुछ तत्व ऐसे विकसित हो चुके थे जिन्हें केवल भारतीय कहा जा सकता था और इन्हीं की सभी दिशाओं में व्याप्ति के आधार पर  त्राम्बेत्ती ने अपने निष्कर्ष निकाले थे,  और इन्हीं की सुनी सुनाई कहानियों के आधार पर  पुराणकारों ने  ययाति की पांच संतानों से पूरी धरती हावी होते दिखाया था।

       ठीक  इसी  तरह का दावा असुर कहानी में भी किया गया है। अर्थात्  बहुत प्राचीन काल से ही कृषि,  बागवानी,  पशुपालन, जल प्रबंधन और भूसंपत्तियों के उपयोग  का ज्ञान  विश्व को भारत से बाहर जाने वाले लोगों के माध्यम से हुआ। ईरानी स्रोत क्या कहते हैं? उनके आदि पुरुष (यम या जमशेद), समस्त ज्ञान विज्ञान और कलाओं के साथ आए और उन्हें शिक्षित और प्रशिक्षित किया। 

      It is everywhere the task of the “first one” –Arb. al-awā-il – to teach all imaginable things, and in the late legend of Yama, eg. Tha’ālibī yama — Djamashīd, teaches the fabrication of weapons, saddles, briddles, other tools and implements, spinning and weaving, of silk, linen and cotton, the whole national economy, quarrying and masoning of stones, making chalk and cement, architectue,  hydraulic wheels and mills, bridge building, mining, perfumery, pharmaceutics, medicine, ship-building, and pearl fishery. 

(Eaenst Herzfeld, Zoroaster and His World, 1947, Vol. I, p. 330)

        ध्यान दें कि ईरान, सुमेर, अरब, मिस्र, मिनोआ, ग्रीस सभी की पुराण कथा में अपने अपने ढंग से यह दर्ज है कि सभ्यता का प्रचार करने वाला पुरुष या समुदाय कहीं अन्यत्र से सभी कलाएं और ज्ञान विज्ञान लेकर आता है और वहांं सभ्यता का उदय होता है, दूसरी ओर भारतीय परंपरा है जो कहती है कि सभ्य लोग यहां से दुनिया को शिक्षित सभ्य बनाने के लिए लोग गए  (पिछली पोस्ट में उद्धृत ऋचा)।

       समस्या के समाधान के लिए इससे अधिक प्रामाणिक दूसरी कोई दलील नहीं हो सकती जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों में मुहर और उसकी छाप जैसी समानता है ।  

भारतीय  स्रोत केवल यह दावा नहीं करते हैं कि यहां से विश्व को आबाद करने/ जीतने या सभ्य बनाने और शिक्षित करने के लिए लोग बाहर गए,  बल्कि भूभौतिक यथार्थ इसकी पुष्टि करता है कि सभ्यता की नीव यहां पड़ी, आगे का क्रमिक विकास यहीं जारी रहा है और इसमें किसी एक जाति का महत्त्व किसी दूसरे से अधिक नहीं है, क्योंकि भाषाओं से लेकर खानपान तक के स्तर पर पूरे भारत में  भिन्नता में ऐसी समानता दिखाई देती है जो हजारों साल पहले की  साझेदारी की पुष्टि करती है।

       सम्मिश्रण इतना गहरा  कि यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन किसकी संतान है  और इसलिए  भारतीय पौराणिक साहित्य में बार-बार एक ही पिता की संतानों से  सभी जातियों की उत्पत्ति दिखाई जाती है।  

      पार्जिटर इसे देख कर उलझन में पड़ जाते हैं।  वह एक मूल को तोड़ कर अलग रेसों (वंशों) की उद्भावना साक्ष्यों के विरुद् करते हैं। पर नए पुराने का घालमेल करते हुए पहुंचते कहां हैं : 

      So it  is  said,  the earth was dominated by the five races (vansa) descended   from Yayati. This  result agrees exactly with the Aryan occupationof India, so that what we call the Aryan race is what Indian tradition calls the Aila race, and  so Aila  =  Aryan. The Saudyumna stock would no doubt be the Munda race and  its branch the Mon-Khmer folk in the  east;  and   in  the  intervening region it would have  been  subjugated by the Anava occupation, and  also by a prior invasion of Bengal by new-comers from the sea if the above surmise of such an   invasion be true. The Manva stock, which held all the rest of India including the above    three kingdoms, seems naturally to declare itself Dravidian. 295

कोलों को वह द्रुह्यु कुल के भरत से जोड़ते हैं:

     Marutta the great king of this (द्रुह्यु) dynasty (whom the Matsya incorrectly calls Bharata) had no son and adopted Dusyanta the Paurava, and thus this line is said to have merged into the Paurava line, as the Brahmanda, Vayu, Brahma and Harivansa declare. Yet it is added that from this line or from Dusyanta there was a branch which founded the kingdoms of Pandya, Cola, Kerala, &c. in the south.

