
संजय कनौजिया की कलम“
ख़ैर, उस दौर के 10वीं शताब्दी के भारत को समझना अत्यंत ही जरुरी हो जाता है, क्योकिं यही वो काल रहा था जहाँ से भारत एक नई दिशा, संस्कृति व नई परम्पराओं की ओर मुड़ना शुरू हुआ था..”महान अमरीकन लेखक मार्क टेवेन ने भारत के लिए कहा था..भारत मानव जाति का पालना है, ये वो धरती है जहाँ पर इंसानी भाषा का जन्म हुआ था, यह धरती इतिहास की माँ है, महान कहानियों की दादी है और परम्पराओं की परiदादी है..भारत वो धरती है जहाँ पर इंसानों की सबसे कलात्मक चीजों का खज़ाना है”..मार्क टेवेन ने ये शब्द इसलिए कहे थे, क्योकिं भारत इतिहास की सबसे प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है और इसमें हज़ारों वर्ष पुराने इतिहास में कई उतार चढ़ाव देंखें हैं..इसने मौर्या, गुप्ता और चोला जैसे महान और शक्तिशाली राजवंशों से लेकर महमूद गज़नी, तैमूर, नादिर शाह और फिरंगियों जैसे कई घुसपैठिये भी देखे..लेकिन भारत के इस हज़ारों साल पुराने समृद्ध इतिहास में जो सबसे अधिक बड़ा मोड़ था, वह 10वीं शताब्दी का काल था..!
यह वो वक्त था जब भारत दुनियां में सबसे ज्यादा अमीर देश था और साथ ही वह वो वक्त भी था जब भारत बहुत ही कमजोर भी था..इसी दौर में चोला जैसे महान साम्राज्य का उदय हुआ था और साथ ही विदेशी घुसपैठियों की पैठ भी बढ़ गई थी..उस काल में भारत में बहुत कुछ नया हो रहा था, 10वीं व 11वीं शताब्दी के मध्य के भारत के उस दौर को समझना होगा..जब भारत के इतिहास ने अपना रुख मोड़ा था..उस वक्त थीं, लोगों के रहन-सहन खान-पान, पहनावे और जीवन शैली से लेकर भारत की अर्थव्यवस्था और व्यापार तथा अलग-अलग राज्य कैसे शासन करते थे बल्कि उस दौर के बड़े बड़े शत्रुओं की नियत को भी समझना जरुरी है..10वीं शताब्दी में भारत आज के मुकाबले बहुत ही बड़ा था और क्षेत्रफल की दृष्टि से अत्यंत ही विशाल था..उस काल के भारत में पाकिस्तान, ईरान अफगानिस्तान, म्यांमार और बांग्ला देश शामिल थे लेकिन भारत की जनसँख्या का अनुमान लगाएं तो 3 से 4 करोड़ तक ही थी..उस वक्त का भारत ना केवल जमीन तक ही फैला था बल्कि समुन्द्र में भी दूर दूर तक फैला हुआ था और इस फैलाव के पीछे जो सबसे बड़ा कारण था, वह था चोला साम्राज्य..वर्ष 1014 में राजेंद्र चोला गद्दी पर बैठे और गद्दी पर बैठते ही उन्होंने सबसे पहले जो सुधार किया वह था जल सेना (जल शक्ति या नेवी)..सेना के उस दौर में जल सेना को कोई भी साम्राज्य अधिक महत्व नहीं देता था..लेकिन राजेंद्र चोला वह पहले भारतीय राज्य के राजा थे जिन्होंने भारतीय सेना को इतना मजबूत बनाया कि उन्होंने ना सिर्फ अपने साम्राज्य के आसपास द्वीप (टापू) पर बल्कि दूर दूर के टापुओं पर भी अपना राज्य स्थापित किया..10वीं शताब्दी में ना केवल चोला बल्कि पल्लवा चौलाकक्य, पांड्या और राष्ट्रकूता जैसे कई बड़े राजवंशों का राज था..इन राजवंशों ने उस दौर में पूरे भारत में कई बड़े बड़े मंदिरों का निर्माण करवाया था..हालांकि आगे चलकर उत्तर भारत में विदेशी आक्रांताओं द्वारा कई बड़े मंदिरों को तुड़वा दिया गया था..जिसे आज भी हम दक्षिण भारत में ऐसे विशाल मंदिरों को देख सकते हैं..ये राजा ना केवल इन मंदिरों को ईशवर के लिए बनवाते थे बल्कि ये मंदिर राज्य की आय का भी प्रमुख साधन हुआ करते थे..जहाँ भी यह विशाल मंदिर हुआ करते थे, उसके आसपास का क्षेत्र धार्मिक पर्यटन स्थल बन जाया करता था..जिस कारण व्यापार और रोजगारों को बढ़ावा मिलता था तथा राज्य की आय में अत्यधिक वृद्धि हुआ करती थी..राजवंशों के उस दौर के वक्त आम लोगों की जीवन शैली को समझें तो उस वक्त के लोगों के लिए दुनियां बहुत ही छोटी हुआ करती थी, क्योकिं उस दौर में यातायात के बहुत ही कम साधन हुआ करते थे..यातायात के नाम पर उस वक्त बैलगाड़ी हुआ करती थी या पैदल यात्रा..अगर किसी व्यक्ति को कुछ सकड़ों किलोमीटर दूर जाना होता था तो उसे उतनी ही दूरी तय करने में कई महीनो लग जाया करते थे यही कारण से लोग लम्बी दूरी की यात्रा बहुत ही कम करते थे..तब लोगों को कुछ सौ किलोमीटर के बाद की दुनियां तो बिल्कुल ही नई हुआ करती थी..इसी कारण से भारत में यह कहावत बहुत मशहूर हुआ करती थी कि यहाँ पग-पग में बोली बदलती है..!
