विश्वनाथ मंदिर बनवाने वाली अहिल्याबाई के जन्मदिन पर
गोपाल राठी – पिपरिया
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महारानी अहिल्याबाई होल्कर मल्हारराव होल्कर के पुत्र खंडेराव की पत्नी थीं। अहिल्याबाई किसी बड़े राज्य की रानी नहीं थीं, लेकिन अपने राज्य काल में उन्होंने जो कुछ किया वह आश्चर्यचकित करने वाला है। वह एक बहादुर योद्धा और कुशल तीरंदाज थीं। उन्होंने कई युद्धों में अपनी सेना का नेतृत्व किया और हाथी पर सवार होकर वीरता के साथ लड़ीं। लेकिन उनकी प्रसिद्धि वीरता के लिए नहीं रही l वे नर्मदा अनुरागी,, धर्मपरायण प्रजापालक परोपकारी और न्यायप्रिय रानी थी यही उनकी प्रसिद्धि का प्रमुख कारण था l प्रजा उन्हें रानी नहीं बल्कि आई ( माँ ) “मानती थी । अहिल्याबाई रानी होकर बहुत सादगी पूर्ण ढंग से जीती थी l सामंतवादी वैभव और शान शौकत से वे कोसों दूर थी l सफेद सूती साड़ी पहनती थी और जमीन पर सोती थी l राजकाज को ईश्वरीय आदेश मानकर चलाती थी l उस युग मे महिलाओं के प्रति होने वाले भेदभाव के खिलाफ थी l उन्होंने अपने राज में स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर होने के लिए स्त्री पुरुषों को प्रोत्साहित किया l रात दिन अपनी प्रजा की सुख और समृद्धि में संलग्न अहिल्याबाई शिव शम्भू को साक्षी मानकर अपने सभी निर्णय लेती थी l वे अपने राज्य में सभी धर्मों का सम्मान करती थी और बिना धार्मिक भेदभाव के न्याय करती थी l धर्मपरायण अहिल्याबाई के मन मे अपने राज्य को हिन्दू राज्य बनाने का कभी विचार ही नहीं आया l वे अपने निर्णय पर अडिग रहने वाली साहसी महिला थी l
शासन की बागडोर जब अहिल्याबाई ने अपने हाथ में ली, राज्य में बड़ी अशांति थी। चोर, डाकू आदि के उपद्रवों से लोग बहुत तंग थे। ऐसी हालत में उन्होंने देखा कि राजा का सबसे पहला कर्त्तव्य उपद्रव करने वालों को काबू में लाकर प्रजा को निर्भयता और शांति प्रदान करना है। उपद्रवों में भीलों का ख़ास हाथ था। उन्होंने दरबार किया और अपने सारे सरदारों और प्रजा का ध्यान इस ओर दिलाते हुए घोषणा की—’जो वीर पुरुष इन उपद्रवी लोगों को काबू में ले आवेगा, उसके साथ मैं अपनी लड़की मुक्ताबाई की शादी कर दूँगी।’ इस घोषणा को सुनकर यशवंतराव फणसे नामक एक युवक उठा और उसने बड़ी नम्रता से अहिल्याबाई से कहा कि वह यह काम कर सकता है। महारानी बहुत प्रसन्न हुई। यशवंतराव अपने काम में लग गये और बहुत थोड़े समय में उन्होंने सारे राज्य में शांति की स्थापना कर दी। महारानी ने बड़ी प्रसन्नता और बड़े समारोह के साथ मुक्ताबाई का विवाह यशवंतराव फणसे से कर दिया। इसके बाद अहिल्याबाई का ध्यान शासन के भीतरी सुधारों की तरफ गया। राज्य में शांति और सुरक्षा की स्थापना होते ही
व्यापार-व्यवसाय और कला-कौशल की बढ़ोत्तरी होने लगी और लोगों को ज्ञान की उपासना का अवसर भी मिलने लगा। नर्मदा के तीर पर महेश्वर उनकी राजधानी थी। वहाँ तरह-तरह के कारीगर आने लगे ओर शीघ्र ही वस्त्र-निर्माण का वह एक सुंदर केंद्र बन गया।
रानी अहिल्याबाई ने भारत के भिन्न-भिन्न भागों में अनेक मन्दिरों, धर्मशालाओं और अन्नसत्रों का निर्माण कराया था। कलकत्ता से बनारस तक की सड़क, बनारस में अन्नपूर्णा का मन्दिर , गया में विष्णु मन्दिर उनके बनवाये हुए हैं। इन्होंने घाट बँधवाए, कुओं और बावड़ियों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए, भूखों के लिए सदाब्रत (अन्नक्षेत्र ) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बिठलाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु की। उन्होंने अपने समय की हलचल में प्रमुख भाग लिया। रानी अहिल्याबाई ने इसके अलावा काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाए और धर्म शालाएं खुलवायीं।
महारानी अहिल्याबाई ने आगे आकर काशी में मंदिर-मस्जिद विवाद का समाधान कराया था l काशी की विद्वत परिषद तथा मस्जिद इंतजामिया समिति के बीच हुई आपसी सहमति से यह विवाद हमेशा हमेशा के लिए सुलझा लिया गया था l इस समाधान के तहत अहिल्याबाई ने 1777 में विश्व प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया l जो तब से लेकर आज तक करोड़ों लोगों की आस्था, पूजा , अर्चना का निर्विवाद केंद्र है l अहिल्याबाई होलकर के समय स्पष्ट सहमति बन गयी थी कि मंदिर में दर्शनार्थी किधर से जाएंगे और मस्जिद में नमाज अता करने के लिए किधर से जाएंगे।
अहिल्याबाई द्वारा आम सहमति से सुलझाए गए विवाद को आज फिर साम्प्रदायिक रंग देकर उभारा जा रहा है l इससे सिद्ध होता है कि मन्दिर मस्ज़िद का बखेड़ा करने वाले न धार्मिक है और न शिव भक्त l उनके लिए मन्दिर मस्ज़िद और शिव शम्भू राजनीति के मोहरे है जिसका वे राजनैतिक स्वार्थ के लिए उपयोग कर रहे है l
अहिल्याबाई द्वारा बनाई गई सहमति को तोड़कर आज फिर मस्ज़िद मन्दिर का विवाद पैदा करना उनका अपमान है l प्राण जाएं पर वचन न जाई जैसे आदर्श वाक्य को जीवन दर्शन मानने वाले हिन्दू समाज मे अपने वचन से मुकरना अक्षम्य पाप माना जाता है l
अहिल्याबाई होलकर को शत शत नमन
आपका का जन्म: 31 मई, 1725 एवं मृत्यु: 13 अगस्त, 1795 को हुई l (

