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*विज्ञापनों के कागजी घोड़े?*

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शशिकांत गुप्ते

Minimum Government, Maximum Governance’
न्यूनतम सरकार,अधिकतम शासन।
यह स्लोगन सिर्फ सुनने और पढ़ने में लोकतांत्रिक लगता है।
लोकतंत्र का स्मरण होते ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की याद आ जाती है।
इन दिनों चौथे स्तंभ पर सत्ता की गोदी में बैठ कर सत्ता का ही गुणगान करने का आरोप है,जो सिद्ध होना मुश्किल ही नहीं ना मुमकिन है।
बहरहाल मुद्दा है,न्यूनतम सरकार अधिकतम शासन। लेकिन वास्तव में हो रहा है,न्यूनतम कार्य अधितकम विज्ञापन।
प्रतिदिन विशालकाय विज्ञापनों में सारी उपलब्धियां दर्शाई जा रही हैं। विज्ञापनों में दर्शाई उपलब्धियों को देख, पढ़ और सुन कर,तो सच में लगता है, पिछले सत्तर वर्षो में जो कुछ हुआ नहीं,वह सब, अब हो रहा है।
यह स्लोगन भी सौ फीसदी सत्य प्रतीत होता है ,………है तो ही मुमकिन है
विज्ञापनों पर होने वाले आर्थिक व्यय को देख कर तो देश की आर्थिक स्थिति की सुदृढ़ता पर विरोधियों का कटाक्ष बेमानी सा लगता है?
इतना ही लिख पाया था कि यकायक मेरे व्यंग्यकार मित्र सीतारामजी का आगमन हुआ।
सीताराम जी ने कहा विज्ञापनों की जगह कागजी घोड़े लिख दो।
इन दिनों सर्वत्र कागजी घोड़े ही दौड़ाए जा रहे हैं। कागजी घोड़ों को दौडाने के लिए जनता के रूपयों से विज्ञापन रूपी रिमोट में वादों को बैटरी डाल कर,उसे दावे के बटन को दबा कर चलाया जाता है। जितने ही थोथे वादें होते हैं,उतनी ही तेज गति से कागजी घोड़े दौड़ाए जातें हैं।
कागजी घोड़ों की दौड़ के लिए,न्यूनतम सरकार,अधिकतम शासन रूपी स्लोगन का race-course, ground, कागजी घुड़ दौड़ का मैदान बना रखा हैं।
कागजी घोड़ों को दौड़ने में हम सब एक हैं। कोई किसी से कम नहीं है।
लोकतंत्र की परिभाषा ही इस तरह परिभाषित की जा रही है,जनता के लिए जनता के पैसों का,जनता के बगैर अनुमति के बेतहाशा खर्च करना।
अंत में यही कहना है जो कुछ शायर दुष्यंत कुमार ने अपने शेर में कहा है।
अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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