चंचल भू
एक कहावत है – “आसमान से गिरे , खजूर पर लटके “ । नेपाल जेल की जहमत से छूटा तो बनारस के बजाय दिल्ली आ गिरा , गोकि दिल्ली आना फ़ायदा कर गया । दिल्ली से प्रकाशित होने वाली , प्रमुख पत्रिका “ दिनमान “ ( संपादक रघुवीर सहाय ) के कवर पेज पर जगह मिली । अब बनारस लौटने और वहाँ खड़ी “ आफ़तों “ से उबरने की डगर सोचता रहा । लेकिन पहले दिल्ली से बनारस पहुँचने का जुगाड़ देखना था , वह भी हवाई जहाज से ।
पहले गया विदेश राज्य मंत्री समरेन्द्र कुंडू के आवास पर जिन्होंने हमे नेपाल से छुड़ा कर दिल्ली बुला लिया था ।
– समरेंद्र भाई ! आपके विभाग में कैसे कैसे घामड़ बैठे हैं , दूतावास का जो अधिकारी हमे नेपाल से लेकर दिल्ली के लिए चला था हम उससे बार बार कहते रहे , भाई हमे बनारस में ही उतार दीजिए , नहीं माना , बोला मंत्री जी का आदेश है आपको लेकर सीधे दिल्ली पहुंचना है , हम आपको बीच में नहीं उतार सकते । यहाँ दिल्ली तो आ गया अब बताइए बनारस कैसे जाऊँ ?
– दण्डवते जी ( मधु दण्डवते , तत्कालीन रेल मंत्री ) से मिल लो इंतज़ाम कर देंगे ।
– ट्रेन से नहीं जाऊँगा !
– क्यों ?
– आदत बिगड़ गई है , अब हम सरकार हैं
– हवाई जहाज से जाओगे ?
– जी !
– कौशिक जी ( पुरुषोत्तम कौशिक जानता सरकार में पर्यटन एवम् उड्डयन मंत्री ) से तुम्हारी पटती है , वो चाहें तो पूरी जहाज दे सकते हैं , एक टिकट की क्या औक़ात ! यह आइडिया हमे पसंद आ गया ।
हम सीधे कौशिक जी के यहाँ पहुँचे , कौशिक जी के सामने हमने हमने अपनी समस्या रखी ।
– चंचल ! हमारे पास यह पावर नहीं है
हमने कौशिक जी के ही फ़ोन से जार्ज ( जार्ज फ़र्नांडीस , तत्कालीन उद्योग मंत्री ) से बात की –
-जार्ज साहब कल हर हाल में हमे बनारस पहुंचना है , हमारी महिला मित्र का जन्मदिन है । कौशिक जी से एक टिकट माँग रहा हूँ , नहीं दे रहे हैं ।
– कौशिक को फ़ोन दो
और कौशिक जी से जो भी बात हुई हो सुनाई नहीं पड़ा । कौशिक जी मुस्कुराए । अपने स्टाफ से बोले कमलेश जी से बात कराओ । ( कमलेश जी हमलोगों से भली भांति परिचित थे , हिंदी के मशहूर कवि और लेखक थे , पूर्वोत्तर राज्यों के विशेषज्ञ थे जानता सरकार में कौशिक जी के सलाहकार थे । ) कमलेश जी आ गए । कौशिक जी ने हंसते हुए पूरी कथा सुनाये फिर बोले – कल चंचल जी की गर्लफ्रेंड का जन्मदिन है जार्ज ने कहा है इन्हें बनारस भेजना है , हम पैसा देते हैं हवाई जहाज का एक टिकट इन्हें मंगा दीजिए । इस तरह टिकट का इंतजाम हुआ । गो कि जन्मदिन बीते हफ्तों हो गया था । उसका जन्मदिन 23 अप्रैल को ही था ।
बहरहाल बनारस पहुँचा । सामान कुछ था नहीं ख़ाली हाथ नेपाल से चला था । सीधे विश्वविद्यालय पहुँचा और महिला मित्र के फ्लैट पर पहुँचा , दर्जनों झूठ गढ़ते हुए कि क्यों नहीं जन्मदिन पर नहीं पहुँच सका ? लेकिन इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ी । पहुँचते ही उसने गले से लगा लिया और अंग्रेज़ी में बोली – वेल डन डीयर ! छूटे कैसे वगैरह वगैरह । एक बाधा तो लाँघ गया । क्यों कि हमारे गिरफ़्तारी की ख़बर विश्वविद्यालय को हो चुकी थी । अब रह गया “ आज “ अख़बार का फंदा ! जिसके पैसे से नेपाल गया था , स्टोरी करने , वह तो “ सहाय जी ले गए “ । “हुँह! देखा जाएगा “। रात मालिक साहब की सोहबत में बितायी , कब नीद आई पता ही नहीं चला ।
सुबह अखबार के दफ़्तर पहुँचा । कबीर चौरा स्थित ज्ञान मंडल इमारत जिसने आज अख़बार का दफ़्तर था , जहाँ से “ अवकाश “ प्रकाशित होता था , जिसने हम मुलाज़मत कर रहे थे आज वह दफ्तर हमे कुछ दूसरे ही अंदाज़ से देख रहा था , लग रहा था भद्र जनों के बीच कोई लकड़बग्घा आ गया हो । उस समय तक आज का दफ़्तर निहायत ही अनुशासित था । हम अपनी सीट पर जाने के पहले कृपा शंकर ( वे भी अवकाश में थे ) के पास गए । उन्होंने धीरे से इशारा किया – भैया जी ( शार्दूल विक्रम गुप्त , अख़बार के मालिक ) से मिल लीजिए ।
– जल्दी क्या है बुलायेंगे , मिल लूँगा । इतने में शार्दूल विक्रम और भाई राम मोहन पाठक ( अवकाश के संपादक ) दोनों साथ साथ आए । शार्दूल का चेहरा तनाव में था । पहुंचते ही शार्दूल विक्रम ने कहा – इसे देखा ? और “ दिनमान “ का ताजा अंक सामने रख दिया । दो सतर का यह संवाद कई पर्त खोल रहा था ।
अनुशासन हीनता , पेमेंट अवकाश से , स्टोरी दिनमान को , लब्बे लुबाब यह निकल रहा था कि – चंचल यहाँ रहने के क़ाबिल नहीं है । शार्दूल ने आगे कुछ नहीं कहा चुपचाप खड़े रहे । हमने जेब से कागज निकाला और शार्दूल की तरफ़ बढ़ा दिया । शार्दूल चौंके –
– यह क्या है ?
– इस्तीफा !
– हमने यह तो नहीं कहा !
– यह हमारा फैसला है दो कारणों से एक इस अखबार का अनुशासन टूटा है , दूसरा हमने रिश्तों का निर्वहन ठीक से नहीं किया । हीन भावना के साथ हम यहां नहीं रह पायेंगे । आप दोनों हमारे मित्र हैं , साथ पढ़े हैं ( राम मोहन जी और शार्दूल जी दोनों हमारे साथ पत्रकारिता के छात्र रहे हैं ) अब दूर से ही ठीक रहेंगे । बाक़ी रही बात पैसे की उसे हमारी तनख़्वाह से काट लीजिए । अब इजाज़त दीजिए ।
कुछ देर तक पाठक जी और शार्दूल जी चुप रहे फिर शार्दूल जी हँसे – ऐसे नहीं , आइए दफ़्तर में बैठते हैं चाय पी कर जाइए ।
हम नीचे सीढ़ियों से उतर रहे थे आज की सीढ़िया कुछ ज़्यादा ही गुलगुल लग रही थी ।

