अजय असुर
छतीसगढ़ के बस्तर के सिलगेर में सीआरपीएफ द्वारा आदिवासियों के नरसंहार और अपने क्षेत्रों से कैंप हटाने को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे हैं। और सैनिकों द्वारा जब बर्बरता की इम्तेहा हो जाती है तब मजबूर होकर ये आदिवासी हथियार उठा लेता है। आप समझ सकते हैं जब ये आदिवासी बंदूक के सांये से बाहर निकलने की बात करता है तो इस व्यवस्था के हम-आप जैसे सभ्य लोगों को ये नागवार गुजरता है। अगर इस देश में कोई पूंजीवादी लूट के खिलाफ वास्तविक में संघर्ष कर रहा है तो आदिवासी समुदाय है।
यदि आपको विश्वास नहीं होता है तो आप उनके क्षेत्र में जाकर देख लें कैसे वो सीआरपीएफ व वर्दीधारी के सांये में जी रहें हैं। आखिर क्यों इस देश में सबसे ज्यादा सीआरपीएफ कैंप आदिवासियों के ही क्षेत्र में हैं? आदिवासी पुलिस कैंप हटाने के लिए आखिर आंदोलन क्यों कर रहे हैं? एक बात जान लें कोई भी आन्दोलन चाहे वो हिंसक हो या अहिंसक, अपनी मर्जी और प्यार से नहीं करते! जब उनके परेशानी की इम्तेहा हद से ज्यादा हो जाती है, और कोई रास्ता नहीं बचता उनके पास और आखिर में वो मजबूर हो जाता है, आन्दोलन करने को। आन्दोलन में सिवाय परेशानी, हम-आप जैसे सभ्य लोगो की गालियां और शासक वर्ग के सैनिकों की गोली और लाठियां। यही मिलता है आन्दोलन में…. तो आखिर ये सब कोई प्यार से तो लेना नहीं चाहेगा आन्दोलन करके।
लोग सैनिक का मतलब सिर्फ सेना समझते हैं जबकि हर सरकारी बंदूकधारी सेना होती है, चाहे वह पुलिस हो या अर्ध सैनिक बल या पूर्ण सेना, जब सरकार किसी इलाके की समस्या को बातचीत से हल करने की बजाय ताकत के दम पर उस इलाके के लोगों की मांग को दबाना चाहती है, तो सरकार उस इलाके में अपने सैनिक पुलिस- सेना और अर्धसैनिक के रूप में भेज देती है, इस तरह से किसी इलाके में सैनिकों की तैनाती अलग अलग समय के लिए हो सकती है, कभी कुछ दिनों के लिए किसी इलाके में सैनिक भेजे जा सकते हैं, या कभी कई बरस के लिए सैनिकों की तैनाती कर दी जाती है। जैसे छतीसगढ़ के बस्तर में आदिवासी इलाकों में। और इन इलाकों में यंहा तक कि गांधीवादी सोशल एक्टिविस्ट और पत्रकार भी नहीं जा सकते। ये सैनिक उनको अन्दर जाने से रोकते हैं और ऐसा ब्यहार करते हैं जैसे वो कोई आतंकवादी हो। इतनी सुरक्षा तो चीन और पाकिस्तान के बार्डरो पर भी नहीं होती। आखिर क्यूँ?
