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अग्निपथ: मतलब देश को दंगों की आग में झोँकने की साजिश*

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*पिछली पोस्ट से आगे*

रजनीश भारती

अधिकांश नौजवान इस योजना के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। मगर शोषक वर्ग की साजिशों के खिलाफ नहीं बल्कि सेना में स्थाई रूप से शामिल होने के लिए। उन्हें लगता है कि सेना में शामिल होकर वे देश की सेवा कर सकते हैं। एक गंभीर भ्रम और साज़िश के शिकार होने के कारण वे यह नहीं महसूस कर पाते कि मंगल पाण्डे बनकर, मातादीन भंगी, या अश्फाक उल्ला खां या भगत सिंह बनकर ही देश की सच्चे अर्थों में सेवा की जा सकती है। इसलिए मौजूदा सेना के चरित्र को भी समझना नौजवानों के लिए जरूरी है।

सेना पुलिस किसकी रक्षा करती है?

जिस वर्ग के पास उत्पादन के संसाधनों का मालिकाना होता है, राजसत्ता भी उसी वर्ग की होती है, सेना, पुलिस, जेल, अदालत और नौकरशाही भी उसी वर्ग की होती है, और यह उसी वर्ग की रक्षा भी करती है। इनके द्वारा देश की रक्षा का दावा करना सिर्फ पाखण्ड होता है। एक भ्रम भी होता है।

हमारे देश के जवानों को बड़ा घमण्ड होता है कि वे देश की रक्षा करते हैं, वे रक्षा न करें तो देश गुलाम हो जाएगा। अब जरा सोचिए कि देश गुलाम हो जाता है तो क्या होता है?

कोई पूंजीवादी साम्राज्यवादी देश जब किसी कमजोर देश को गुलाम बनाता है तो वह निम्नलिखित चार चीजों के लिए ही गुलाम बनाता है-

1- सस्ती जमीन

2- सस्ता कच्चा माल

3- सस्ती श्रमशक्ति

4-प्रतियोगिता विहीन बाजार।

अंग्रेज आए थे तो इन्हीं चार चीजों के जरिए भारत की जनता का शोषण कर रहे थे। आज हमारे देश की सरकारें डंकल प्रस्ताव, उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण, एफडीआई, स्पेशल इकोनामिक जोनों, अनेकों असमान समझौतों के जरिए हमारे देश की सरकार खुद विदेशी पूंजी के लिए सस्ता कच्चा माल, सस्ती जमीन, सस्ती श्रमशक्ति और प्रतियोगिताविहीन बाजार मुहैया करा रही है। और यह सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही उसी सरकार की रक्षा कर रही है जो विदेशी पूंजी के हाथों में देश को गिरवीं रख रही है तथा लेमोआ, कामकासा, सिस्मोआ और बेका जैसे असमान सैन्य समझौते करके अपने देश को अमेरिकी साम्राज्यवाद के हवाले कर चुका है। अब आप बताएं कि भारतीय सेना भाड़े की सेना है या देशभक्त? और ये जेल, अदालत एवं नौकरशाही किसके लिए काम कर रही है?

देश के सार्वजनिक सेक्टरों को खुले आम बेचा जा रहा है और देश की जेल, अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही इन सम्पत्तियों को बचाने की बजाय इसका दाम निर्धारित करने और बोली लगाने में सरकार की मदद कर रही है। ये कैसी देशभक्ति है?

हमारे देश के जवानों को यह भी गर्व होता है कि वे देश के नागरिकों की रक्षा कर रहे हैं। मगर देश की जनता को धर्म के नाम पर आपस में लड़ा कर मरवाया जा रहा है। सेना-पुलिस किसकी रक्षा कर रही है? गाय, गोबर, गंगा के नाम पर दंगों का माहौल बनाकर हिन्दूओं का सैन्यीकरण और सेना-पुलिस का हिन्दूकरण कराया जा रहा है, बार-बार अल्पसंख्यकों को उकसाया जा रहा है, बुलडोजर के नाम पर भय, आतंक और अराजकता का माहौल खुद सरकारों द्वारा बनाया जा रहा है तथा जवानों को देशभक्त बनाने की बजाय हिन्दू भक्त बनाया जा रहा है, जिसका परिणाम होता है- भयानक मार-काट और विभाजन की ओर देश को ले जाना। क्या सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही इस तरह देश को बर्बाद होने से रोक रही है? 

