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आया भी राम गया भी राम

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शशिकांत गुप्ते

आया राम गया राम की परंपरा बदस्तूर जारी रहना चाहिए।
इधर थे तो उधर वाले तानाशाह थे। आश्चर्य जिन्हें तानाशाह कहा था, वे बहुत उदारमना हैं, इनके कार्यालय में यह गीत सतत बजता रहता है,
ब कोई तुम्हरा मन वहाँ ऊब जाए
तब तुम हमारे पास आना सीधे
हमारा दर खुला है खुला ही रहेगा
बकी हो तुमने, हमे गालियां
लगे हो तुम्हारे पर गम्भीर आरोप
डरने की तुमको जरूरत नहीं हमारा घर खुला है खुला ही रहेगा
तुम जैसों के लिए

आया राम गया राम’ वाक्य एक लोकप्रिय जुमला बन जाने की बड़ी दिलचस्प कहानी है। आया राम गया राम का किस्सा शुरू हुआ साल 1967 में।
इस वाक्य को अमर कर देने वाले शख्स थे गया लाल। गया लाल हरियाणा के पलवल जिले के हसनपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए थे। आइए आज आपको वह कहानी सुनाते हैं…
​एक ही दिन में तीन बार पार्टी बदली
पहले तो उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़कर जनता पार्टी का दामन थाम लिया। फिर थोड़ी देर में कांग्रेस में वापस आ गए। करीब 9 घंटे बाद उनका हृदय परिवर्तन हुआ और एक बार फिर जनता पार्टी में चले गए। खैर गया लाल के हृदय परिवर्तन का सिलसिला जारी रहा और वे वापस कांग्रेस में आ गए।
किसी भी मानव के द्वारा उक्त आचरण को लेकर मनोविज्ञान (Psychology) क्या कहता है?
इस मुद्दे पर एक अनुभवी मनोचिकित्सक ने कहा इस तरह का आचरण स्वार्थ से भरा मानसिक विकार है। इस विकार के रोगी दोनों ही है। आया राम को अपने स्वार्थ के लिए स्वीकार करने वाले भी गया लाल तो स्वयं रोगी है ही।
हार्दिक शब्द में दिल समाहित है। अंग्रेजी में इसे Hearty कहतें हैं।
दिल की धड़कन का स्पंदन जबतक चलता है तबतक मानव जीवित रहता है।
उक्त रोग से ग्रस्त रोगियों के पास दिल नाम का अवयय होता होगा यह अहम प्रश्न है?
दिल तो होता है लेकिन इनका दिल है कि, मानता नहीं कारण इनलोगों का दिल विचारविहीन होता है।
यह भी समझना जरूरी है कि, लोकप्रिय होना और नेतृत्व की क्षमता होना दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।
इनदिनों संयोग से बहुत कुछ घटित हो रहा है। योग के संयोग से कोई बाबा उद्योगपति बन जाता है। संयोग से भष्ट्राचार के विरुद्ध आंदोलन कर कोई सूबे का मुखिया बन जाता है। भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध आंदोलन में हाजिर होकर नेता बनने वाला देश के मानचित्र से गैरहाजिर ही जाता है। यह भी संयोग ही कहा जाएगा।
सम्भवतः भ्रष्ट्राचार के विरुद्ध किए गए आंदोलन के कॉन्ट्रैक्ट की मियाद पूरी हो गई होगी?
वैसे भी अब तो भ्रष्ट्राचार हो नहीं सकता है। कारण शसक्त ढंग से ना खाऊंगा ना खाने दूंगा का नारा बुलंद हो गया है।
बाजारवादी संस्कृति सियासत में भी हावी हो गई है।
भ्रष्ट्राचार के गम्भीर आरोप से कोई व्यक्ति पीड़ित है और वह विरोधी दल में है तो उसके के लिए सुनहरा अवसर है। बस उसे सिर्फ गया लाल बनना है।
बाजारवादी संस्कृति में एक उत्पाद खरीदने पर एक फ्री, की स्कीम होती है। बाजारवादी संस्कृति सबसे अहम स्कीम होती है, यूज एंड थ्रो वापरों और फेंक दो।
जो लोग गया लाल जैसों का हार्दिक स्वागत करेंगे उनको भी बधाई और जो गया लाल का रोल अदा करेंगे उनका भी हार्दिक अभिनंदन।
प्रसिद्ध शायर स्व. राहत इंदौरीजी का यह शेर याद आया।
कह कर तो गए थे कि कपड़े बदल कर आतें हैं
साले सब चेहरा बदल कर आ गए

गया लाल को शुभकानाएं। हो सकता है कि गया लाल ही किसी सूबे के लिए चेहरा बन जाएं।
सियासित में इनदिनों लोगों के सीरत से ज्यादा सूरत की एहमियत हो गई है।
आश्चर्य तो इस बात का होता है कि, गया लाल का रोल अदा करने वालों की National News (राष्ट्रीय समाचार) बन जाती है? न्यूज चनलों पर इन गया लालों पर बहस होती है?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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