यातायात के इतने कम साधन होने के कारण उस दौर में में औद्योगिक विकास भी इतना नहीं हुआ था, पूरे भारत में किसी भी सामान के उत्पादन के लिए फैक्ट्रियां तो ना के बराबर थीं..हालाँकि उस दौर में पडोसी देश चीन में कुछ खिलौनों और मिटटी के सामानों की फैक्ट्रियां जरूर स्थापित हो चुकी थीं, लेकिन अगर भारत की बात की जाए तो भारत मुख्यत: कपडे, खान-पान की चीज़ों का और मसालों का प्रमुख निर्यातक था..उस दौर में भारत इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था था कि वो अकेला पूरी दुनियां का 30% (प्रतिशत) खाने और कपड़ों का निर्यातक था तथा दुनियां का सबसे अमीर देश था..उस वक्त के भारत की जीडीपी, पूरी दुनियां की 32.9% (प्रतिशत) थी..अब जाहिर सी बात है कि जब कोई देश इतना अमीर होता है तो दुश्मनो की नज़र तो पड़ ही जाती है..भारत 10वीं शताब्दी से पहले भी समय-समय पर कई विदेशी आक्रमण झेलता आया था..लेकिन वर्ष 1000 ईस्वी में भारत अंदर से टूट चुका था भारतीय राज्यों के राजा अपने अपने राज्य विस्तार हेतू अक्सर एक दूसरे से ही लड़ते रहते थे और उनकी इसी लड़ाई की वजह से महमूद गज़नी की नज़र भारत पर पड़ गई उसने भारत को इतना लूटा कि भारत की जीडीपी 32.9%(प्रतिशत) से घटकर 28.9% (प्रतिशत) पर पहुँच चुकी थी..हालाँकि इतना बड़ा झटका सहने के बावजूद भारत तब भी काफी अमीर था..लेकिन सवाल यह आता है कि क्या किसी देश की जीडीपी ज्यादा होने से उस देश के लोगों पर भी फर्क पड़ता है ?..उस दौर के शहर और गाँव को समझें तो उस काल में शहर केवल नाममात्र के ही होते थे, भारत की अधिकतर जनता गाँवों में ही बस्ती थी..आज की तरह उस दौर में भी बाज़ारें और मंडियां शहरों में भी होती थी..उस तरह बाज़ारों की झलक आजकल के गाँवों में आज भी देखी जा सकती है..शहरों में दुकानें बहुत ही नजदीक हुआ करती थीं और इन दुकानों में सोना-चांदी, खाने के मशाले, घरेलू सामान, और इत्र आदि बेचे जाते थे..मशीनों के आभाव में उस दौर में कला और नक्काशी से जुड़े काम कारीगर अपने हाथो से किया करते थे ये, कारीगर अपने काम में माहिर हुआ करते थे इनके द्वारा की गई कारीगरी अत्यंत ही गहन और सुन्दर हुआ करती थी..उस वक्त जनसँख्या सिर्फ केवल 3-4 करोड़ हुआ करती थी, अतः 10% (प्रतिशत) लोग ही शहरों में रहते थे बांकी 90% (प्रतिशत) लोग गाँवों में रहा करते थे..उस दौर में जातिवाद अपने चरम पर था..हर गाँव में अलग-अलग तालाबों को जात के आधार पर सुनिश्चित किया हुआ था और व्यक्ति अपनी जाति अनुसार ही काम किया करता था..गाँव में रहने वाले किसानो को पानी के लिए पूरी तरह बरसात पर निर्भर रहना होता था..उस दौर में मुद्रा का प्रचलन तो था लेकिन फिर भी अधिकतर व्यापार वस्तु विनिमय में ही होता था, यानी सामान के बदले सामान ले देकर जैसे चावल के बदले गेहूं और गेहूं के बदले शक्कर..आज के समय घर सीमेंट, लोहे और ईंटों से बनते है जिनकी उम्र 50-100 साल ही होती है लेकिन तब के घर मिटटी, पत्थर, चुने और गुड़ आदि सामग्रियों से तैयार किये जाते थे जो इतने मजबूत होते थे जिसके कारण उनकी उम्र हज़ारों साल होती थी..उस काल की कारीगरी, इंजीनियरिंग और तकनीक इतनी शानदार थी कि तब के समय की कुछ हवेलियां और मंदिर आज भी देखे जा सकते हैं..उस समय के राज्य का प्रशासन का सारा जिम्मा राजा पर ही होता था, राजा ही दरबार में बैठकर नियम बनवाता और उन्हें लागू करना सुनिश्चित करता था..