मंहगाई बढ़ाकर देश के गरीब नागरिकों की हत्या हो रही है? बेरोजगारी बढ़ाकर देश के बेरोजगार छात्रों- नौजवानों की जिन्दगी बर्बाद की जा रही है, सूदखोरी के जरिए गरीब मेहनतकशों को कर्ज के जाल में फँसा कर बर्बाद किया जा रहा है। यह सब उसी कानून के दायरे में हो रहा है, जिसकी रक्षा करने का आप ने शपथ लिया है। अत: आप कानून के रखवाले बनकर इन अत्याचारों से जनता को बचा भी नहीं सकते, क्योंकि बचायेंगे तो कानून टूट जाएगा। जमाखोरी, मिलावटखोरी, अश्लीलता और भ्रष्टाचार के जरिए गरीब नागरिकों को अमीर लोग लूट रहे हैं, आप उनकी रक्षा कहाँ कर पा रहे हैं? दरअसल मँहगाई बढ़ने से पूँजीपतियों का मुनाफा बढ़ता है, बेरोजगारी बढ़ने से पूँजीपतियों को सस्ते मजदूर मिलते हैं, सूदखोरी से सूद के साथ-साथ मुनाफा भी बढ़ता है। तथा भ्रष्टाचार, जमाखोरी, मिलावटखोरी बढ़ने से भी पूँजीपतियों का अवैध मुनाफा बढ़ता जाता है। 

मँहगाई, बेरोजगारी, जमाखोरी, मिलावटखोरी, अश्लीलता और भ्रष्टाचार के जरिए मेहनतकश जनता को पूँजीपति वर्ग लूट रहा है। यह लूट लगातार बढ़ती जा रही है। जेल, अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही  सब के सब मिलकर इस लूट से जनता की रक्षा नहीं कर पा रही हैं, बल्कि इस लूट में जेल, अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही के लगभग सारे लोग शोषक वर्गों के साथ शामिल हैं। 

कौन है जो देश और देश की जनता को बचाने की कोशिश कर रहा है? सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही में कोई तो नहीं दिखता जो मंगल पाण्डे या मातीदीन भंगी बनने को तैयार हो। अगर कोई इन सवालों को उठाता भी है तो शासक वर्ग और उसकी मीडिया ऐसे लोगों को नक्सलवादी, उग्रवादी, अर्बन नक्सल आदि कहती है और  जेल, अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही के लोग ऐसे लोगों को मिटाने के लिए तुल जाते हैं।

इन तथ्यों से यह जाहिर होता है कि टाटा, बिड़ला अंबानी, अडानी जैसे बड़े पूँजीपतियों का कोई देश नहीं है, उनके लिए देश का मतलब बाजार है। बाजार से अधिक कुछ नहीं। जेल, अदालत, सेना, पुलिस, नौकरशाही के लोग देश की नहीं बल्कि इन्हीं शोषक वर्गों के हितों की रक्षा करते हैं। सेना-पुलिस के जवान शान्ति व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कभी अमीरों पर गोली नहीं चलाते, हमेशा जनता पर ही गोली चलाते हैं।

अब सवाल उठता है कि हमारे देश में जो सेना पुलिस जेल, अदालत, नौकरशाही काम कर रही है, यह जनता के विरुद्ध क्यों है? क्या यह शुरू से ही ऐसी ही है, इसका निर्माण किसने और क्यों किया था? इसके गठन का क्या उद्देश्य था? क्या यह सेना आज भी वही काम कर रही है या बदल गयी है?

यह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है। इस प्रश्न पर विचार करने से पहले यह समझना जरूरी है कि निजी सम्पत्ति के समाज में दो परस्पर विरोधी वर्ग (शोषक और शोषित) होते हैं, दोनों के हित एक दूसरे के विरुद्ध होते हैं। इसी लिए हमारे ना चाहते हुए भी अमीरों और गरीबों के बीच वर्ग संघर्ष होता रहता है। अमीर वर्ग अपने हितों की रक्षा के लिए  सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही का निर्माण करता है। यही उसकी राजसत्ता का वर्किंग स्ट्रक्चर होता है। इसके बल पर वह गरीबों के हितों का दमन करता है। इसका मतलब राजसत्ता पूरे समाज की नहीं होती। युग कोई भी रहा हो, राजसत्ता हमेशा वर्गों की ही हुआ करती है। प्राचीन काल में दास मालिक वर्ग अपने दासों के श्रम का शोषण करने के लिए सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही का निर्माण किया था। हजारों साल तक दास प्रथा रही है, इसके बाद सामंती वर्ग ने अपनी सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही का निर्माण करके दास मालिकों की राजसत्ता को परास्त किया। 

