
“संजय कनौजिया की कलम”✍️
डॉ० राममनोहर लोहिया अपने लेख “हिन्दू बनाम हिन्दू” के आखिरी पैरा में लिखते है कि हिन्दू धर्म में उदारता और कट्टरता की इस लड़ाई को खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि धर्म से ही लड़ा जाए..यह हो सकता है, लेकिन रास्ता टेड़ा है और कौन जाने कि चालाक हिन्दू धर्म, धर्म विरोधियों को भी अपना एक अंग बनाकर निगल न जाए..इसके अलावा कट्टरपंथियों को जो भी अच्छे समर्थक मिलते हैं, वह कम पढ़े लिखे लोगों में और शहर में रहने वालों में..गॉंव के अनपढ़ लोगों में तत्काल चाहे जितना भी जोश आ जाए वे उसके स्थायी सदस्य नहीं बन सकते..सदियों की बुद्धि के कारण पढ़े लिखे लोगों की तरह गॉंव वाले भी सहिष्णु होते हैं..कम्युनिज़्म या फासिज्म जैसे लोकतंत्र विरोधी सिद्धांतों से ताक़त पाने की खोज में जो वर्ण और नेतृत्व के मिलते जुलते विचारों पर आधारित हैं, हिन्दू धर्म का कट्टरपंथी अंश भी धर्म-विरोधी का बाना पहन सकता है..अब समय है कि हिन्दू सदियों से इकठ्ठा हो रही गंदगी को अपने दिमाग से निकालकर उसे साफ़ करे.. जिंदगियों की असलियतों और परम सत्य की चेतना, सगुण सत्य और निर्गुण सत्य के बीच उसे एक सच्चा और फलदायक रिश्ता कायम करना होगा..केवल इसी आधार पर “वर्ण-स्त्री-सम्पति और सहिष्णुता” के सवालों पर हिन्दू धर्म के कट्टरपंथी तत्वों को हमेशा के लिए जीत सकेगा जो इतने दिनों तक उसके विश्वासों को गन्दा करते रहे हैं और उसके देश के इतिहास में बदलाव लाते रहें हैं..पीछे हटते समय हिन्दू धर्म में कट्टरता अक्सर उदारता के अंदर छिपकर बैठ जाती है..ऐसा फिर न होने पाए, सवाल साफ़ है..समझौतों से पुरानी गलती फिर दोहराई जाएंगी..इस भयानक युद्ध को अब समाप्त करना ही होगा..भारत के दिमाग की एक नई कोशिश तब शुरू होगी जिसमे बौद्धिक का रागात्मक से मेल होगा, जो विविधता में एकता को निष्क्रिय नहीं बल्कि, सशक्त सिद्धांत बनाएगी और जो स्वच्छ लौकिक खुशियों को स्वीकार करके भी सभी जीवों और वस्तुओं की एकता को नज़र से ओझल न होने देगी..!
आज हमारे लिए डॉ० भीमराव अंबेडकर और डॉ० राममनोहर लोहिया के संयुक्त धर्म सम्बन्धी विचारों पर फिर से नज़र डालना जरुरी हो गया है..सही मायनो में अंबेडकर और लोहिया के धर्म सम्बन्धी विचारों का प्रयाप्त अध्यन हुआ ही नहीं..इसके दो कारण हैं, पहला कि एक लम्बे अर्से से भारत में धर्म पर विचार केवल “हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न” तक सिमट कर रह गया है और दूसरा, क्योकिं प्रगतिशीलों ने सदैव धर्म को नज़र अंदाज़ किया..उदारवादी कहते रहे कि धर्म व्यक्तियों का निजी मामला है और होना चाहिए अतः इसपर कोई भी सार्वजनिक विमर्श का कोई अर्थ भी नहीं है..वामपंथियों का यह तर्क रहा कि धर्म एक फरेब है, जो लोगों को उनके असली आर्थिक हितों को समझाने से रोकता है..परन्तु क्या हम इस तथ्य को नज़र अंदाज़ कर सकते हैं कि धर्म आज भी हमारी राजनीति और सामान्य लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है..अतः डॉ० अंबेडकर समझ चुके थे कि बिना आर्थिक रूप से स्वतन्त्र हुए, न तो शूद्र कहे जाने वाले लोगों के उत्थान की कल्पना करना बेमानी है और न ही आधुनिक भारत की नीव मजबूत की जा सकती है..यह सब चीज़ें तभी प्राप्त की जा सकतीं हैं, जब शूद्रों के पास राजनीतिक सत्ता हो..इसके लिए वह राजनीतिक दल की आवश्यकता महसूस करने लगे थे..उनका मानना था कि शूद्रों के पास सारी समस्याएं इसलिए है क्योकिं उनके राजनीतिक सत्ता नहीं है..पहले गोलमेज सम्मलेन (1930) में उन्होंने कहा था कि “डिप्रेस क्लासेस की समस्या तब तक हल नहीं हो सकती जब तक कि राजनीतिक सत्ता इस तबके के लोगों में नहीं आ जाएगी..इस बात को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1936 में उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी “इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी” (आई.एल.पी) की स्थापना की..इस पार्टी में अस्पृश्य और मजदूर थे डॉ० अंबेडकर ने कहा भारतीय मजदूर ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद दोनों का एक शिकार हैं..इस दल का उद्देश्य ब्राह्मणशाही और पूंजीशाही दोनों से एक साथ लड़ना है..मजदूरों के बीच तब वामपंथी सक्रिय थे लेकिन उन्होंने वामपंथियों को अपनी पार्टी से अलग रखा..भारत के सन्दर्भ में अंबेडकर वामपंथियों की वर्ग सम्बन्धी अवधारणा से सहमत नहीं थे, इसीलिए वाम नेता श्रीपद अमृत डांगे के साथ मंच साझा करने के बावजूद वामपंथी पार्टी के राजनीतिक कार्येक्रमों से (आई.एल.पी) की दूरी बनाई रखी..!
डॉ० अंबेडकर के परनिर्वाण से कुछ पहले “रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया” की कल्पना को वे एक स्वरुप दे चुके थे..उनकी बैचेनी और सोच को इन शब्दों में देखा जा सकता है “इससे पहले कि में मर जाऊं, मुझे अपने लोगों को एक राजनीतिक दिशा देनी चाहिए”..डॉ० अंबेडकर ने कहा कि “मेरे लोग हमेशा गरीब, उत्पींड़ित और वंचित रहे हैं, इसी कारण आज उनमे एक नई सोच और नया आक्रोश जन्म ले रहा है”..डॉ० अंबेडकर नहीं चाहते थे कि उनके लोग वामपंथ और वामपंथियों की ओर आकर्षित हों..तभी उन्होंने उसी दौरान डॉ० लोहिया द्वारा डॉ० अंबेडकर को लिखे, पहले अनुरोध पत्र पर पी.के. अत्रे और एस. एम जोशी जैसे समाजवादी नेताओं से बात की और साथ काम करने की दिशा में सकारात्मक सोच- विचार किया…
धारावाहिक लेख जारी है
(लेखक-राजनीतिक व सामाजिक चिंतक है)