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सामाजिक समरसता, समानता एवं सामाजिक न्याय का वर्तमान भारतीय समाज के संदर्भ में सटीक विश्लेषण

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प्रकृति में मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी कहा गया है क्योंकि वह अपने जीवन निर्वाह हेतु संपूर्ण रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो सकता हैं इसलिए उसने इस अपूर्णता को पूर्ण करने के लिए अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए व्यक्ति से व्यक्ति की निर्भरता ,सहअस्तित्व के लिए उसने समाज का निर्माण किया है। व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज का अस्तित्व सामने आता है और इसकी व्यापकता ही राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक है। इसलिए व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है कि सामाजिक समरसता बनी रहे। यहां हमारा सामाजिक समरसता से अर्थ है समाज में व्यक्तियों के बीच किसी भी तरह का भेदभाव, गैर बराबरी , व्यक्तिवादीता और असमानता की अनुपस्थिति होना ही सामाजिक समरसता है, ताकि समाज में व्यक्तियों के विभिन्न समूहों  के बीच एक सामाजिक सौहार्द बना रहे।सामाजिक समरसता को यदि हम भारतीय समाज के संदर्भ में देखते हैं तो भारतीय समाज में कई विसंगतियां दृष्टिगोचर होती है जैसे जातिवादी दृष्टिकोण, सांप्रदायिकता, गरीबी, बेरोजगारी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव  और अशिक्षा आदि सामाजिक विषमताएं मौजूद जो यहां के समाज में “सामाजिक समरसता “को बनाए रखने में सबसे बड़ी बाधा के रूप में सामने आती है।सामाजिक समरसता की स्थापना के लिए समाज में सामाजिक स्तर पर “सामाजिक समानता”को लाना परम आवश्यक है। एक व्यक्ति के सामाजिक जीवन में जन्म, धर्म ,जाति और लिंग पर आधारित भेदों को समाप्त किए बिना उसके लिए वास्तविक समानता की स्थापना संभव नहीं है।सामाजिक समानता का वास्तविक अर्थ है सभी विशेष अधिकारों का अंत अर्थात समाज में जाति, धर्म ,लिंग और व्यापार के आधार पर विभिन्न व्यक्तियों में कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। सामाजिक दृष्टिकोण से सभी व्यक्ति समान होने चाहिए और उन्हें सामाजिक उत्थान के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।सामाजिक समानता की ही तरह राजनीतिक समानता की उपेक्षा की जाती है जिसमें सभी व्यक्तियों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त होने की बात की जाती है।राजनीतिक अधिकार प्रदान किए जाते समय रंग जाति और लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए, उपरोक्त अर्थो की तरह आर्थिक समानता की स्थापना को भी लक्ष्य के रूप में रखा जाना चाहिए क्योंकि इसके अभाव में राजनीतिक एवं नागरिक समानता का कोई मूल्य नहीं रह जाता।आर्थिक समानता से आशय है समाज में आय  की बहुत अधिक विषमता या असमानता  नहीं होनी चाहिए।समाज में लोगों के बीच वास्तविक सामाजिक समरसता तभी स्थापित की जा सकती है जब तक कि समाज में समानता का स्तर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आधार पर स्थापित ना हो, तब ही हम समाज में “सामाजिक न्याय”की अवधारणा को वास्तविकता में चरितार्थ कर पाएंगे वरना ये मात्र एक कोरी कल्पना बनकर रह जाएगी।

VIJAY KUMAR
Social Reformer and Blogger

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