       The line stands thus, greatly abbreviated — Turvasu, Vahni, Garbha, Gobhanu, Trisanu, Karandhama, Marutta, Dusyanta, Sarutha (or Varutha), Andira ; and Pandya, Kerala, Cola and Kulya (or Kola). 106-8. 

        अब हम इस नतीजे पर पहुंचते हैं रक्त के आधार पर भारतीय समाज को समझा ही नहीं जा सकता, सभी जनों के रक्त सभी में मिले हुए हैं और इस दृष्टि से उत्तर और दक्षिण का फर्क टिक नहीं पाता।  यही निष्कर्ष जीनोम अध्ययनों से भी निकलता है।  आर्य नाम की कोई जाति नहीं। द्रविड़ नाम की कोई जाति नहीं है।  यह शब्द  तमिल के लिए संस्कृत के  विद्वानों द्वारा गढ़ा हुआ है। मुंडा, कोल, मग, सक, कस,  आदि असंख्य जाति वाचक  संज्ञाए हैं  और ये  उत्तर से लेकर दक्षिण तक बिखरी रही है और इन्हीं के समायोजन से भारतीय सभ्यता का उत्थान हुआ है। यही हमारे भाषाई अध्ययन और स्थान नामों के अध्ययन का निचोड़  भी है।

     हम स्लेव कभी नहीं रहे।  यह  अवधारणा (कांसेप्ट)  ऐसी है  जिसके लिए  हमारी भाषा में कोई शब्द नहीं है। इसलिए  इस  अमानवीय प्रचलन के लिए, इससे कुछ निकट पड़ने वाले शब्द, दास को इसका पर्याय बना दिया गया।

       परंतु यह भी सच है कि दुनिया का कोई समाज यदि कभी स्वतंत्र रहा है तो आदिम अवस्था में ही। यह इतनी मूल्यवान निधि है कि उस युग को मनुष्य सर्वोत्तम  युग, सतयुग/कृतयुग/स्वर्णयुग, के रूप में याद करता रहा है। उसके बाद संपदा और मानस को नियंत्रित, और यदि संभव हो तो पूरी तरह अपने वश में करने वाली युक्तियों और शक्तियों का उदय हुआ, जिनमें सबसे प्रमुख मत/मजहब और विश्वास है।

       दूसरा जीविका से स्रोतों पर अधिकार करके या दूसरों को आहार के बदले आज्ञापालन को विवश करना रहा है। सबसे गर्हित है शत्रुओं को पराजित करके इतना सताना कि वे दुष्कर और गर्हित काम भी करने को विवश हो जाएं और उनके, तन, धन (स्त्री और संतान) को भी अपनी संपत्ति मानकर उनको किसी और को बेचा जा सके। इस अंतिम के लिए ही स्लेव संज्ञा का प्रयोग किया जाता है।  इसमें व्यक्ति अपनी मानवीयता खो कर ढोर में बदल जाता है। 

       इनसे भिन्न एक स्थिति होती है जिसमें आप कुछ पाने के लिए, या विपन्नता में किसी से कुछ लेकर अपनी सेवाएं उस अवधि तक के लिए अर्पित करते रहे हैं जब तक वांछित का मूल्य/ऋण चुक नहीं जाता। इस अवधि में दास को स्वामी के ऐसे प्रत्येक आदेश का पालन करना होता है जो आपकी मानवीय गरिमा का हनन न करता हो। यह श्रम या सेवा के द्वारा भुगतान या ऋण की भरपाई जैसा है।

