तेजपाल सिंह ‘तेज’
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता, बहुलता और धर्मनिरपेक्षता
रही है। लेकिन बीते कुछ दशकों में लोकतंत्र का यह आधारभूत ढांचा धीरे-धीरे कमजोर होता
गया है। आज हम एक ऐसे त्रिकोणीय गठबंधन को उभरते देख रहे हैं, जिसमें तथाकथित
‘धार्मिक बाबा’, कार्पोरेट पूंजीपति और सत्ता के गलियारों में बैठे राजनेता एक साझा मंच पर
आ खड़े हुए हैं। यह गठबंधन न केवल जनता की चेतना को नियंत्रित कर रहा है, बल्कि
सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, और संवैधानिक मूल्यों को भी निगलता जा रहा है।
- तथाकथित बाबाओं की राजनीति में दखलअंदाज़ी : धर्म से सत्ता तक की यात्रा
भारत में संतों और महात्माओं की परंपरा हमेशा से रही है, लेकिन आज के तथाकथित
बाबाओं की भूमिका भक्ति या अध्यात्म से अधिक सत्ता-संरचना के भीतर है। ये बाबा अब केवल
आश्रमों में नहीं रहते, बल्कि टीवी चैनलों, चुनावी मंचों और कंपनियों के बोर्ड रूम में भी देखे
जाते हैं। इनमें से कई बाबा न सिर्फ राजनीतिक दलों के प्रचारक बन गए हैं, बल्कि खुद चुनाव
लड़ते हैं, सांसद बनते हैं, और नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप करते हैं। धर्म का नाम लेकर वे एक
खास विचारधारा को जनता पर थोपने का काम कर रहे हैं। उदाहरणार्थ –
- बाबा रामदेव, जो योगगुरु से सीधे-सीधे एक व्यावसायिक साम्राज्य (पतंजलि) के
निर्माता बने, और जिन्होंने खुलकर बीजेपी के पक्ष में प्रचार किया। - आसाराम, राम रहीम, नित्यानंद जैसे बाबाओं पर यौन शोषण से लेकर हिंसा तक के
गंभीर आरोप लगे, लेकिन वे लंबे समय तक सत्ता संरचना का संरक्षण पाते रहे।
- पूंजीपतियों की सांठगांठ और राजनीतिक निवेश : विकास का झूठा नैरेटिव
भारतीय पूंजीपति वर्ग ने 1991 के उदारीकरण के बाद से राज्य के भीतर गहरी पैठ
बना ली। लेकिन आज हालात इस स्तर पर पहुँच चुके हैं कि वे केवल आर्थिक नीतियों को
प्रभावित नहीं करते, बल्कि सरकारों की संरचना और प्राथमिकताएं भी तय करते हैं। चुनावी
चंदे से लेकर मीडिया की खरीद तक, सब कुछ इस गठजोड़ का हिस्सा है।
कॉर्पोरेट पूंजी और बाबाओं का संबंध : बाबाओं के विशाल साम्राज्य (जैसे रामदेव की पतंजलि,
ईशा फाउंडेशन, आर्ट ऑफ लिविंग) में पूंजीपतियों का भारी निवेश होता है। बदले में ये बाबा
धार्मिक नैरेटिव और राष्ट्रवाद को बढ़ावा देकर उन आर्थिक नीतियों को वैधता प्रदान करते हैं जो
कॉर्पोरेट हितों को पोषित करती हैं। यह एक दोतरफा लाभ का सौदा है।
- राजनेताओं की भूमिका और रणनीति : धर्म और विकास का दोहरा खेल
राजनीतिक दल विशेषकर दक्षिणपंथी दलों ने बाबाओं और पूंजीपतियों के साथ गठजोड़
करके सत्ता की एक अजेय मशीनरी बना दी है। एक ओर बाबा लोगों की धार्मिक भावनाओं को
भड़काते हैं, दूसरी ओर पूंजीपति मीडिया और प्रचार तंत्र को नियंत्रित करते हैं। राजनेता इस
पूरी संरचना के नियंता और लाभार्थी बन जाते हैं। यथा —
- चुनावी राजनीति में बाबाओं का इस्तेमाल
- चुनावी मंचों पर बाबाओं की उपस्थिति
- ‘धर्म संसद’ जैसे मंचों से चुनावी निर्देश
- जातियों को साधने के लिए साधुओं के जरिए वोट बैंक पर असर
- बाबाओं द्वारा एक विशेष विचारधारा का सांस्कृतिक प्रचार
- यह गठबंधन क्यों है खतरनाक?