इसी तरह से भारत के कई इलाकों जैसे कश्मीर, पूर्वोत्तर के राज्यों और अब आदिवासी इलाकों में कई सालों से सैनिकों की तैनाती की गयी है और लगातार सैनिकों की संख्या बढ़ाई जा रही है, जब किसी इलाके में सैनिकों की तैनाती की जाती है तो उस इलाके में नई समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। उदाहरण के लिए जंगल महल में टाटा, बिड़ला, अडानी, अम्बानी, डालमिया, जिंदल आदि जैसे पूंजीपतियों के लिए सेज (SEZ) यानि Special Economic Zone अर्थात विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाना था तो वहाँ सीआरपीएफ को तैनात करना शुरू कर दिया। ताकी बिना किसी परेशानी के जमीनों पर कब्जा कर इन पूंजीपतियों को दिया जा सके और इसी जमीन के लिए सैनिकों और गाँव वालों के बीच संघर्ष शुरू हो जाता है।
और इस संघर्ष के दौरान ग्रामीणों की पिटायी, हत्या और उनके परिवार के बहू-बेटियों के साथ बलात्कार, अपहरण शुरू होता है इन शासक वर्ग के सैनिकों के द्वारा और बर्बरता के खिलाफ जो इसके विरोध में आवाज उठाता है प्रशासन उसको और उसके परिवार को मारती-पीटती और अन्त में जेल में डाल देती है और वंहा के ग्रामीणों पर पर ऐसा हमला किया जाता है जैसा किसी दुश्मन देश पर किया जाता है, यानी एक शांत इलाके में अगर आप सैनिकों को रख देंगे तो निश्चित एक साल में ही वह इलाका अशांत हो जाएगा।
सबसे पहले तो ज़मीन का संघर्ष शुरू होता है, और जब किसान अपनी ज़मीन देना नहीं चाहते तो सैनिकों के द्वारा जबरदस्ती ज़मीन पर कब्ज़ा किया जाता है, और फिर उस इलाके के प्राकृतिक संसाधनो पर लड़ाई शुरू हो जाती है, ग्रामीणों और शासन-प्रशासन के बीच। अगर नहाने-धोने का भी कोई तालाब है, जिस पर गाँव वाले नहाते धोते हैं तो उस तालाब पर सैनिक कब्ज़ा कर लेते हैं, यदि वहाँ जंगल है तो सैनिक वहाँ से बड़ी मात्रा में लकडियाँ लाते हैं उससे गाँव वालों के लिए लकडियाँ मिलना मुश्किल हो जाता है। अक्सर सेना के अधिकारी जंगल से कीमती लकड़ी कटवा कर फर्नीचर बनवा कर अपने घर भेजवा देते हैं, कश्मीर और बस्तर में ऐसे बहुत सारे मामले हैं। और कंही-कंही कोई-कोई अफसर इन कीमती लकड़ियों की भ्रष्टाचार कर तस्करी भी करते हैं। और असली खेल तो इन प्राकृतिक खाड्डान से कच्चे माल के खनन का है जो इन जंगलो में खोदकर अमेरिका, चीन, जापान, बिर्टेन आदि देशों को बेंचकर अपना जेब भर रहें हैं। इसी खेल को छुपाने के लिए ये सैनिक तैनात किए जाते हैं। इसी कारण इन जंगलो में किसी को जाने नहीं देते हैं और यदि इजाजत भी देते हैं तो वंही तक देते हैं जन्हा तक इन खेलों पर पर्दा पड़ा रहा रहे।
सैनिक अपनी सुरक्षा के लिए भी जंगल साफ़ कर देते हैं, यही सारा खेल छत्तीसगढ़ के बीजापुर में चल रहा है। सैनिकों के कारण उस इलाके में वेश्यावृत्ति बढ़ जाती है। स्थानीय प्रशासन के ऊपर सैनिक अफसर हावी हो जाते हैं वे जिस काम को मना कर देते हैं वह नहीं किया जाता। सैनिकों द्वारा आसपास के नागरिकों को अपना शत्रु समझा जाता है क्योंकि सैनिकों द्वारा किये जा रहे भ्रष्टाचार और अनैतिक कार्य का विरोध करते हैं। और इन प्राकृतिक खाड्डानों के खुदाई का भी विरोध करते हैं क्योंकि ये ग्रामीण जंगल और खनिज पदार्थ पर अपना हक मानते हैं और इसी विरोध के कारण सैनिकों द्वारा उस इलाके में नागरिकों के घरों में घुस कर तलाशी लेना लोगों की पिटाई करना गोली मार देना बलात्कार करना जैसी घटनाएँ खूब होने लगती हैं। अभी सुप्रीम कोर्ट के सामने मणिपुर के बारह सौ ऐसी मृत्य के मामले लाये गए जिन्हें सेना द्वारा मारा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने उनमे से छह मामलों की जांच करवाई गई, वह छहों मामले फर्जी मुठभेड़ के पाए गए।