     इसे दासता कहा जाता रहा है और इसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं और इसके अनगिनत रूप हैं। आटविक समाज में कन्याशुल्क न दे पाने की स्थिति मेें युवक का ससुराल में एक निश्चित अवधि तक रह कर उसके परिवार की सेवा करना या बाजी में हार जाने के बाद जीतने वाले की आज्ञा का पालन करने, या ऋणमुक्ति के लिए ऋणदाता की एक निश्चित अवधि तक सेवा करने या कोई विद्या या कौशल प्राप्त करने के लिए गुरु की प्रत्येक आज्ञा का पालन, किसी को स्वामी (इष्टदेव)  मान लेने पर उसके प्रति समर्पण भाव इसी के रूप हैं। 

दासता शिष्यता से भिन्न हैऔर आज्ञाकारिता से जुड़ी हुई है, पर आज्ञाकारिता तक सीमित नहीं है। भारतीय समाज में इसी का चलन रहा है, इसलिए विदेशी पर्यटकों को भारत गुलामी की प्रथा से मुक्त दिखाई देता रहा है। यह प्रथा पुरानी है और इसकी पुष्टि वैदिक समाज से भी होती है। यह आज तक जारी है, इसका गवाह पूरा अमलातंत्र है।

      अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए लोग विविध योग्यताएं अर्जित करके चाकरी पाने का प्रयत्न करते हैं। आर्थिक परनिर्भरता/ विषमताओं वाले समाज में, या मताग्रही समाज में न तो व्यक्ति आत्मगौरव अनुभव कर सकता है, न ही स्वतंत्र रह सकता है।  जो स्वतंत्र नहीं है वह सत्यनिष्ट नहीं हो सकता, विश्वसनीय नहीं हो सकता, क्योंकि उसे अपने स्वामी के निर्देशों के अनुसार काम करना या बोलना होता है।

      उसकी वस्तुपरकता भी आभासिक ही रहेगी। उसके विश्वास, प्रलोभन, पूर्वाग्रह वस्तुसत्य को देखने और समझने में और जो कुछ समझ में आया है उसकी प्रस्तुति में  बाधा पैदा करते हैं। 

       इस निष्कर्ष पर यह देख कर पहुंचा कि  ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में इतने अग्रणी, और अग्रणी से अधिक दंभी, समाज ने सभी अवसरों में असंख्य विद्वान पैदा किए और उन में से एक भी यह समझ नहीं सका कि चरवाहे अपने ढोर को हांकते हुए किसी देश पर आक्रमण नहीं करते रहे हैं।  वे चारे और दाने की सुलभता के अनुसार बढ़ते रहे हैं और यह सोचे विचारे बिना कि किस देश में पहुंच चुके हैं (पासपोर्ट और वीजा का बंधन, सभ्यता का दावा करने वाले उन लुटेरे देशों की जहनियत की देन है जो डरते हैं कि हमने तो पूरी दुनिया को लूट लिया पर यदि लुटे हुए देशों के निवासियों को लूटने वाले देशों में आने और बसने की छूट मिल गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे)  हमारी  आज की परिभाषा से किसी दूसरे देश में पहुंच कर भी अपने ढोर चराते रहे हैं।

       चारे और दाने का प्राचुर्य रहा तो वापस लौटने का नाम तक भूल जाते रहे हैं और स्थानीय चरवाहों से मेलजोल का प्रयत्न करते रहे हैं, जैसा गूजरों, अहीरों ने किया, या उन्नत संभावनाओं के अनुरूप अपने को ढाल लेते रहे हैं, जैसा जाटों ने किया। 

      यदि चराते हुए ऐसे भूभाग में पहुंच जाते रहे हैं, जिनमें कुछ मौसमों में चारे से लेकर दाने तक का संकट उत्पन्न हो जाता रहा है तो वे वापस लौट आते रहे हैं जैसा कि ब्राहुई जनों के साथ पाया जाता है जो गर्मियों में अपने ढोर लिए दिए मद्ध्येशिया तक  पहुंच जाते रहे हैं और जाड़े के मौसम लौट कर हिंदुस्तान के मैदानी भाग में उतर आते रहे हैं।  

