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*स्त्री नहीं समझी गई, इसलिए काल्पनिक ईश्वर की सृष्टि*

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   डॉ. नेहा

> स्त्री को न समझकर, पुरुष ने ईश्वर को कल्पना में गढ़ा और वही कल्पना आज तक “सत्य” कहलाती है।

   ईश्वर की कल्पना वहाँ से शुरू हुई जहाँ स्त्री को छोड़ा गया। आधे ब्रह्मांड को छोड़कर बनाई गई खोज पूर्ण कैसे हो सकती थी? स्त्री को त्यागकर जिधर ध्यान गया वह ईश्वर नहीं, एक सूखा आकाश था।

 जिसने माँ को नहीं जाना वह ईश्वर को क्या जानेगा? जो गर्भ को नहीं समझा वह ब्रह्म की गहराई को नहीं छू सका।  स्त्री को बाहर रखकर बने सारे ग्रंथ अधूरे हैं, असंतुलित हैं।

 स्त्री कोई पात्र नहीं वह स्रोत है, ईश्वर का भी स्रोत। स्त्री को समझना कोई लौकिक जिज्ञासा नहीं, यह आध्यात्मिक अंतिम चुनौती है। जिसने स्त्री को साधन समझा उसने ईश्वर को उपयोगी वस्तु बना डाला।

   पुरुष को मिला ईश्वर क्योंकि वह स्त्री को खो बैठा था। स्त्री मौन थी, इसलिए पुरुष ने ग्रंथों में उसका नाम नहीं लिखा। पुरुष को जो मिला वह ‘प्रकाश’ था, पर उसमें प्रेम नहीं था।

    पुरुष की सारी खोजें काम और ईश्वर के बीच द्वंद्व थीं। वह स्त्री से डर गया इसलिए वह जंगल गया।  स्त्री प्रेम मांगती थी, पुरुष ज्ञान दे बैठा।

     पुरुष ने ईश्वर खोजा, क्योंकि स्त्री को न पा सका।  जिसे स्त्री मिल जाए वह ईश्वर को खोजता नहीं, जीता है. ईश्वर कोई उपलब्धि नहीं वह स्त्री की तरह ही एक उपस्थिति है।

     ईश्वर को पाने की जितनी लालसा पुरुष में है, उतना ही स्त्री को खोने का भय भी। इस भय ने ही परमात्मा की सबसे सुंदर राह को अंधेरे में ढंक दिया।

   स्त्री मौन है, ईश्वर की पहली भाषा। स्त्री ऊर्जा नहीं, ऊर्जा की जननी है. स्त्री को जब देवी कहा गया तभी से वह इंसान होना भूल गई।  स्त्री मंदिर में पूजी गई — पर घर में समझी नहीं गई। स्त्री एक धागा है,  जिससे सृष्टि की सारी माला बंधी है।

     वह शब्द नहीं बोलती पर उसकी आँखें ईश्वर की लिपि हैं। स्त्री को समझना काम और प्रेम दोनों से ऊपर उठने का कार्य है। वह कोई उपलब्धि नहीं वह एक दिशा है, जिसे आत्मा पहचानती है। पुरुष की गति है, स्त्री की गहराई।

    जो गति में गहराई नहीं पाता  वह न स्त्री को समझ पाता है, न परमात्मा को। आधुनिक खोजें सब पुरुष की पीड़ा से जन्मीं, स्त्री की मौनता से नहीं। विज्ञान की भाषा में स्त्री एक हार्मोन है,  पर प्रेम की भाषा में वह ब्रह्म है।

    आधुनिक शिक्षा स्त्री को पुरुष बनाना चाहती है, क्योंकि उसे स्त्रीत्व से डर है।  स्त्री जब बोलने लगी पुरुष की भाषा, तब वह अपनी मौनता खो बैठी।  स्त्री के मौन में वह संगीत है, जो किसी भी वेद से बड़ा है।

    जिसने स्त्री को सज़ा दी, उसने ईश्वर को खो दिया। स्त्री को कुर्सी देने वाले भूल जाते हैं, कि गोद कुर्सी से बड़ी होती है। ईश्वर की माँ को भूल कर मंदिर बनवाने वाले पाषाण को पूजते हैं, ऊर्जा को नहीं। हमारा मिशन इस कल्चर को दुत्कारता है. हमारे यहाँ से स्त्री वो सबकुछ पा सकती है, जो उसे चाहिए. इज्जत, सम्मान, वास्तविक प्यार, जरूरत भर धन, दिव्य संतान, सेवा और पूजा सबकुछ. बिना कुछ भी दिए और अपने घर तक में. व्हाट्सप्प +91 99977 41245 पर संपर्क किया जा सकता है.

    आधुनिक स्त्री को अधिकार मिल रहे हैं, लेकिन आदर खोता जा रहा है।स्त्री को समानता नहीं चाहिए, उसका मौलिक सम्मान चाहिए। स्त्री कोई विचार नहीं,  ईश्वर का धड़कता हुआ हिस्सा है। स्त्री की उपेक्षा ईश्वर की अवमानना है।

   जब तक स्त्री को समझने की चीज़ मानोगे, वह अज्ञात रहस्य बनी रहेगी।

स्त्री कोई उत्तर नहीं, वह वह प्रश्न है, जो जगाता है। स्त्री को शब्द नहीं देते, वह मौन से संसार बदल देती है।

     स्त्री को मत छुओ तर्क से वह स्पर्श नहीं, अनुभव है। स्त्री को भुलाकर जो ध्यान लगाते हैं, वह भीतर से सूख जाते हैं। स्त्री को पाना नहीं, उसके मौन के आगे झुकना है।

   स्त्री को समझ लिया, तो ईश्वर का एक दरवाज़ा खुल गया।  स्त्री के मौन में उतरना, ईश्वर के अस्तित्व को भीतर महसूस करना है। स्त्री को जब जाना जाएगा, ईश्वर की अधूरी कथा पूरी हो जाएगी।

       हमारा कथन स्त्री को नहीं, स्त्री के मौन को समर्पित है। उस मौन को, जो पुरुष ने समझा नहीं, खो दिया, और कल्पना में ईश्वर रच डाला।

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