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आखिर क्या है योगसिद्धि

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डॉ. विकास मानव

     अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) को गहराई से पढ़ने समझने के दौरान कई जिज्ञासाओं ने घेर लिया. एक मुद्रा होती है जिसे खेचरी मुद्रा कहते हैं. उसकी फलश्रुति में किसी पीयूष के स्राव का वर्णन आया।

       इसके अध्ययन ने मेरा ध्यान विशेष आकर्षित किया और नए तरीके से योग सिद्धि को समझने में लग गया, मेरा उद्देश्य केवल उसकी वैज्ञानिकता को समझना था न कि कोई योग सिद्धि करना।

        इसके बाद मैंने अष्टांग योग के एक एक अंग की फलश्रुति को वैज्ञानिक खांचे में बिठाने का चिंतन प्रारंभ किया। प्रयास सफल भी रहा, मुझे योग दर्शन की वैज्ञानिकता थोड़ी थोड़ी समझ आने लगी।

     हठप्रदीपिका, घेरण्ड संहिता, योग दर्शन और साथ में चिकित्सा विज्ञान के विषय जैसे Anatomy, Physiology, आयुर्वेद के दोष, धातु और मल सिद्धांत आदि के सम्मिलित ज्ञान से ऐसे कई निष्कर्ष निकालने में सफलता मिली जो मुझे आपको चमत्कारिक लगेंगे पर वो चमत्कार कहें या विज्ञान, योग और अन्य विधियों से संभव होने में मुझे कोई शंका नहीं।

 अब समझते हैं आख़िर योग सिद्धि है क्या ? 

      मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों ( आँख, नाक, कान, त्वचा, जिव्हा) की अपनी सीमा होती है जैसे आप सूक्ष्म जीव नहीं देख सकते. आप दूर स्तिथ किसी वस्तु को नहीं देख सकते.

       मनुष्य एक विशेष Frequency की Sound Waves ही सुन सकता है, सूर्य के प्रकाश में आने वाले  केवल Visible Spectrum को ही देख सकता है. एक Threshold गंध का ही ज्ञान कर सकता है परंतु आप योग सिद्धि से अपनी समस्त ज्ञान इंद्रियों की शक्ति को इतना सूक्ष्म और इतना विस्तृत कर सकते है की सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु का दर्शन संभव है और दूर स्तिथ किसी पिंड जैसे ग्रह -उपग्रह आदि को भी आप बिना किसी यंत्र के देख सकते हैं.

      बिना टेलिस्कोप के पुराने ग्रन्थों में नव ग्रह आदि का वर्णन मेरी इस बात की पुष्टि करता है। योग सिद्धि से सूक्ष्म से सूक्ष्म ध्वनियों को आप सुन सकते हैं। हर प्रकार का प्रकाश आपको दिखने लग जाता है चाहें वो Visible specturm में आता हो या Invisible में।

     हर प्रकार की गंध का ज्ञान जिसे वैज्ञानिक गंधहीन कह देते हैं जैसे उदाहरण के लिए कार्बन मोनोऑक्साइड आदि गैसों को भी आप सूंघ सकते हैं मतलब ऐसे पदार्थ जो दूसरों के लिए गंधहीन हैं आपके लिए गंधयुक्त हो जाते हैं.

      वस्तुतः हर पदार्थ की अपनी एक विशिष्ठ गंध होती है, प्रत्येक पदार्थ क्या प्रत्येक रंग तक कि अपनी गंध होती है। आपने आजकल टीवी पर ऐसा देखा होगा कि कुछ बच्चों ने आंखों पर पट्टी बांध कर केवल सूँघ कर के ही किसी के कपड़ो का रंग बता दिया– ये सब संभव है योग सिद्धि से।

      जिन वस्तुओं का स्वाद भी नहीं आता उन वस्तुओं का स्वाद आने लगेगा। त्वचा आपकी इतनी संवेदनशील होना संभव है कि आपकी त्वचा पर किसी की परछाई पड़ने के बाद भी आप उस व्यक्ति का नाम बता सकते हैं।

तो जिसे लोग चमत्कार कहते है दरसअल वो भी एक विज्ञान है परंतु इस विज्ञान को जानने समझने के प्रकिया थोड़ी जटिल है इसलिए हम उसे शक्ति के रूप में मानने लग जाते हैं पर इनकी प्राप्ति के लिए न तो आपको किसी Lab की आवश्यकता न विश्वविद्यालय में अध्यन की बस आवश्यकता है तो अभ्यास और वैराग्य की।

      योग के प्रथम अंग का नाम है यम और दूसरे का नियम ये दोनों हमारी योग अभ्यास की प्रारंभिक अवस्था है जिसमें हम अपने शरीर का शोधन करके इस लायक बनाते हैं कि हम योग सिद्धि के मार्ग पर निर्बाध रूप से आगे बढ़ सके।

      तीसरा अंग है आसन। आसन के अभ्यास से योगी अपने शरीर को दृढ़ करते थे ऐसा शास्त्र में लिखा जबकि मैंने आसनसिद्धि का जो वैज्ञानिन अर्थ निकाला है वो है शरीर की अनैच्छिक क्रियाओं (Involuntary Actions) जैसे सांस लेना,हॄदय स्पंदन आदि ऐसी क्रियाएं जिन पर हमारी इच्छा या ब्रेन का कोई नियंत्रण नहीं उनको इच्छा के नियंत्रण में करना ही योग के तीसरे अंग आसन सिद्धि का लक्षण है.

       आसन के अभ्यास में एक योगी सबसे पहले अपनी Skeletal Muscles पर नियंत्रण प्राप्त करता है उसके बाद नियमित अभ्यास से वह अधिक सूक्ष्म से सूक्ष्म अंग और उसके बाद एक एक कोशिका आदि को भी अपने नियंत्रण में ले सकता है।

 कई योगी आज भी हिमालय की कंदराओं में -40 डिग्री के तापमान पर तप कर रहे हैं यह सब आसन के अभ्यास से ही संभव है।

      प्राणायाम प्रत्याहार धारणा ध्यान समाधि के बाद क्या होता इसका अनुमान भी आपकी  सीमा से बाहर है। मैं आगे इस पर भी लिखूंगा पर आप चाहे इसे विज्ञान कहो या चमत्कार इस स्तर तक पहुंचना कोई आम बात नहीं।

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