       उनका समाज  मातृप्रधान था, स्त्रियों को  तब भी  स्वतंत्रता प्राप्त थी जब  सभ्य भारतीय समाज  पुरुष प्रधान  हो चुका था,  और इसलिए पहाड़ी क्षेत्र (स्वर्ग) से जाड़े के दिनों में उतर कर जैसे तैसे अपना जीवन निर्वाह करने वाले उन्हें विस्मित करते थे। मेनका,  मैनाक गिरि  अर्थात् किरथार की वह शृंखला जो ढलती हुई सुतकागेन दोर से आगे समुद्र में उतर गई है, से उतरी हुई,  तिलोत्तमाएं (अपने गौर वर्ण के कारण अनिंद्य सुंदरियां) स्वर्ग से उतरी प्रतीत होती थीं और उनका सामना होने पर घोर तपस्या में लीन ऋषिगण अपनी तपस्या भंग करा लेते रहे हैं परंतु यदि वह गर्भवती हो गई तो उसकी जिम्मेदारी लेने तक को तैयार नहीं होते रहे हैं। 

        चरवाहों की  एक अन्य विशेषता  यह रही है  कि  वे  एक ही जानवर  को ही पालते हैं, भेड़ पालने वाला बकरी नहीं पालता, बकरी पालने वाला भेंड़ नहीं पालता। यही नियम गोरू, भैंस, ऊंट, सूअर सभी पर लागू होती है  कारण सबकी प्रकृति अलग होती है। जीवविज्ञान की आधिकारिक पुस्तकें लिखने वाले देशों के केवल इतिहासकारों को इसका पता नहीं, जिनके आर्य घोड़े पर सवार होकर, गायों को हांकते हुए, खैबर दर्रे की दुर्गम चढ़ाई पार करके, भारत पर हमला करते हुए शहरों और दुर्गों काे मटियामेट करके गोरू चराने और उस देश में जिसमें उसके अनुसार घोड़े होते ही नहीं थे, गायों और घोड़ों  से एरॉक पुराचन संपर्क सूत्र जो लूट शुरू कर देते थै।

      जब पता चला कि 500 ई.पू. से पहले तो घोड़ों की पीठ पर सवारी की ही नहीं जाती थी, उनको रथों में जोता जाता था,  तो वे इस पहलू पर चुप्पी साधे रहे, पर पहिए का आविष्कार का श्रेय देदे। भारतीय इतहासकारों का दिमागी कोलोनाइजेशन ऐसा कि किसी ने यह तक नहीं सुझाया कि हम आक्रमण कराने को तैयार हैं, पर इसका रास्ता  तो  बदल दो, खैबर के दर्रे से रथों पर सवार हो कर  गाय-गोरू हांकते हुए उसे पार करना संभव नहीं।

        यदि यह सवाल करने की हिम्मत कोई जुटा भी पाता तो  पश्चिमी विद्वानों का उत्तर होता, असंभव तो है पर वैदिक आर्यों के मामले में कुछ भी असंभव नहीं। और इस उत्तर से हमारा भारतीय इतिहासकार रोमांचित हो जाता। ऐसा ही तर्क मैक्समूलर ने पाणिनि के समय तक के जिनमें पाणिनि भी शामिल थे, निरक्षर सिद्ध करने के लिए दिया था और किसी भारतीय ने इसका विरोध नहीं किया था।

    यदि किया था तो गोल्डष्टर ने. Panini : his place in Sanskrit literature : an investigation of some literary and chronological questions which may be settled by a study of his work के द्वारा, जिसमें उन्होंने मैक्समुलर की खाट खड़ी कर दी, पर जिसके कारण उनको यूरोपीय भाषाशास्त्रियों द्वारा इतनी गालियां दी गईं जिनका हिसाब नहीं। उन्हें पागल तक करार दिया गया।

       पागल तो वह सिद्ध होते ही हैं जिन्होंने निरे झूठ पर झूठ बोल कर पश्चिमी विद्वानों की सर्वसम्मति और पारस्परिक सहयोग से तैयार की  कहानी का एक परखचा ही उड़ा दिया। 

        इतिहास की सही व्याख्या के लिए बहुत पैने और सही औजारों की जरूरत होती है।  विख्यात  से  विख्यात  पश्चिमी विद्वानों ने दूसरी संस्कृतियों और सभ्यताओ को समझने के लिए स्लेज हैमर ( आक्रमण और विजय और विजितों के )  से अधिक परिष्कृत औजार  का इस्तेमाल ही नहीं किया। 

