साम्राज्यवाद और समाजवाद की जो समझ जवाहरलाल नेहरू को यूरोपीय जगत से प्राप्त हुई, इसके ठीक विपरीत आचार्य नरेंद्र देव को यह विरासत एशियाई और भारतीय देशज परंपरा से प्राप्त हुई।
उनके सहपाठियों में दर्शन और तंत्र विघा के महान विचारक महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज रहे हैं। खुद आचार्य नरेंद्र देव बौद्ध धर्म दर्शन और भारतीय दर्शन के उच्च कोटि विद्वान थे। स्वाधीन भारत में आचार्य नरेंद्र देव लखनऊ विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे। उपकुलपति रहते हुए वे अपने वेतन का अधिकांश हिस्सा समाजवादी पार्टी और अपने छात्रों को दान स्वरूप दे देते थे।
सन् 1929 में काशी विद्या पीठ में महात्मा गांधी की आचार्य नरेंद्र देव से मुलाकात हुई। महात्मा गांधी ने श्री प्रकाश जी से पूछा-
ऐसा हीरा मुझसे अब तक क्यों छुपा कर रखा था? श्री प्रकाश जी ने कहा कि एक अच्छे हीरे की परख तो अच्छे जौहरी को ही हो सकती है।
आचार्य नरेंद्र देव के रूप में जो हीरा महात्मा गांधी को प्राप्त हुआ, उसे गांधी ने ताउम्र हिफाजत के साथ संजो कर रखा। वक्त जरूरत पर आजमाया भी। सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन के साथ तो आचार्य नरेंद्र देव थे ही, द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब कांग्रेस पार्टी, जवाहरलाल नेहरू, डॉ.राम मनोहर लोहिया और दूसरे नेताओं ने महात्मा गांधी पर मित्र देशों के समर्थन के लिए दबाव बनाया तो महात्मा गांधी ने मना कर दिया।
महात्मा गांधी यह भली-भांति जानते थे कि दुनिया के लिए जितना नुकसानदेह और खतरनाक फासीवाद है, उससे कम खतरनाक साम्राज्यवाद नहीं है। ऐसे वक्त आचार्य नरेंद्र देव गांधी साथ खड़े थे। इसकी एक बड़ी वजह शायद यह भी है कि साम्राज्यवाद और समाजवाद की जो समझ जवाहरलाल नेहरू को यूरोपीय जगत से प्राप्त हुई, इसके ठीक विपरीत आचार्य नरेंद्र देव को यह विरासत एशियाई और भारतीय देशज परंपरा से प्राप्त हुई।
रोजा लुक्सवर्ग से आचार्य से सहमत नजर आते हैं कि-
‘समाजवाद केवल ब्रेड-बटर से जुड़ा मसला नहीं है। यह व्यापक संस्कृति से भी संबंधित है।’ और कहना न होगा कि भारत के समाजवादी आंदोलन ने संस्कृति के सवाल की ऐसी उपेक्षा की कि आज इसकी तुरही किसी और खेमे में बज रही है। हालांकि जवाहरलाल नेहरू से मात्र दो हफ्ते बड़े आचार्य नरेंद्र देव गहरे दोस्त भी थे।
आचार्य नरेंद्र देव के राजनीतिक जीवन में कई मोड़ आए। कांग्रेस में रहते हुए वे सन् 1937 में संयुक्त प्रांत से विधानसभा के सदस्य रहे। सन् 1946 में विधानसभा के निर्विरोध सदस्य चुने गए। सन् 1948 में नासिक सम्मेलन में कांग्रेस पार्टी और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर गांधी के मृत्यु के तीन महीने बाद समाजवादी पार्टी में चले गए।
हालांकि कहा यह भी जाता है कि वे कांग्रेस पार्टी से अलग नहीं होना चाहते थे। पर आचार्य जी कांग्रेस छोड़ते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि कांग्रेस अब वह मोर्चा नहीं रह गया, जहां हर तरह की विचारधारा के लिए जगह हो। गांधी जी भी कुछ ऐसा ही सोचेते होंगे। वे चाहते थे कि कांग्रेस को विसर्जित कर ‘ लोक सेवक संघ’ बना देना चाहिए।
कांग्रेस देश की आजादी के आंदोलन के लिए बनी पार्टी थी। गांधी की राय में कांग्रेस कार्यकर्ताओं को रचनात्मक कामों में लगना चाहिए। गांधी की इस मंशा को जाहिर करते हुए उनके जीवनीकार अमरीकी पत्रकार लुई फिशर बताते हैं कि-
‘जब सरकार और दल एक ही होते हैं, तो दल केवल रबड़ की मुहर बन जाता है और उसका अस्तित्व काल्पनिक हो जाता है।’ भारत में आजादी के बाद लोकतंत्र कैसे बना रह सकता है- यह गांधी के सोच का विषय रहा है। इस वजह से वे कांग्रेस को अपनी राय से अवगत भी कराते रहे हैं।
15 नवंबर 1947 को कांग्रेस महासमिति की बैठक हुई। इस बैठक में आचार्य जे. बी. कृपलानी कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की सूचना देते हैं। कांग्रेस महासमिति की इस बैठक में महात्मा गांधी भी उपस्थित थे। कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होना था।
महात्मा गांधी का यह मौनवार था। महात्मा गांधी ने एक चिट पर अपने उम्मीदवार का नाम लिखकर जवाहरलाल नेहरू को दिया। जब चिट खोलकर नेहरू ने पढ़ा तो वह नाम आचार्य नरेंद्र देव का था। पहले तो नेहरू भी नरेंद्र देव के नाम पर सहमत थे, बाद में पलट गए।
नेहरू और सरदार पटेल के उम्मीदवार बाबू राजेंद्र प्रसाद बने। शुरुआती ना-नुकुर के बाद राजेंद्र बाबू राजी हो गए। कांग्रेस के वहीं अध्यक्ष हुए। जरा सोचिए कि उस वक्त अगर आचार्य नरेंद्र देव कांग्रेस के अध्यक्ष हो गए होते तो अपने देश के नवजात लोकतंत्र में सत्ता और संगठन का कैसा स्वरूप भविष्य में उभरता?
और देश की सताधारी पार्टी सरकार की महज जीहजूरी और एकतरफा तरफदारी के बजाय अंकुश का भी काम करती। जो कहना न होगा कि लोकतंत्र जड़ को मजबूत ही करता। आज देश में ऐसे विचारों के लिए कोई जगह नहीं दिखती। जाहिर है इससे देश के लोकतांत्रिक सेहत पर दूरगामी असर पड़ेगा। ऐस वक्त बार-बार आचार्य नरेंद्र देव याद आएंगे।