(क) लोकतंत्र का हरण : जब धर्म, पूंजी और राजनीति एकत्र होते हैं, तो आम जनता के
अधिकार, आलोचना की स्वतंत्रता, और संविधान के सिद्धांत सबसे पहले कुचले जाते हैं।
लोकतंत्र केवल एक औपचारिक ढांचा रह जाता है, जहां असली शक्ति इस त्रिकोणीय गठबंधन
के हाथ में होती है।
(ख) सामाजिक न्याय का पतन : बाबा जातिवाद को धार्मिक वैधता देते हैं, पूंजीपति सामाजिक
असमानता को आर्थिक अनिवार्यता बताते हैं, और राजनेता इसे ‘परंपरा’ बताकर संविधान
विरोधी नीतियों को लागू करते हैं।
(ग) विचार और चेतना का हरण : बाबा टीवी और यूट्यूब पर आध्यात्मिक भाषा में धार्मिक
राष्ट्रवाद फैलाते हैं, पूंजीपति उसे प्रायोजित करते हैं, और राजनेता उसे कानून और पुलिस के
जरिए लागू करते हैं। - ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गठबंधन का मूल्यांकन:
अंबेडकर की चेतावनी : डॉ. आंबेडकर ने कहा था: “धर्म अगर स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के
विरुद्ध जाता है, तो वह धर्म नहीं, गुलामी है।” बाबाओं और राजनेताओं का यह गठबंधन ठीक
उसी तरह धर्म का उपयोग कर रहा है, जैसा मनु-प्रधान वर्णव्यवस्था करती थी।
गांधी और नेहरू की दृष्टि : जहां गांधी ने धार्मिकता को आत्मानुशासन के रूप में देखा, वहीं
नेहरू ने धर्म को राजनीति से बाहर रखने की वकालत की। लेकिन आज धार्मिक प्रवचन,
राजनैतिक घोषणापत्र बनते जा रहे हैं।
- मीडिया और न्यायपालिका पर असर :
मीडिया का धार्मिक पूंजीकरण : निजी मीडिया संस्थानों में पूंजीपतियों का सीधा निवेश है, और
अब बाबा भी टीवी चैनलों और डिजिटल मंचों के मालिक या भागीदार हैं। परिणामस्वरूप
जनता के वास्तविक मुद्दे (बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य) गायब हो जाते हैं और उनकी जगह “धर्म
खतरे में है” जैसे जुमले छा जाते हैं।
न्यायपालिका पर दबाव : कुछ मामलों में बाबाओं के खिलाफ मामले वर्षों तक खिंचते हैं, और
कई बार सत्ता के प्रभाव में निर्णय भी पक्षपातपूर्ण दिखाई देते हैं। इससे न्याय व्यवस्था की
विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। - वर्तमान उदाहरण
- राम मंदिर आंदोलन: एक धार्मिक आंदोलन को राजनीतिक लाभ के लिए
इस्तेमाल किया गया और पूंजीपतियों ने उसमें जमकर निवेश किया। - कुंभ और अन्य धार्मिक मेलों में सरकार की सहभागिता: सरकारी धन और
संसाधनों को खुलेआम बाबाओं के प्रभाव क्षेत्र में लगाया गया। - पतंजलि और आयुर्वेदिक व्यवसाय: बाबा रामदेव की कंपनी को सरकार ने कर छूट,
जमीन और प्रचार में भारी समर्थन दिया। - नरेंद्र मोदी का तथाकथित ‘संतों के आशीर्वाद’ का प्रदर्शन: चुनावी जनसभाओं और
टीवी इंटरव्यू में बाबाओं के साथ तस्वीरें और मंच साझा कर जनता को भावनात्मक रूप
से प्रभावित किया गया।
- वैकल्पिक रास्ता और जनजागरण की आवश्यकता :
बुद्ध-अंबेडकर की राह : अंबेडकर और बुद्ध दोनों ने ‘विवेक’ और ‘चेतना’ पर ज़ोर दिया। आज
जब धर्म, पूंजी और राजनीति का गठजोड़ जनचेतना का हरण कर रहा है, तो नागरिकों को
विवेक का सहारा लेना ही होगा।
जन आंदोलनों की भूमिका : चाहे वह किसान आंदोलन हो, सीएए विरोध हो या दलित-
अधिकार आंदोलन — ये सब इस त्रिकोणीय गठजोड़ के खिलाफ जन शक्ति का प्रतीक हैं।
शिक्षा और संवाद की आवश्यकता : धर्म का ज्ञान, पूंजी का उपयोग और राजनीति की समझ —
इन तीनों को विवेक और संवैधानिक चेतना से जोड़ना ही एकमात्र समाधान है।
तथाकथित बाबाओं, पूंजीपतियों और राजनेताओं के बीच बना यह त्रिकोणीय गठबंधन
लोकतंत्र के लिए एक धीमा ज़हर है। यह गठजोड़ धर्म की आड़ में सामाजिक विषमता को वैधता
देता है, पूंजी की ताकत से जनता की चेतना को नियंत्रित करता है, और सत्ता के माध्यम से
संविधान के मूल्यों को दरकिनार करता है। अब समय आ गया है कि जनता खुद तय करे कि उसे
लोकतंत्र चाहिए या धर्मोपजीवी गठबंधन। क्योंकि अगर धर्म का बाजार, पूंजी का मीडिया और
राजनीति की सत्ता मिल जाए, तो जनता के पास केवल भ्रम और भक्तिभाव ही बचता है —
अधिकार नहीं।
इस गठबंधन का इतिहास क्या है?