      इसलिए हम  अकेले पार्जिटर को उस खटराग के लिए दोष नहीं दे सकते, जिनके लिए सबसे बोधगम्य शब्द  धूर्तता है।  याद रहे पार्पजिटर भी एक दूसरी दिशा से आर्यों के आक्रमण  की बात तो करते ही हैं, यह भी दुहराते हैं कि विजय के बाद स्थानीय आबादी को स्लेव बना लिया। 

     इसे प्रोत्साहन संस्कृत की अकर्मण्यता और जड़ता से मिलता रहा, जो पश्चिमी बौद्धिक अराजकता को सहने की आदत डाल ली जिसने इनको बौद्धिक श्रम से भी मुक्ति दिला दी।

         पुराणों में जातीय स्मृति हिमयुग की चरम सीमा 20,000 साल से पीछे (स्वर्लोक) तक  जाती हैं। इसमें यवनों (ग्रीकों), हूणों, चीनों (तुषारों/तुखारियों ), दरदों (अफगानों). पल्लवों (पहलवियों), शकों  के आक्रमणों का भी हवाला है,  पर किसी ऐसे आक्रमण की सूचना नहीं है  जिसे 600 ख्रिष्टाब्द पूर्व से पहले का सिद्ध किया जा सके।   

वेदों में भी बाहर से किसी आक्रमण का प्रमाण नहीं। ‘राजाओं और श्रीमंतों के आपसी कलह के दो प्रसंग हैं, एक वरशिख के वंशधर वृचीवान का हरियूपीया के चायमान पर आक्रमण (वधीदिन्द्रो वरशिखस्य शेषो ऽभ्यावर्तिने चायमानाय शिक्षन्।

        वृचीवतो यद्धरियूपीयायां हन् पूर्वे अर्धे भियसा अपरो दर्त ।। 6.27.5) जिसमें आक्रांता भारी क्षति उठाकर भाग खड़ा होता है और दूसरा सुदास पर दस ‘राजाओं’ का आक्रमण, जिसमें भी आक्रमणकारियों को भारी क्षति उठानी पड़ती है। दूसरे प्रसंग में भारतीय ‘राजाओं’ के अतिरिक्त पक्थ और भलान (पख्तून और बोलन क्षेत्र के कबीले?) भी शामिल थे।

      विजय सुदास की होती है। पश्चिमोत्तर की पहाड़ियों से यदा कदा दस्युओं के उपद्रव का प्रमाण पुरातत्व से भी मिलता है और ऋग्वेद से भी। इनमें दासों/दस्युओं को पर्वतीय क्षेत्रों का निवासी (पर्वतेषु क्षियन्तं) बताया गया है। प्रतिशोध में उनकी बस्तियां जलाने के पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं (ह्वीलर) और साहित्यिक प्रमाण भी। एक राजा का नाम ही त्रसदस्यु है। दूसरे का दुष्यंत। 

       छठी शताब्दी ई.पू. से पहले भारत से बहिर्गमन होता आया था। इसका कारण हिमयुग में भारत में शरण लेने वालों के कारण जनसंख्या का भारी दबाव था। राहत का दौर आने के बाद पहले के हिमाच्छादित भूभाग में हरियाली आने और जीविका संभव होने के बाद बहुत से जत्थे भारत से बाहर जाने लगे (त्रांबेत्ती)।

यह बहिर्गमन भी  जो दस बारह हजार साल पहले आरंभ हुआ और बाद में भी होता रहा, आक्रमण न था।  पुरातत्व से इस बात का प्रमाण मिलता है  लगभग 3-4 हजार ईसा पूर्व भारतीय अश्व व्यापारी मध्य एशिया में अपना प्रभाव जमा चुके।

      अश्व  व्यापार  में सिंधियों की भूमिका प्रधान थी और मध्य एशिया के जिस क्षेत्र में उन्होंने  अपना कारोबार फैलाया था,  उसे सिंधियों का देश, शिंतास्ता, कहा जाता रहा।   उनके पड़ोस में ही  अंधक जनों ने, जो गुजरात के पशुपालक (अंधक वृष्णि =गोपालक अंधक) थे,  अपना प्रभाव क्षेत्र  कायम किया था  जिसे आन्द्रोनोवो (अंधक  जनों का  नया   प्रदेश)  नाम से जाना जाता रहा।

