-निर्मल कुमार शर्मा,
यक्ष प्रश्न यह है कि हम मतलब एक अरब पैंतीस करोड़ भारतीय हर साल बुराई के प्रतीक हजारों-लाखों रावणों को जलाकर भी कथित बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न दशहरा खूब धूमधाम से मनाते हैं,तो अगले साल फिर से ये हजारों-लाखों रावण फिर से क्यों और कहाँ से पैदा हो जाते हैं ? कि उन्हें फिर से जलाने की जरूरत आ पड़ती है,ये हजारों सालों से बुराई का प्रतीक रावण जलकर नष्ट क्यों नहीं होते ! वे बुराई रूपी लाखों रावण बार-बार उठकर राम मतलब अच्छाई से भी बड़े क्यों हो जाते हैं ?क्योंकि हम हर साल कागज के नकली रावण जलाते हैं और असली रावण उसी समय खड़ा हुआ मन ही मन असली रावण की तरह अट्टहास करता हुआ कहता है बेवकूफ लोगों तुम जब तक कागज के नकली रावण जलाते रहोगे तब तक मेरे जैसे असली रावण का बाल बांका भी नहीं होगा। भ्रष्ट राजनेता,शराब,मांस के ठेकेदार,तमाम तिकड़मी मॉफिया,गरीबों के खून चूसनेवाले सूदखोर और पाखंडी,विलासी,बलात्कारी, पतित, कदाचारी,लोभी,ऐय्याश कथित धर्माचार्य,राज मठ और धन्नासेठों का नापाक गठजोड़ ही असली रावण है और हम लोग इनको बढ़ावा देते हैं तो बुराई कैसे कम हो इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किया ही जाना चाहिए। हर साल ये व्यर्थ के रावण जलाने रूपी नाटक से हमारा कुछ भी भला नहीं होने वाला,अपितु हमें अपने मन,वचन और कर्म से पवित्र और ईमानदार होना ही पड़ेगा ।
-निर्मल कुमार शर्मा,गाजियाबाद उ.प्र