“तथाकथित बाबाओं, पूंजीपतियों और राजनेताओं के बीच गठबंधन” का इतिहास कोई
हालिया घटना नहीं है; इसकी जड़ें भारत के औपनिवेशिक काल से भी पहले की सामाजिक-
सांस्कृतिक व्यवस्था में देखी जा सकती हैं, जब धर्म, धन और सत्ता तीनों मिलकर सामाजिक
नियंत्रण के प्रमुख औजार हुआ करते थे। आइए हम इस गठबंधन के ऐतिहासिक विकास को
कालक्रमानुसार समझें:
- प्राचीन भारत: धर्म और सत्ता का जन्मजात गठबंधन
- ब्राह्मण-राजा की संधि: वैदिक युग से ही भारतीय समाज में ब्राह्मण
(धार्मिक सत्ता) और क्षत्रिय (राजनीतिक सत्ता) के बीच एक मौन समझौता
था। - ब्राह्मण ‘राजा को देवत्व’ देते थे, और राजा ब्राह्मणों को विशेषाधिकार। धर्मग्रंथों में
वर्णित ‘राजधर्म’ और ‘मनुस्मृति’ जैसे ग्रंथ इसी गठजोड़ की वैचारिक नींव बनते हैं। - धर्म को राज्यशक्ति का औचित्य देने वाला उपकरण बनाया गया – जैसे ‘राजा
ईश्वर का प्रतिनिधि है’।
अर्थ और धर्म का संतुलन: पूंजीवाद उस समय अपने आधुनिक रूप में नहीं था, लेकिन
व्यापारियों (वैश्य वर्ग) को भी धार्मिक वैधता और सत्ता संरक्षण मिलते रहे।
- मध्यकाल: सूफी-संत बनाम शाही बाबागीरी
सूफी-संत परंपरा ने जहां राज्य सत्ता से दूरी बनाई, वहीं कई हिंदू और मुस्लिम संतों ने
राजाश्रय को प्राप्त किया और धार्मिक ताकत को राजनीतिक वैधता में बदला। जैसे:
- चैतन्य महाप्रभु के अनुयायी बंगाल के नवाबों से संबंध रखते थे।
- तुलसीदास जैसे कवियों को मुगल शासकों ने संरक्षण दिया।
- गुरुओं और राजाओं के बीच संबंध भी कभी सहयोगी, कभी टकरावपूर्ण रहे (जैसे
गुरु तेग बहादुर और औरंगज़ेब के बीच)। - व्यापारी वर्ग भी धार्मिक संस्थाओं को दान देकर सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त
करता रहा।
- औपनिवेशिक भारत: धार्मिक नेताओं की राजनीतिक भूमिका :
- ब्रिटिश शासन में धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल बहुत ही रणनीतिक रहा।
- ब्रिटिशों ने हिंदू-मुस्लिम विभाजन को बढ़ावा देने के लिए धार्मिक नेताओं और
पोंगापंथियों को प्रोत्साहित किया। - 1857 की क्रांति में कई धार्मिक नेताओं की भागीदारी ने उन्हें जनता के नायक
बना दिया, जिसका लाभ बाद में राजनीतिक दलों ने उठाया। - आर्य समाज, सनातन धर्म सभा, देवबंदी और बरेलवी आंदोलन – सभी धर्म आधारित
संस्थाओं ने सामाजिक सुधार के नाम पर राजनीति में दखल देना शुरू किया।
पूंजीपतियों की भूमिका: ब्रिटिश काल में जैसे टाटा, बिड़ला जैसे औद्योगिक घराने राष्ट्रीय
आंदोलनों में आर्थिक योगदान देने लगे, वैसे ही उन्हें भी धार्मिक नेताओं से वैधता और नैतिक
समर्थन मिलता रहा।
- स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान: धर्म, पूंजी और राजनीति का त्रिकोण :
गांधी और धर्म: महात्मा गांधी ने धर्म को राजनीति में लाने का कार्य किया, लेकिन वह उसे
आध्यात्मिक, नैतिक और अहिंसात्मक दिशा में मोड़ना चाहते थे।
नेहरू और अंबेडकर की चेतावनी:
- नेहरू धर्म को निजी क्षेत्र तक सीमित रखना चाहते थे।
- डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट कहा: “धर्म को यदि राजनीति से नहीं हटाया गया, तो यह