       यदि मारिया जिम्बुतास (Marija Jimbutas) की मानें तो कुर्गान में इनकी गतिविधियां चौथी सहस्राब्दी  ईसा पूर्व में ही शुरू हो चुकी थीं। वहां के  स्थानीय जन  जंगली घोड़ों, तारपान-  tarpan-  का शिकार उदर पूर्ति के लिए करते थे। सिंधी अश्व व्यापारियों ने  तारपान के  बछड़ों  के बदले, गोरू देकर उनको विनिमय तंत्र से जोड़ा। ध्यान रहे कि  भारत में एक घोड़े का मोल सौ गोरू था।

       यदि एक तारपान के बदले दो ना या तीन गोरू मिल जाएं  तो उनकी तो चांदी ही चांदी थी। यद्यपि विनिमय में तारपान के बछड़ों  को लेने के बाद उन्हें अच्छी खूराक दे कर पालना, पोसना और साधना (प्रशिक्षित करना) भी होता था,  इसलिए हम यह तय नहीं कर सकते कि उनको इस व्यापार से कितने गुना लाभ होता था,  फिर भी लाभ अपार होता था, यह तो मानना  ही पड़ेगा।

        ऋग्वेद में सैकड़ों और हजारों की संख्या में  किसी गंतव्य की ओर सुरक्षित मार्गों से जाते हुए गोधन के जो वर्णन मिलते हैं, वे इस व्यापार से ही संबंधित लगते हैं। लघुएशिया में भी भारतीय जनों का प्रवेश व्यापारी के रूप में ही हुआ था  और प्रतिस्पर्धा में असीरियनों से आगे बढ़कर उन्होंने पहले तुर्की में अपना दबदबा कायम किया था और फिर धीरे-धीरे सत्ता पर अधिकार किया था और इसके बाद   भारतीय मूल के कसों (कस्साइट) और मैत्रेयों (मितन्नी) ने अपनी राज्य सत्ता स्थापित की थी और उसके बाद ईराक  सहित पूरे पश्चिमी एशिया पर हावी रहे। 

हम पीछे देख आए हैं कि खैबर दर्रे से जिस आक्रमण की कहानियों को इतिहास का सच बनाया गया, वह आक्रमण हर दृष्टि से असंभव था। इसे जानते हुए भी यूरोपीय इतिहासकार अपनी जरूरत से  आक्रमण की कहानियां गढ़ते रहे।  इन कहानियों में आक्रमणकारियों द्वारा  पहले के निवासी उत्पीड़ित, प्रताड़ित हो कर पलायन के लिए बाध्य हुए और शेष गुलाम बनाए या सेवा के लिए बाध्य किए गए।

       वे इस तरह के सुझावों से भारतीय समाज मेंं वैमनस्य और विघटन के बीज बो कर इसकी प्रतिरोध-क्षमता को नष्ट करते रहे, यह सामरिक दृष्टि से गलत न था। परंतु भारतीय विद्वान उनसे भी अधिक उत्साह से इसे अकाट्य सत्य बनाने को कृतसंकल्प रहे, इसके कई कारण थे।  पहला तो यह कि इन प्रस्तावों का उत्साह से समर्थन ब्रितानी शासन मेंं ऊपर उठने और ख्याति पाने का सबसे आसान रास्ता था। 

      दूसरा, भारतीय सामाजिक स्तरभेद की उत्पत्ति और प्रकृति का कोई अन्य संतोषजनक समाधान किसी को दिखाई नहीं देता था।  क्योंकि वे यह सारा विकास आर्य आक्रमण की संकुचित काल सीमा में रख कर  हल निकालना।  तीसरा यह कि, आसन्न इतिहास में भारत के निवासियों का भी एक तबका आक्रमण की कहानियों को और भारत में सभ्यता का प्रवेश पश्चिम से दिखाने को अपने वर्चस्व के लिए सत्य मानता था/सिद्ध करना चाहता था।

       अंग्रेज धार्मिक भेद को नफरत में बदलने और अपने को मुसलमानें का एकमात्र हितैषी सिद्ध करने के लिए तरह तरह के प्रयोग कर रहे थे और इस तरह  स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर कर रहे थे, इसलिए कांग्रेस के हिंदू नेता भी उन्हें अंग्रेजों के चंगुल से बाहर लाने के लिए, उसकी मनुहार करते हुए,  उसकी हर बात मानते हुए, उसको अपने साथ रखने को प्रयत्नशील थे।

