Site icon अग्नि आलोक

मेरी स्मृतियों में एक आदिवासी महिला

Share

अजय कुमार सिंह निर्दोष
एक फ़िल्म की शूटिंग कर के झारखंड के राँची से बोकारो होते हुए वाराणसी लौट रहा था। तभी डाल्टेन गंज से कुछ पहले किसी छोटे से रेलवे स्टेशन पर अपनी ट्रेन का इंतज़ार करती इस आदिवासी महिला व उसके पीठ पर के गोफन में लटके बच्चे की तस्वीर ट्रेन की खिड़की से ले लिया था। यह तस्वीर मुझे आज भी बेचैन कर देती है। क्योंकि मैंने उन महिलाओं के संघर्षमय जीवन को बहुत नज़दीक जाकर अपनी आँखों से देखा है। महसूस किया है।
सोचता हूँ, मेरा व्यथित मन आज तथाकथित अपने महान लोकतंत्र को चुनौती देते इस बच्चे के बारे में क्या कभी अपनी समझ बनाकर ज़िम्मेदारी को तय कर पाएगा ? अब तो आलम यह है कि इन बच्चों की जिन्दगी की बात करने पर आम जन को जेल व जुर्माने तक हाकिम लगाने से पीछे नहीं हट रहे। #हिमांशु के साथ हमलोग जैसे न जाने कितने लोगों को यह सवाल होश सम्भालने के वक्त से ही व्यथित करता आ रहा है। कल को इनके बीच की मुर्मू मैडम देश की राष्ट्रपति बन कर पाँच साल बाद नज़र और पद से उतर जाएँगी लेकिन यह महिला तो यहीं की यहीं खड़ी रह जाएगी। इस सवाल ने आज मुझे अपनी ही लगभग बीस साल पहले की वो पंक्ति याद दिला दिया :–

लिपटकर पत्थरों से
जब सरिता नें आँसू बहाया होगा,
गीत गा कर तब उसने
इस जग को गुदगुदाया होगा ,
भूख से तड़प कर
कैसे सो गया वो लाल,
लोरियों में माँ नें
संसद को बताया होगा।

      🖋 अजय कुमार सिंह निर्दोष
Exit mobile version