लोकतंत्र को निगल जाएगा।” लेकिन इसके बावजूद, सावरकर और हिंदू महासभा जैसे
संगठन धर्म को राजनीति का हथियार बनाते रहे। पूंजीपतियों ने कांग्रेस, मुस्लिम लीग
और अन्य दलों को आर्थिक सहायता दी – कई बार व्यापारिक हितों की पूर्ति हेतु।
- आज़ादी के बाद: गठबंधन का संस्थागत रूप :
1950-1980: धार्मिक नेताओं का सीमित प्रभाव : शुरुआती दशकों में संविधान, धर्मनिरपेक्षता
और समाजवाद की नीति ने बाबाओं और पूंजीपतियों को राजनीति से दूर रखा। लेकिन
इमरजेंसी (1975) के बाद स्थितियाँ बदलने लगीं। बाबाओं और धार्मिक संस्थाओं को जनता की
भावनाओं को भड़काने का औजार बनाना शुरू हुआ।
1980-1990: गठजोड़ का विस्फोटक प्रारंभ : राम मंदिर आंदोलन में विहिप, संघ, भाजपा और
कई धार्मिक संतों ने खुलकर भाग लिया। राजनीति और धर्म का यह मिलन ऐतिहासिक मोड़
था। इस आंदोलन में बड़ी पूंजी का भी निवेश हुआ — मीडिया प्रचार, रथ यात्रा, टेलीविजन पर
रामायण-महाभारत के प्रसारण आदि। बाबाओं की छवि बनी धर्मरक्षक और राष्ट्रभक्त की। - 1990 के बाद: गठबंधन का नवउदारवादी रूप :
1991 के आर्थिक सुधार के बाद पूंजी का प्रवाह और बाजारवाद बढ़ा। बाबा अब केवल
धार्मिक प्रवचनकर्ता नहीं रहे, उद्यमी और कार्पोरेट बन गए। उदाहरणार्थ :
- बाबा रामदेव – पतंजलि के जरिए हजारों करोड़ की कंपनी खड़ी की और राजनीति में
खुलकर दखल दिया। - श्री श्री रविशंकर, जग्गी वासुदेव (सद्गुरु) – दोनों ने कार्पोरेट और सत्ता के साथ
साझेदारी की। - इस काल में मीडिया ने भी बाबाओं को ‘राष्ट्रीय हित’ के प्रतीक के रूप में दिखाया।
- 2014 के बाद: गठबंधन का चरमोत्कर्ष
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार आने के बाद बाबाओं, पूंजीपतियों और सत्ता का
गठजोड़ सार्वजनिक और संस्थागत रूप से मजबूत हुआ।
बाबा – राष्ट्र निर्माता; पूंजीपति – राष्ट्रनिर्माण के दाता और नेता – राष्ट्र के रक्षक के रूप में प्रस्तुत
किए गए।
इस त्रिकोणीय गठबंधन ने: मीडिया को नियंत्रित किया, विपक्ष को बदनाम किया, जनता को
‘राष्ट्रभक्ति’ और ‘धार्मिक खतरे’ के नारों में उलझाया।
इतिहास का मूल्यांकन : यह गठबंधन समय-समय पर भिन्न रूपों में प्रकट होता रहा, लेकिन
आज यह सबसे खतरनाक रूप में मौजूद है – क्योंकि अब यह तकनीक, सोशल मीडिया, और
राष्ट्रवाद की वैचारिकी से लैस है। आंबेडकर की यह चेतावनी अब और प्रासंगिक हो गई है: “यदि
जनता ने धर्म और पूंजी की गठजोड़ वाली राजनीति को नहीं पहचाना, तो संविधान केवल
किताबों में रह जाएगा।”
इतिहास से सबक : इतिहास यह दिखाता है कि जब-जब धर्म, धन और सत्ता का गठजोड़ हुआ है,
तब-तब जनतंत्र कमजोर हुआ है और आम जनता की चेतना भ्रमित हुई है। यह गठबंधन कोई
अचानक बना तंत्र नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से विकसित और सुसंगठित संरचना है, जो आज
अपने सबसे आक्रामक रूप में मौजूद है।
अब यह जरूरी हो गया है कि हम इतिहास की इन परतों को पहचानें, और आधुनिक
लोकतंत्र की रक्षा के लिए इस गठबंधन की आलोचना करें — वैचारिक रूप से, नैतिक रूप से,
और राजनीतिक रूप से।
कैसे इस गठबंधन ने आम जनजीवन प्रभावित किया?