      इस मनुहार के अनुपात में ही रूठते और दूरी बनाते हुए नई शर्तें लादते रहना, उसकी आदत बन गई।  इसी मनुहार का परिणाम था कि स्वतंत्रता के बाद औपनिवेशिक इतिहास को गलत मानते हुए नया इतिहास लिखने की कवायद करने वालों ने औपनिवेशिक स्थापनाओं को ही दुहराया, और मार्क्सवादी इतिहास के नाम जो इतिहास लिखवाया गया उसमें मध्यकाल को मुस्लिम काल बनाया और महिमामंडित किया गया  और इसी तरह प्राचीन भारत को हिंदूकाल, सच कहें तो ब्राह्मण काल बनाते हुए इसे पहले से अधिक गर्हित रूप में पेश किया गया और अन्य सभी औपनिवेशिक मान्यताओं को प्रामाणिक बनाने का प्रयत्न किया गया।

हम इस लंबी चर्चा में इसलिए उलझ गए कि इतिहास को और उसी तरह सामाजिक संरचना को अपने हितों के अनुसार कहानियां गढ़ने और प्रचारित करने की कला बनाया जाता रहा।  वैज्ञानिक इतिहास लिखना सदा से एक बड़ी चुनौती रहा है पर वर्चस्व की कामना के चलते ब्राह्मणों ने, अंग्रेजों ने और वामपंथियों ने इसे अपने  अनुसार नष्ट किया।

     यही काम आज तक जारी किसी इरादे से लिखा या लिखवाया गया इतिहास वैज्ञानिक इतिहास नहीं हो सकता। ऐसे  इतिहास की ‘जानकारी’ जितनी भी बढ़ाई जाए, इससे शिक्षा नहीं ली जा सकती,  इससे सामाजिक चेतना का विकास नहीं हो सकता, कल्पित कहानियों को हथियार बना कर प्रहार अवश्य किया जाता है। 

       अब यह निर्विवाद  सत्य बन गया है  कि भारत  पर  पूरे इतिहास में  ऐसा कोई आक्रमण नहीं हुआ जिसमें लोगों को विशेष वर्गों, वर्णों  या जातियों में जाने को बाध्य किया गया हो। यह हीन कर्मों  में संभव था, जो स्लेवरी मे देखने मे आता है, पर उच्च कौशलों और दक्षताओं के मामले में नहीं, जिसमें वैदिक कवि भी स्पर्धा में अपने समय की शिल्पीओं की समक्षमता में आने की डींग भरते थे, ये योग्यताएं पैदा करना असंभव था।

       जब शूद्रों की  दशा का कारुणिक चित्रण किया जाता है तब यह भुला दिया जाता है कि भारत का समूचा उद्योग और  कलाएं उनके पास रही हैं। आर्थिक दृष्टि से उनकी दशा ब्राह्मणों से अधिक अच्छी थी।  उनके बिना समाज का काम नहीं चल सकता था। 

       ब्राम्हण के बिना चल सकता था। भीख मांगने का विकल्प  ब्राह्मण के पास था,  शूद्र के पास नहीं। आर्थिक विपन्नता के होते हुए भी ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व पर जितना गर्व करता था,  उससे कम गर्व कुम्हार, थवई (स्थपति/ वास्तुकार), बढ़ई (तक्षक). लोहार, सोनार (धातुविद ) मनिहार(मणिकार) और शिल्पी, नर्तक, नट (नाट्यकर्मी), संगीतकार, क्या बलप्रयोग से बनाए जा सकते थे?

      यदि नहीं, तो इतनी मोटी समझ का भी इतना अभाव क्यों रहा कि हम सामाजिक स्तरभेद के लिए ब्राह्मणों को अपराधी मानते रहे जब कि ब्राह्मण, और आज के संदर्भ में सभी बुद्धिजीवी, उसी आर्थिक अवज्ञा के शिकार हैं। अंगिरा और आंगिरसों को ऋग्वेद में ऋषियों की समकक्षता में रखा गया है, पर न अंगिरस ब्राह्मण हैं न दूसरे ऋषि।

        जमदग्नि एक दूसरे असुर परंपरा के ऋषि है जो  ब्राह्मणवाद के अधिष्ठाता वसिष्ठ  की बराबरी में रखे गए :