किसी भी विवाद के समय राजा ही न्यायधीश की भूमिका निभाता हालांकि आमतौर पर राजा सिर्फ बड़े मुक़दमों को ही सुना करता था और छोटे छोटे मामले गाँव की पंचायत में जाते थे, जहाँ पंच नयायधीश का कार्य करते..उस काल में धर्म और परम्पराओं को बहुत ही ज्यादा महत्व दिया जाता था और ज्यादातर विवाह सामाजिक रीति-रिवाज़ अनुसार पारिवारिक लोग आपसी सहमति (अरेंज मैरिज) द्वारा ही करते थे..जिसमे वर-वधु एक ही जाति के होते थे लेकिन उनके गाँव व गौत्र अलग-अलग हुआ करते थे, उस काल की शादियां भी बहुत खर्चीली हुआ करतीं थी..हालाँकि उस दौर के लोग जितना धर्म पर ध्यान देते थे उतना शिक्षा को ज्यादा महत्व नहीं देते थे, शिक्षा केवल एक खास वर्ग तक ही सीमित थी बांकी एक बहुत ही बड़े वर्ग को शिक्षा से वंचित रखा जाता था..उस दौर की साक्षरता दर कम होने के बावजूद भी भारतीय शिक्षा प्रणाली दुनियां की सबसे अच्छी शिक्षा प्रणाली मानी जाती थी..इसी वजह से कई विदेशी विद्यार्थी भारत शिक्षा ग्रहण करने आते थे इंडियन एस्ट्रॉनॉमी एनाटॉमी, बॉटनी और वेद जैसे विषय पढ़ते थे..10वीं शताब्दी का दौर भारत के लिए सुनहरा तो था लेकिन निराशा से भरा हुआ था..!
चूँकि उसी कालखंड के दौरान भारत ने नई परम्पराओं कि ओर मुड़ना शुरू कर दिया और अगले 650 वर्षों तक इस्लामी धर्म और परम्पराओं ने भी अपनी जड़ें गहरी कर ली थीं..भारतीय राजाओं के राज्य का ऐसा कोई मैदान ना बचा था जहाँ छोटे-बड़े युद्ध अपने अपने समय पर लगातार होते रहे, इसके बावजूद हिन्दू-मुस्लिम समाज के आम जन में एक अध्भुत मिलन और एकता देखने को मिलती रही..तब ईद केवल मुसलमानो तक का पर्व नहीं होता था वह हर भारतियों का पर्व होता था, ठीक वैसे ही होली-दीवाली भी केवल हिन्दुओं तक ही सीमित नहीं थी उस पर्व में मुसलमान भी अपनी भागेदारी खूब निभाते थे और बढ़चढ़कर हिन्दुओं के पर्वों में शिरकत करते थे..व्यापारिक रिश्ते व संबंधों में मधुरता थी आपसी समझदारी बनी हुई थी..विवाद केवल राजाओं की रियासतों तथा उच्च कुल के शिक्षित हिन्दू वर्ग के खास लोगों में सत्ता की भागेदारी की हिस्सेदारी को लेकर रहा करता था जिसे मुस्लिम शासक विवेक का परिचय देते हुए अपनी उदार शर्तों के आधार पर स्थिति को अपने अनुकूल बना लेते थे..ओरंगजेब के काल के उस अपवाद जिसमे बलपूर्वक धर्मांतरण करवाया गया था उस अपवाद को छोड़ दें तो देखने में आया है कि इस्लाम ने धर्मांतरण को लेकर हिंदुंओ को यह अधिकार दे रखा था कि यह हिन्दुओं पर निर्भर करता है, कि वह किस धर्म में रहना चाहते हैं..यदि हम बाबर-हुमायूँ और गुलाम वंश के शेरशाह सूरी को समझें तो वो अक्सर युद्ध में ही व्यवस्थ रहे और उनका कार्येकाल भी बहुत लम्बा ना चला था लेकिन अकबर ने हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे में सौहार्द की मिसाल बनाई थी बल्कि वैवाहिक संबंधों को भी बल दिया था..अकबर ने ऐसे कई उदार नियम बनाये जिससे हिन्दू-मुस्लिम समाज के मध्य सभी तरह के रिश्तों में सध्भावनाओं की प्रगाढ़ता पनपी थी..लेकिन इतिहासकार इस देश को अपने-अपने ढंग से कई कालखंडों को देखते आएं हैं सबने अपने-अपने दृष्टिकोणों से इतिहास की व्याख्याएं की हैं..इन्ही में से एक कालखंड वह था जब फिरंगियों (अंग्रेज) ने भारत में आकर अपना कब्ज़ा कर लिया और यहाँ अगले 200 वर्षों तक अपना राज चलाया…
*धारावाहिक लेख जारी है*
(लेखक- राजनीतिक व सामाजिक चिंतक है)