सनत जैन
देश के राजनीतिक गलियारों में इन दिनों सबसे चौंकाने वाली चर्चा, पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की कथित ‘गुमशुदगी’ को लेकर है। विपक्ष ने अब धनखड के जरिए सरकार को घेरने और निशाना साधने की तैयारी कर ली है। बीते दिनों सपा से राज्यसभा सांसद एवं वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने एक बयान देकर सरकार को घेरने के लिए नया दांव चल दिया है। सिब्बल ने आरोप लगाया है, पूर्व उप राष्ट्रपति धनखड़ इस्तीफा देने के बाद से सार्वजनिक रूप से उनका कोई भी वजूद दिखाई नहीं दे रहा है। उनका फोन नहीं लग रहा, उनके परिवार की ओर से भी कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आ रही। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई, तो वह कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल कर सकते हैं। इस प्रकार कपिल सिब्बल अदालत के माध्यम से धनखड़ को सामने लाने की रणनीति अपना सकते हैं।
कपिल सिब्बल के इस बयान के बाद सरकार को या तो जगदीप धनखड़ के बारे में जानकारी देनी होगी। यदि कोई उनसे संपर्क नहीं कर पा रहा है, जिसके लिए सिब्बल हेवियस कॉरपस के माध्यम से उन्हें देश के सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं रह गया है। कपिल सिब्बल का बयान सतही तौर पर नरम लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद सख्त था। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह पर सीधा निशाना साधते हुए कहा, जब सरकार बांग्लादेशी घुसपैठियों को ढूंढ सकती है, तब देश के पूर्व उपराष्ट्रपति का पता क्यों नहीं लगा पा रही है? जगदीप धनखड़ इस्तीफा देने के बाद से चुप क्यों हैं। क्या सरकार ने उन्हें हाउस अरेस्ट कर रखा है।
क्या उनसे जबरदस्ती इस्तीफा लिखवाया गया है। सरकार जल्दबाजी में उपराष्ट्रपति का चुनाव क्यों करा रही है? इस तरह के कई सवाल देशभर में उठने लगे हैं। यह सवाल अपने आप में संकेत है, मामला सिर्फ बीमारी या निजी कारणों तक सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक दबाव या साजिश का हिस्सा हो सकता है। सिब्बल ने अपने बयान में विदेशी उदाहरण भी दिया। जैसे चीन या अन्य देशों में नेताओं का अचानक लापता हो जाना, साधारण घटना मान ली जाती है। वह कहां चले गए इसका पता किसी को नहीं लगता है। ऐसा ही कुछ धनकड़ साहब के साथ तो नहीं हुआ? ऐसी आशंका व्यक्त करके उन्होंने एक राजनीतिक तूफान खड़ा करने की कोशिश की, उनका यह बयान इसी रूप में देखा जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र में इस तरह के बयान असामान्य और चिंताजनक हैं।
सिब्बल ने यह भी संकेत दिया, धनखड़ को संभवतः जानबूझकर अलग-थलग करके रखा गया है। इस्तीफे के बाद कोई भी उनसे संपर्क स्थापित नहीं कर पा रहा है। नाही सरकार उनके बारे में बोलने के लिए तैयार है। धनखड का अचानक सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह गायब हो जाना कई सवाल खड़े कर रहा है। अगर वह बीमार हैं, तो उनकी स्थिति पर आधिकारिक जानकारी सरकार और उनके परिवार द्वारा क्यों नहीं दी जा रही? इसी बीच पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का एक वीडियो सामने आया है। जिसमें उन्होंने अपने ऊपर हुए कथित उत्पीड़न का जिक्र करते हुए कहा है, ईमानदार नेताओं को अब सरकार द्वारा फंसाया जा रहा है। राम मनोहर लोहिया अस्पताल में जिस तरह से उनकी मृत्यु हुई है।