   भद्रं इत् भद्रा कृणवत् सरस्वति अकवारी चेतति वाजिनीवती।

गृणाना जमदग्निवत् स्तुवाना च वसिष्ठवत्।। 7.96.3

      सबसे विचित्र है राजा भरत का आंगिरस कुल के भरद्वाज को अपना दत्तक पुत्र  बनाना। भरत क्षत्रिय हैं, उनका दत्तक पुत्र बन जाने के बाद वह ब्राह्मण नहीं रह सकते। दत्तक पुत्र की आवश्यकता निःसंतान होने पर वंश चलाने के लिए होती है। अतः भारद्वाजों को क्षत्रिय होना भरतवंंशी क्षत्रिय होना चाहिए पर वे ब्राह्मण है, क्षत्रियत्व का दावा तक नहीं करते। अतः भरद्वाज को भरत का दत्तक पुत्र बनाने का रहस्य यह है भरद्वाज नाम में ही भरत समाहित (भरत्-वाज) है।

अंगिरा अग्नि के पुत्र है, अग्नि स्वरूप हैं, धातुविद्या के आविष्कारक और प्रवर्तक हैं और यही दावा आगरिया जनों का है जो अपने को असुर कहते हैं। जब मनीष जोशी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के  महानिदेशक थे) पुरातत्व प्रशिक्षण संस्थान में  बिहार के एक विद्वान का भाषण हुआ था जिसमें उन्होंने  हड़प्पा लिपि के बहुत सारे  चिन्हों का  प्रयोग आगरिया (असुर)  समुदाय के  विवाह आदि के  विशेष अवसरों पर लिखने और उसे किसी भी दूसरे को प्रकट न करने की हवाला देते हुए,  उनके बीच प्रचलित इस धारणा का भी उल्लेख किया था कि वे पहले पश्चिम की दिशा में  बहुत संपन्नता की स्थिति में थे  और वहां भयानक मारकाट के कारण  उनको  पलायन करना पड़ा।  

     जोशी जी ने उन से अनुरोध किया था यदि वह इनका एक वीडियो तैयार कर सकें तो उसका पूरा खर्च भारतीय पुरातत्व देगा। परंतु  वर्मा ने जितनी कठिनाई और छल छद्म से उन  चिन्हों को देखा  और  नितांत गोपन रखने की शर्त पर  यह सूचनाएं प्राप्त की थीं,  उनमें दृश्यचित्र बनाना तो संभव ही न था, इसका प्रस्ताव रखने वाले की जान पर बन आ सकती थी।  

       यदि यह सूचना किसी ऐसे व्यक्ति को मिले जो  आक्रमण में विश्वास करता हो तो इसके आधार पर यह निष्कर्ष निकालेगा कि लो,  आज तक कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला था, पर आज मिल गया। हड़प्पा सभ्यता का निर्माण मुंडारी जनों ने किया था, और उनकी नगर सभ्यता पर आर्यों का आक्रमण हुआ, इसके साथ भारी रक्तपात हुआ उस दशा में आत्मरक्षा के लिए उन्हें पूर्व की ओर भागना पड़ा।

       इस त्रासदी का एक पूरक पक्ष पौराणिक व्याख्या  से मिलता है।  कोसंबी आर्यों के कल्पित आक्रमण को क्षत्रियों का आक्रमण मानते हैं  और ब्राह्मणों को हड़प्पा सभ्यता के व्यापारियों का नहीं अपितु मातृसत्ताक भारतीय हैवानों का पुरोहित बताते हैं और इस तरह प्राचीनभारतीय  इतिहास को क्षत्रियों और ब्राह्मणों के द्वन्द्व के रूप में प्रस्तुत कर चुके थे।

      संभव है यह सूझ उनमें पार्जिटर को पढ़ने के बाद आई हो क्योंकि पार्जिटर का अपना मानना भी यही है :

   Brahmanism then originally was not an Aila or Aryan institution. The earliest brahmans were connected with the non-Aryan peoples and were established among them when the Ailas entered. This is corroborated by the close connexion that existed between them and versions of the genealogies, which have also a historical character. Royal genealogies certainly do not lack the historical sense, and those ksatriya tales and ballads are generally consistent in their historical conditions, the Daityas, Danavas, and asuras. (चेतना विकास मिशन).

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