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बेबस परिंदों की व्यथा पर एक मार्मिक लघुकथा……आवाज़ें…

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सुबह बेटा रवि और बहू स्वाति अपने-अपने दफ़्तर में चले जाते और पोता अरु स्कूल। रामानन्द अकेले बीते दिनों को याद करते रहते। पोता साढ़े तीन बजे स्कूल से लौट आता और छः बजे तक उनके साथ रहकर ज़माने भर की बातें किया करता रहता। शाम को छः बजे बेटा और बहू लौटकर घर आते तो पोता अरु होमवर्क निपटाता,खाना खाता,फिर सो जाता। पोते के साथ बीतने वाले ढाई घण्टे उनके लिए सबसे ख़ुशनुमा पल होते । यूँ उनके कमरे में एक टीवी भी थी,कभी-कभी वे टीवी भी देख लिया करते  थे,परन्तु उनके अकेलेपन की सबसे अच्छी साथी थीं पंछियों की आवाज़ें। इन आवाज़ों के साथ घंटी की महीन सुरीली संगीतमय आवाज़ भी जैसे संगत करती। रात के समय घंटी की आवाज़ ज़्यादा स्पष्ट सुनाई देती,जैसे कोई फ़रिश्ता दुनिया के सलामत होने का सन्देश दे रहा हो । वे महसूस करते कि जैसे घंटी की वह लरजती आवाज़ उनकी सांसों को भी लय दे रही हो । अरु ने बताया था कि एक घर छोड़कर उसके एक दोस्त का घर है । उस घर में एक बड़ा सा बेरी का पेड़ है । वहाँ ख़ूब पंछी आते हैं। पंछी बेरों को नुक्सान पहुँचाते थे, इसलिए अंकल ने पेड़ पर एक घंटी बाँध दी है। जैसे ही हवा चलती है या पंछियों के बैठने से पेड़ की टहनियाँ या पत्ते हिलते हैं,वह घंटी बजने लगती है। पंछी डरकर भाग जाते हैं। 

      ‘तुम्हारे अंकल को क्या मालूम कि चंद दिनों में ही पंछियों की घंटी से दोस्ती हो गई है। ‘ रामानन्द ने कहा था,पर अरु कुछ समझ नहीं पाया था।      

  एक दिन रामानन्द को पंछियों की आवाज़ें सुनाई नहीं दी । उन्हें ऐसा लगा कि पिछली रात घंटी की आवाज़ भी नहीं सुनाई दी थी । क्या पंछियों ने आना बन्द कर दिया या यह उनका वहम है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हें सुनना बन्द हो गया हो। बुढ़ापे में अक्सर ऐसा होता ही है। अगले दो दिन उनके कान उसी ओर लगे रहे,पर आवाज़ें उन्हें अभी भी नहीं सुनाई दीं । उन आवाज़ों के बिना वे बहुत अकेला तथा असहाय महसूस कर रहे थे। दो दिन बाद उन्होंने अरु से पूछ ही लिया ‘बेटे अब तुम्हारे दोस्त के घर से पंछियों और घंटी की आवाज़ें नहीं आती ? ‘   

      ‘आपको पता नहीं है क्या दादा जी ! ‘, अंकल ने वह बेरी का पेड़ ही कटवा दिया। ‘ 

         क्यों ?     

    क्योंकि आंटी रोज़ अंकल से कहतीं थीं कि ‘इस पेड़ ने उनका जीना हराम कर दिया है। पंछी उन्हें एक पल भी चैन नहीं लेने देते । घर में इनकी बीट गिरती रहती है,पत्ते झड़ते रहते हैं। मैं तो हर समय बस झाड़ू लगाती रहती हूँ,बुरी तरह से परेशान हो गई हूँ। ‘बस इसीलिए अंकल ने उस पेड़ को कटवा दिया।   

      रामानन्द उदास हो गए जैसे उनके दुख-सुख का कोई साथी कहीं खो गया हो। उनकी उदासी ने अरु को भी उदास कर दिया। बेटे और बहू ने भी उनकी उदासी और अनमनेपन को नोटिस किया और सोचा कि इस बार भी वे पहले की तरह गाँव को याद कर उदास हो गए हैं। तीनों प्राणी उनका मन बहलाने की भरपूर कोशिश करते रहे।          तीसरे दिन रवि और स्वाति शाम को जब घर लौटे तो देखते क्या हैं कि आँगन में एक गड्ढा खुदा हुआ है,उस गड्ढे में खाद मिली नर्म मुलायम मिट्टी है और दादा पोता मिलकर दो फुट ऊँचा एक अमरूद का पेड़ उस गड्ढे में रोप रहे हैं । वो पिता जो लाठी के सहारे बहुत धीरे-धीरे चलते थे और जिनके घुटनों में हमेशा दर्द रहता था,आज घुटनों के बल बैठ अमरूद लगा रहे हैं । उनके चेहरे पर बच्चों का सा उत्साह छलक रहा है। दोनों की आँखों में प्रश्न देखा तो अरु बोला ‘पापा जी !, आयुष के घर का पेड़ कट जाने से दादा जी उदास थे, इसलिए मैं आज रास्ते में पड़ने वाली नर्सरी से यह पेड़ ले आया। ठीक किया न ! ‘     

    ‘बहुत अच्छा किया। ‘     

    कुछ दिन बाद दादा ने पोते से कहा ‘अपने दोस्त से पूछना अगर घंटी उनके किसी काम की न हो तो उसे हमें दे दें। कीमत हम चुका देंगे। ‘   

    हरभगवान चावला,

सिरसा,हरियाणा,संपर्क-93545 45440          

संकलन-निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद,

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