हजारों साल के सामंती शासन के बाद पूंजीपति वर्ग का उदय हुआ। पूँजीपतियों ने अपनी सेना, पुलिस, जेल, अदालत बनाकर सामन्ती राजाओं महाराजाओं को हरा कर अपनी राजसत्ता कायम किया।

हमारे देश में जो मौजूदा राजसत्ता है, अर्थात जो मौजूदा जेल, अदालत सेना, पुलिस और नौकरशाही है इसका निर्माण नेहरू, गांधी या कांग्रेस ने नहीं किया था। इसका निर्माण ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने किया था। अपने शुरुआती दौर में कम्पनी ने बादशाहों की अनुमति से कुछ चौकीदार रखे थे। फिर चौकीदारों की संख्या बढ़ाने की अनुमति प्राप्त करते रहे। कुछ चौकीदारों को हथियारबंद करने की भी अनुमति ले लिया। ज्यों-ज्यों पूँजी बढ़ती गई त्यों-त्यों हथियारों और चौकीदारों की संख्या बढ़ाते गए। आगे चलकर जेल, अदालत, पुलिस और सेना भी बनाते व बढ़ाते गए। शुरुआत में अपनी सेना के जरिए अपने राजाओं/बादशाहों की मदद किया। आगे चलकर इतना मजबूत हो गए कि एक एक करके सभी राजाओं को परास्त कर दिया। और पूरे भारत को गुलाम बना लिया। वही सेना,पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही आज भी बनी हुई है, जिसने भारत को गुलाम बनाया था। जिसने हमारे भगत सिंह को फांसी पर चढ़ाया, जिसने लाखों क्रान्तिकारियों का वध किया। 

इस सेना,पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही को परास्त करने के लिए नेहरू, गाँधी व कांग्रेस ने कोई अपनी सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही नहीं बनाई थी। एक संविधान बनाया वो भी अन्तिम वायसराय लार्ड माउंटबेटन की देख-रेख में बनाया, उसमें भी गवर्नमेंट आफ इण्डिया ऐक्ट 1935 में से 238 अनुच्छेद ज्यों का त्यों इस संविधान में रख दिया। अंग्रेजों के जमाने के लगभग सारे कानून आज भी लागू हैं।

अँग्रेजों के खिलाफ कांग्रेस ने नहीं, बल्कि भारत के क्रान्तिकारियों ने अपनी सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही का निर्माण कई बार किया। हर बार ब्रिटिश सेना पुलिस ने उनका दमन किया। मगर सबसे बड़े पैमाने पर 1857 के क्रान्तिकारियों ने किया था। बाद में चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह के साथियों ने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी बनाया। आगे चलकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द सरकार और आजाद हिन्द फौज बनायी। 1947 में हुए देश के बँटवारे को भारत की जनता की जीत बताया जा रहा है, यह झूठ है। भारत की जनता अँग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई उसी वक्त हार गई थी  जिस वक्त नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज हार गई। इसके बाद अँग्रेजों ने अपने चहेतों को सत्ता सौंप कर चले जाने का काम किया। और वही सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही, जिसका गठन अँग्रेजों ने भारत की जनता को गुलाम बनाए रखने के लिए किया था,  अभी तक बनी हुई है। इसका मूल चरित्र अब भी बदला नहीं है, यह अभी भी जनविरोधी बनी हुई है। हक इन्साफ मांगने वाली जनता पर ये सेना पुलिस आज भी लाठी-गोली, बम् आदि खतरनाक अस्त्र-शस्त्रों का बेरहमी से इस्तेमाल करती है।

बहुत लोग सोचते हैं कि सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही का पूरा अमला हम देशवासियों की भलाई के लिए है, मगर यह उन की भूल है। सेना, पुलिस, जेल, अदालत, नौकरशाही सबकी नहीं होती, वह किसी न किसी वर्ग की ही होती है। या तो वह अमीरों की होगी या गरीबों की।

जिनको अब भी समझ में न आया हो वे भूमिहीन व गरीब किसानों को जमीन दिलाने, बेरोजगारों को रोजगार दिलाने के लिए लुटेरे वर्गों के महलों, अट्टालिकाओ का घेराव कर के देख लें, पता चल जायेगा कि सेना पुलिस किसकी है। जो लोग झोपड़ियों में आतंकवादी खोज रहे हैं, उनकी आँख खुल जाएगी। तब सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता का वह अंश उन्हें सच होता दिखाई देगा-

“अट्टालिका नहीं है ये आतंक भवन”

*रजनीश भारती*

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