चैतन्य भट्ट
महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक बार फिर चौंका दिया है। महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव में सफलता पाने वाली कांग्रेस, एनसीपी और शिवसेना उद्धव की महाविकास अघाड़ी धूल धूसरित हुई तो झारखंड में कड़ी टक्कर का अनुमान नकारकर इंडिया गठबंधन ने शानदार जीत हासिल की।
महाराष्ट्र में सत्ताधारी भाजपा, शिंदे शिवसेना और एनसीपी अजित पवार की महायुति ने दो तिहाई से अधिक सीटें हासिल कर प्रचंड जीत दर्ज की है। राजनीतिक विश्लेषक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यकर्ताओं की जी-तोड़ मेहनत और धार्मिक तथा जातीय ध्रुवीकरण जैसे कारणों के जो भी गुणा-भाग लगाएं, हर कोई मानता है कि इस जीत में अहम भूमिका एन चुनाव के पहले लागू महिलाओं के खाते में सीधे धन पहुंचाने वाली लाडली बहिन योजना की रही। महायुति ने इस योजना का जमकर प्रचार किया। विपक्ष न तो खुलकर इस योजना का समर्थन कर पाया और न विरोध। महाविकास आघाड़ी ने भी चुनाव जीतने पर महालक्ष्मी योजना के तहत हर महीने 3000 रुपये देने का वादा किया। मगर लगता है कि बहनों ने जो देगा के बजाय, जो दे रहा है उस पर विश्वास करना ज्यादा ठीक समझा।
झारखंड में हेमंत सोरेन की अगुआई वाले इंडिया गठबंधन ने भी लोकसभा चुनाव में कमजोर प्रदर्शन के बाद महिलाओं को हर महीने 1000 रुपये दिए जाने वाली मइया सम्मान योजना शुरू की। भाजपा ने गोगो दीदी योजना के तहत हर महीने 2100 रुपये देने का पांसा फेका। मगर यहां भी बहनों ने जो देगा के बजाय, जो दे रहा है उस पर विश्वास करना ज्यादा ठीक समझा। हेमंत सोरेन ने केंद्र सरकार द्वारा अपनी गिरफ्तारी को आदिवासी सम्मान से जोड़ कर मुद्दा जरूर गढ़ा मगर जानकार कहते हैं कि चुनावी जीत में अहम रोल मइया सम्मान योजना से लाभान्वित महिला वोटरों का ही रहा। कुल मिलाकर दोनों ही राज्यों की मौजूदा सरकारों ने महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाओं के दम पर सत्ता में बने रहने का दांव खेला और सफल रहीं।
दोनों ही राज्य सरकारों ने मासिक राशि 2500 रुपये किए जाने का वादा किया है। इन योजनाओं से लाभान्वित महिलाएं जिस तरह बढ़-चढ़ कर वोट कर रही हैं, सरकारों के लिए इन वादों से पीछे हटना आसान नहीं होगा। इसलिए मुफ़्त सौगातों की यह होड़ जल्द रुकने वाली नहीं है। शेष राज्यों में भी ऐसी योजनाएं शुरू करने का लालच रहेगा। बहरहाल सियासी फायदे और राजनीतिक गुणा-भाग अपनी जगह, इनके आर्थिक असर और साइड इफेक्ट्स पर भी बहस शुरू हो गई है। खिसियाए राजनीतिक दल यह कहते हैं कि ऐसी योजनाएं महिला सशक्तीकरण का रास्ता है। मगर यह पूछने पर कि सशक्तिकरण का यह फंडा चुनावों के टिकट बांटते समय याद क्यों नहीं आता, बगलें झांकने लगते हैं। वैसे भी आज के जमाने में पचास से सौ रुपए प्रतिदिन की दर से दी जा रही सहायता कितनी महिलाओं को सशक्त बना सकती है, शोध का विषय है। बहरहाल जब तक ऐसी योजनाएं वोटों की फसल में बदल रही हैं, बदलाव नामुमकिन है।
इस विषय पर दो जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है जिनमें कहा गया है कि चुनाव के दौरान मुफ़्त रेवड़ी योजनाओं को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 के तहत वोट के लिए प्रलोभन माना जावे और चुनाव आयोग को ऐसी बातें करने वाले दलों की मान्यता रद्द करनी चाहिए। बहरहाल चुनाव आयोग ने सुनवाई में कहा है कि बिना नियम बनाए कोई कार्यवाही करना आयोग की शक्तियों का दुरुपयोग होगा। इसलिए पहले कोर्ट तय करे कि फ्री योजनाएं क्या है और क्या नहीं ?
महाराष्ट्र इन योजनाओं पर अभी लगभग 47 हजार करोड़ रुपये का सालाना खर्च कर रहा है जिसके जल्द दोगुना होने की उम्मीद है। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में चल रही ऐसी योजनाओं का असर दिखने लगा है जहां सरकारों को विकासोन्मुख योजनाओं के लिए फंड जुटाने में परेशानी हो रही है। मध्य प्रदेश समेत अन्य राज्य इन योजनाओं के चलते बार-बार कर्ज लेने पर मजबूर हैं। विकास पर होने वाले खर्च में कटौती के साफ संकेत मिल रहे हैं जिसे देर तक टालना दीर्घकालिक हितों के खिलाफ है। देर सबेर इनके बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ने की चुनौती आएगी क्योंकि ऐसी योजनाओं से हटना आसान नहीं होता। 2019 आम चुनाव से पहले मोदी सरकार ने किसानों को 6 हजार रुपये प्रतिवर्ष देने की योजना की शुरू की थी जिसका फायदा भी प्रचंड बहुमत के रूप में मिला। अब भी चल रही इस योजना पर हर साल लगभग 75 हजार करोड़ खर्च हो रहे हैं। कोविड महामारी के बाद जारी केंद्र सरकार की मुफ्त राशन योजना महामारी बीतने के 2028 तक बढ़ा दी गई है। सैद्धांतिक तौर पर फ्री रेवड़ियों का विरोध करने वाले सभी दल अंततः इनकी शरण लेने पर मजबूर होते हैं।
आर्थिक प्रबंधन पर एक और दबाव ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली को लेकर भी है। सरकारी खजानों का एक बड़ा भाग वेतन और पेंशन पर व्यय होता है और कई राज्यों में तो यह कुल बजट के आधे से भी अधिक है। ऐसे में मुफ्त पैसा बांटने वाली इन योजनाओं और विकास पर किए जाने वाले खर्च का संतुलन सरकार के अपने व्यय में यथासंभव कमी और करों की चोरी रोककर राजस्व वृद्धि से ही संभव है। देखना होगा कि पतली रस्सी पर संतुलन बनाए रखने के इस खेल में सरकारें कहां तक सफल होती हैं। वरना तो कर वृद्धि के माध्यम से पहले से ही पिस रहे मध्यम वर्ग की कमर तोड़ने का चिर परिचित विकल्प ही उपलब्ध है।