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाँ इन सभी मामलों की जांच की ज़रूरत तो है, लेकिन भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि ऐसा आदेश मत दीजिये इससे सैनिकों के मनोंबल पर असर पड़ेगा। उसके बाद से इस मामले पर कोई अंतिम फैसला नहीं आया और सुप्रीम कोर्ट ने भी आंखे मूंद लिया। इसके अलावा उस इलाके में कोई भी लोकतान्त्रिक गतिविधि करना भी असम्भव हो जाता है। बस्तर में जब भी आदिवासी अपनी ज़मीन बचाने के लिए या अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के बारे में कोई सभा या रैली करना चाहते हैं। अर्ध सैनिक बलों के सैनिक उन्हें गाँव में ही रोक देते हैं। इस पर आदिवासियों के विरोध पर उन्हे नक्सली/मावोवादी कहकर उन पर जमकर बर्बरता पूर्वक दमन किया जाता है।ये सारी घटनाओ की जानकारी यदि कंही से भी हम तक पहुंच भी जाए तो नक्सली/मावोवादी करार दिए जाने पर हमें भी ये सारी घटनाए जानकर हम भी विद्रोह ना करें। इसके अलावा एक ही इलाके में पुलिस और अर्ध सैनिक बल एक साथ मौजूद होते हैं तो उनमें आपस में अंदरूनी झगड़ा और कमाई पर कब्जे की लड़ाई होती है। और पुलिस बाहर से आये हुए अन्य अर्ध सैनिक बलों के सैनिकों को पसंद नहीं करती। सुकमा छत्तीसगढ़ में तो एक बार विशेष पुलिस अधिकारियों और सीआरपीएफ के बीच बाकायदा गोलीबारी और बमों का प्रयोग किया गया था। ऐसी घटनाओं को शासक वर्ग दबा देता है और इक्का-दुक्का खबर सोशल-मीडिया के माध्यम से मुट्ठी भर लोगों के पास ही पहुंच पाती है। और जो इस तरह की खबर देता भी है तो जल्द ही उसे भी यू ए पी ए जैसे काले कानून या नक्सली/मावोवादी का ठप्पा लगाकर जेल में डाल देते हैं।
इस विषय में सीबीआई द्वारा सुप्रीम कोर्ट में भी शिकायत भी की गयी थी, पर जब शासन-प्रशासन के इशारे पर ही सब कुछ हो रहा है तो कुछ भी होने की आशा करना बेमानी होगी। कई बार उस इलाके में लोगों को कानून में छूट देने के लिए रिश्वत लेने का काम भी सैनिक करते हैं। अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर तैनात अफसरों द्वारा रिश्वत लेकर बार्डर पार कराया जाता है। उस इलाके में तैनात सैन्य बलों द्वारा स्थानीय युवकों को अपना मुखबिर बनाया जाता है। अक्सर युवाओं को ऐसा काम करने के लिए डरा कर या धमकी देकर तैयार किया जाता है। अक्सर ऐसे युवा आन्दोलनकारियों और सैनिकों के बीच फंस जाते हैं और मारे जाते हैं। किसी भी इलाके के लोग अपने बीच में सैनिकों की उपस्थिति नहीं चाहते। यहाँ तक की सैनिक भी नागरिकों के साथ नहीं रहना चाहते। लेकिन सरकार उन्हें मजबूर करती है। सरकार हमेशा ताकतवर तबके के फायदे के लिए सैन्यवाद बढाती है, गरीब ग्रामीणों को सैनिकों की कोई ज़रूरत नहीं होती। आखिर इन आदिवासियों को सैनिकों से क्या काम? उल्टा इनके आने से ही सारी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं।
इन खबरों और लेख के स्रोत का आधार गांधीवादी कार्यकर्ता हिमांशु कुमार जी हैं।
*अजय असुर**राष्ट्रीय जनवादी मोर्चा उ. प्र.*