सरकार ने उनके इलाज और अंतिम संस्कार में जिस तरह की उपेक्षा की है। यह बयान कहीं न कहीं सिब्ब्ल द्वारा जो आशंका व्यक्त की गई है, उसको मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। सत्ता से असहमति रखने वाले या अप्रिय हो चुके नेता दबाव और अलगाव की नीति के शिकार होने की ओर इशारा करता है। यह मामला, अब महज़ व्यक्तिगत स्वास्थ्य या निजी गोपनीयता का नहीं रहा। यह सवाल लोकतांत्रिक पारदर्शिता, संवैधानिक पदों की गरिमा और राजनीतिक एवं निजी स्वतंत्रता से जोड़ने की कोशिश विपक्ष कर रहा है।
अगर पूर्व उपराष्ट्रपति जैसी ऊंची संवैधानिक हैसियत रखने वाले व्यक्ति को लेकर इस तरह के सवाल उठ रहे हैं तो फिर आम आदमी के बारे में कल्पना करना ही व्यर्थ है। कपिल सिब्बल ने धनखड को लेकर जो कहा है, वह आगे चलकर सरकार की मुसीबतें बढ़ा सकता है। सरकार को चाहिए, वह पूर्व राष्ट्रपति जगदीप धनखड को लेकर आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक करे। कपिल सिब्बल की हेबियस कॉर्पस की चेतावनी राजनीतिक भूचाल ला सकती है। सरकार को इसे गंभीरता से लेना होगा। जगदीप धनखड़ सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य भी हैं। उनका पेशेवर और राजनीतिक कैरियर है।
जब सरकार चुनाव आयोग और वोट चोरी जैसे आरोपों से घिरी हो, ऐसे समय पर सरकार को कपिल सिब्बल के इस बयान को गंभीरता से लेना होगा। अन्यथा एक नया मोर्चा सरकार के खिलाफ खुलने जा रहा है। विपक्ष इस समय बहुत आक्रामक है। विपक्ष अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहा है। कुछ ऐसी ही स्थिति अब सरकार की भी बनने लगी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा की लोकप्रियता में लगातार गिरावट देखी जा रही है। सरकार को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कई मोर्चों पर एक साथ लड़ना पड़ रहा है। यह मुद्दा सिर्फ धनखड या न्यायालय तक सीमित नहीं रहेगा।
विपक्षी दल इस बात को समझ चुके हैं। विपक्षी दलों को अब न्यायपालिका में विश्वास नहीं रहा। न्यायालय जाने से उन्हें न्याय मिलेगा? विपक्षी दलों को संदेह था कि न्यायपालिका सरकार के दबाव में काम करती है। अब वह विश्वास में बदल चुका है। न्यायालय सरकार के दबाव में सरकार का बचाव करते हुए नजर आते हैं। ऐसी स्थिति में विपक्षी दलों ने अब जनता की अदालत में लड़ाई लड़ने का मन बना लिया है। न्यायपालिका की आड़ में अभी तक सरकार हर मामले में बच जाती थी। भविष्य में शायद सरकार के लिए यह संभव नहीं रहेगा।
न्यायपालिका के प्रति वह विश्वास आम जनता के मन में नहीं रहा जो, पहले होता था। चुनाव आयोग के मामले में जिस तरह की नूरा कुश्ती सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और सरकार के बीच में देखने को मिल रही है।
न्यायपालिका में तारीख पर तारीख देकर मामलों को किस तरह से लटकाया जाता है। उसके बाद विपक्ष ने यह मान लिया है, उसे संविधान के चौथे स्तंभ आम जनता की अदालत में जाने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं रह गया है। विपक्ष लगातार इसी तरह की बात कर रहा है। जो सरकार के लिए आगे चलकर बड़ी मुसीबत बन सकता है। कुछ ऐसी ही स्थिति 1975 में देश में देखने को मिली थी। 50 साल बाद एक बार फिर वही स्थिति बनती हुई दिख रही है। आगे क्या होगा इसका भगवान ही मालिक है।

