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मध्यप्रदेश में अब अडानी की बिजली !

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सुसंस्कृति परिहार
मध्यप्रदेश के मामा के सिर पर ही नहीं प्रदेश की जनता पर मोदी जी के अडानी की बिजली गिरने की पूरी तैयारी हो चुकी है। छत्तीसगढ़ विभाजन से पूर्व यह प्रदेश बिजली उत्पादन में अग्रणी रहा।बाद में इस प्रदेश का दुर्भाग्य ये रहा कि छत्तीसगढ़ की मंहगी बिजली की वजह से इसे महाराष्ट्र से सस्ती बिजली लेकर काम चलाना पड़ा।बाद में बिजली उत्पादन के प्लांट लगे जिनका उत्पादन 2003 तक शुरु नहीं हो पाया।इसे चुनावी मुद्दा बनाया गया और उमाभारती और कमलनाथ के  लगभग 15 -15 माहों को अलग कर दें तो शिवराज मामा प्रदेश में  कांग्रेस के शासन में स्थापित प्लांटों से भरपूर बिजली दिलाते रहे हैं। हमेशा उनके भाषणों में बिजली की पुरानी यादें दुहराई जाती रही हैं।


लेकिन अब मामा का हाल बुरा है। बुरी तरह बिजली कटौती राजधानी भोपाल में जारी है तो अन्य क्षेत्रों ख़ासकर ग्रामीण अंचलों की स्थिति कैसी होगी इसका अंदाजा सहज ही लगा सकते हैं।इधर खरीफ की फसलें आ चुकी हैं उनकी गहाई और रबी की जताई हेतु बोनी से  पानी चाहिए किन्तु बिजली गोल है। बहरहाल जिस बिजली की यादों के सहारे मामा अब तक मुख्यमंत्री रहे हैं वह इस बार मुश्किल लग रहा है।अब सब हाईकमान के अडानी के हाथों में है और उसे चाहिए मुनाफा। उसने पहले से ही तमाम कोयला खदानों पर कब्जा कर रखा है।आए दिन  खबरें आ रहीं हैं कि बिजली संयंत्रों में कोयला की उपलब्धता कुछ दिनों की है एवं अब तक अडानी जी ने जो कोयला दिया वह घटिया था जिससे कोयला ज्यादा जला और बिजली कम यूनिट पैदा हुई।एक यूनिट बिजली उत्पादन के लिए 620 ग्राम कोयले की आवश्यकता होती है, लेकिन मप्र के प्लांटों में एक यूनिट बिजली के लिए 768 ग्राम कोयला खपाया गया। मध्यप्रदेश के पॉवर प्लांट्स में मात्र नौ दिनों में लगभग 88 हजार मीट्रिक टन कोयला फूंका गया। फिर भी
मध्य प्रदेश में दो दिन में बिजली उत्पादन 783 मेगावाट घटा , सिंगाजी की एक इकाई  सरकार को बंद करनी पड़ी। सेंट्रल ग्रिड से6,311मेगावाट बिजली मांगी थी, इसके विरुद्ध 6,003 मेगावाट बिजली ड्रा की गई है।  मध्य प्रदेश ,बिजली संकट की ओर तेजी से बढ़ रहा है जबकि प्रदेश के ऊर्जा मंत्री सब ठीक कहकर लोगों को समझाने में लगे हैं।मामा मौन है।कुछ कहना मुश्किल भरा काम क्योंकि उन्हें वैसे ही हटाने की अंदर अंदर तैयारी चल रही है।उधर अडानी तो पक्का व्यापारी है उसे हर हाल में   भरपूर मुनाफा चाहिए। इसलिए पहले रद्दी कोयला और फिर उम्दा कोयला मनमाने दामों पर मामा को देंगा।तो देखते ही देखते जो गाज गिरेगी उसकी वजह से कई परिवर्तन आएंगे।
 लोग बिजली कम खर्च करेंगे। सरकार फिर ऐसे उपभोक्ताओं को पुरस्कार भी देगी।बिजली बचत के सेमीनार भी होंगे। बिजली बचाओ अभियान भी चलेगा। लोग जब बीस रुपए यूनिट बिजली खरीदेंगे तो छै रुपये यूनिट और मुफ्त बिजली भूल जायेंगे। बिजली चोरों को कड़वी दवा की तैयारी कर ली गई होगी। बहरहाल बिजली के अडानी के झटके सहने की तैयारी कर लें।अब मामा का जोर चलने वाला नहीं।कोयला संकट के बहाने बिजली कितनी मंहगी होगी कहना मुश्किल है। खेतों से अन्न लूटने और खेतहड़पने वाले अडानी की नियत को अब भी नहीं समझे तो बेड़ा गर्क ही समझिए।हिम्मत और हौसला हो तो अडानी की बिजली के खिलाफ एकजुट हों,किसानों से सीख लें।बेहतर हो अडानी के बढ़ते उत्पीड़न के विरोध में सब साथ साथ हों।बकौल राहुल गांधी हम दो हमारे दो के मकड़जाल से निकलने कटिबद्ध हों।

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