- सामाजिक चेतना का हरण और धार्मिक अंधता का विस्तार : भावनाओं पर नियंत्रण
इस गठबंधन ने आम जनता की तार्किक चेतना की जगह भावनात्मक उन्माद को
स्थापित किया। बाबा धार्मिक प्रवचनों में ‘भारत माता’, ‘हिंदू धर्म’, ‘गौरक्षा’ जैसे मुद्दों को प्रमुख
बनाते हैं, जिसे पूंजीपतियों के मीडिया मंचों पर जोर-शोर से फैलाया जाता है। राजनेता इन
नारों को चुनावी मुद्दा बनाते हैं। लोग अपनी गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे
असली मुद्दों को भूलकर धर्म और राष्ट्र के नाम पर उकसाए गए भावनात्मक मुद्दों में उलझ जाते
हैं। - गरीब और श्रमिक वर्ग के अधिकारों का क्षरण : कॉर्पोरेट-धार्मिक गठजोड़ के चलते श्रम-
विरोधी नीतियाँ
जब बाबा रामदेव जैसी शख्सियतें बड़ी कंपनियाँ चलाने लगती हैं और उन्हें सरकारी छूटें
मिलती हैं, तब उनका पहला शिकार बनते हैं श्रमिक वर्ग। न्यूनतम वेतन, यूनियन अधिकार,
सामाजिक सुरक्षा – ये सब नज़रअंदाज़ किए जाते हैं। उदाहरणार्थ : पतंजलि के श्रमिकों ने कई
बार शोषण की शिकायत की, पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि कंपनी के पीछे बाबा और
सत्ता दोनों खड़े थे। - शिक्षा और वैज्ञानिक सोच पर हमला : गैर-वैज्ञानिक विचारों का प्रचार
बाबा और राजनेता मिलकर वैदिक विज्ञान, गौमूत्र, विमान-विद्या जैसे मिथकों को
विज्ञान की तरह प्रस्तुत करते हैं। पूंजीपति इस विचारधारा को ‘भारतीय परंपरा’ के नाम पर
स्कूलों और टीवी में प्रायोजित कर फैलाते हैं। आम जनता विशेषकर ग्रामीण और निम्न-मध्यवर्ग
की सोच अवैज्ञानिक और पोंगापंथी बनती जा रही है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ‘धर्मविरोधी’ या
‘पश्चिमी साजिश’ कहकर खारिज किया जाता है। - महिलाओं और दलितों के खिलाफ सामाजिक जड़ता का सशक्तिकरण :
बाबाओं की प्रवचन शैली में पितृसत्ता और वर्णव्यवस्था की पुनर्स्थापना साफ-साफ
परिलक्षित होती है। कई बाबा खुले मंचों पर यह कहते हैं कि महिलाएं घर के अंदर रहें, पति की
सेवा करें, शिक्षा उन्हें भटका देती है। दलितों को “पिछले जन्म के कर्मों का फल” बताकर उनका
सामाजिक शोषण धार्मिक रूप से वैध ठहराया जाता है।
- जातिवाद और लैंगिक असमानता का धार्मिक और सांस्कृतिक समर्थन बढ़ता है।
- पीड़ित वर्ग विरोध करने के बजाय इसे “धर्म की इच्छा” मानने लगता है।
- जन-संपत्ति और संसाधनों की लूट : पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने वाली सरकारी नीतियाँ
राजनेता पूंजीपतियों को जमीन, खनिज, जंगल और जल जैसे संसाधनों का दोहन करने
की छूट देते हैं। बाबा इस लूट को “राष्ट्र निर्माण” बताकर नैतिक समर्थन देते हैं। उदाहरणार्थ :
- आदिवासी इलाकों में खनन परियोजनाओं को “विकास” बताकर वहां के
निवासियों को उजाड़ा गया। - बाबा या धार्मिक संस्थाएं उन क्षेत्रों में ‘सेवा कार्य’ या ‘आध्यात्मिक शिविर’
चलाकर उस विस्थापन को सामान्य बनाती हैं।
- मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला :
बाबा+पूंजी+राजनीति = प्रचारतंत्र का नियंत्रण : टीवी चैनलों, यूट्यूब पत्रकारिता और सोशल
मीडिया में धार्मिक कंटेंट और राष्ट्रवादी प्रचार का बोलबाला है। इस गठबंधन के खिलाफ बोलने
वालों को “देशद्रोही”, “धर्मद्रोही” या “अर्बन नक्सल” कहकर चुप कराया जाता है।
परिणाम: आम जनता को विकल्पहीन और भ्रमित बना दिया जाता है। स्वतंत्र पत्रकारिता और
आलोचनात्मक चिंतन पर ताला लग जाता है। - स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाओं का निजीकरण
धर्म के नाम पर सरकार की जिम्मेदारियों से मुक्ति : जब बाबा अस्पताल खोलते हैं या धार्मिक
ट्रस्ट स्कूल चलाते हैं, तो सरकार अपनी जिम्मेदारी से हाथ खींच लेती है। सरकारी संस्थानों की
बजाए धार्मिक संस्थाओं को छूट, जमीन और सब्सिडी दी जाती है।
परिणाम: आम जनता को “धर्म आधारित सेवा” मिलती है, न कि “अधिकार आधारित सुविधा”।
गरीबों के लिए राज्य की जिम्मेदारी धीरे-धीरे गायब होती जाती है।
- वोटर की चेतना का निर्माण नहीं, विनाश
जनता को ‘भक्त’ में बदला गया : बाबा और नेता दोनों जनता को भक्त या अनुयायी के रूप में
देखते हैं, न कि नागरिक के रूप में। चुनावी रणनीतियाँ धार्मिक भावनाओं पर आधारित होती
हैं, न कि विकास योजनाओं पर।
परिणाम: लोकतंत्र का नागरिक अब सवाल नहीं करता, सिर्फ समर्थन करता है। मतदान अब
जनहित का नहीं, धर्म और पहचान का मामला बन गया है।
आम जनजीवन की त्रासदी : बाबा, पूंजीपति और राजनेता — तीनों मिलकर आम जनजीवन को
नियंत्रित, भ्रमित और कमजोर कर रहे हैं:
1)चेतना पर कब्ज़ा; 2) विकल्पों का विनाश; 3) वास्तविक समस्याओं की उपेक्षा; 4) धार्मिक
राष्ट्रवाद का दबाव
यह गठबंधन जनतंत्र के खिलाफ एक सांस्कृतिक और मानसिक युद्ध छेड़ चुका है। जब
तक आम जनता अपनी चेतना की सत्ता वापस नहीं लेती, तब तक यह गठबंधन उन्हें “भगवान
के नाम पर शोषण”, “धर्म के नाम पर लूट”, और “राष्ट्र के नाम पर चुप्पी” देता रहेगा।
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तेजपाल सिंह ‘तेज’ की गजल, कविता, और विचार की तीन दर्जन किताबें प्रकाशित
चुकी हैं- दृष्टिकोण, ट्रैफिक जाम है, गुजरा हूँ जिधर से आदि ( गजल संग्रह), बेताल दृष्टि, पुश्तैनी पीड़ा आदि (कवितासंग्रह), रुन-झुन, खेल-खेल में आदि ( बालगीत), कहाँ गई वो दिल्ली वाली ( शब्द चित्र), ग्यारह प्रतिक्रियात्मक निबन्धसंग्रह और अन्य। तेजपाल सिंह साप्ताहिक पत्र ग्रीन सत्ता के साहित्य संपादक, चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक,आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं। हिन्दी अकादमी (दिल्ली)द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं। औरभी कई सामाजिक/नागरिक सम्मां। स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन में रत हैं।

