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सड़कों पर संघर्ष के लिए उतरें अखिलेश यादव

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उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण कर और कानून व्यवस्था के मुद्दे को लेकर भा ज पा ने जीत हासिल की

नया पंजाब बनाने के लिए आप को सौंपी पंजाब की कमान

ई वी एम के दुरुपयोग को लेकर राष्ट्रव्यापी आंदोलन की जरूरत

डॉ सुनीलम

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आ गए हैं। हालांकि यह लेख लिखे जाने तक उत्तर प्रदेश में तमाम जनपदों में समाजवादी पार्टी के जीते हुए उम्मीदवार प्रमाण पत्र लेने के लिए निर्वाचन अधिकारियों से जद्दोजहद कर रहे थे।
पंजाब में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक जीत हुई है जिसका अंदाजा किसी को नहीं था। एग्जिट पोल में भी जब यह बताया जा रहा था कि आम आदमी पार्टी जीतेगी, तब भी एकतरफा जीत पर हर किसी को विश्वास नहीं था। आम आदमी पार्टी की जीत जितनी आश्चर्यजनक है उतनी आश्चर्यजनक चरणजीत सिंह चन्नी की दोनों सीटों से हार, नवजोत सिद्धू , सुखबीर सिंह बादल की हार भी है। लेकिन इसका एक विश्लेषण यह हो सकता है कि पंजाब के मतदाताओं ने कांग्रेस और अकाली दल को पूरी तरह नकार दिया है तथा आम आदमी पार्टी से नया पंजाब बनाने की अपेक्षा की है।
उत्तराखंड में भाजपा की जीत तथा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और हरीश रावत की हार आश्चर्यजनक है। गोवा और मणिपुर में भाजपा की जीत इतनी आसानी से हो जाएगी यह भी नहीं सोचा गया था। लेकिन इसमें कांग्रेस से दल बदल कर भा ज पा में गए नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।
उत्तर प्रदेश में जब एग्जिट पोल में तीन एजेंसियों को छोड़कर सभी ने भाजपा को बंपर जीत का दावा किया था तब तमाम जानकारों ने सर्वे पर तमाम प्रश्न खड़े कर दिए थे।
उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजों से यह साफ है कि भाजपा, सरकार जरूर बना रही है लेकिन उसकी 51 सीटें कम हो गई है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने 47 सीटों से लंबी छलांग लगाकर 77 सीटें अधिक हासिल कर ली हैं।
सपा गठबंधन का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हारना किसी के भी गले नहीं उतर रहा है। मैंने उत्तर प्रदेश में 30 जनपदों में 100 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों का दौरा किया था। पूरे दौरे के दौरान मुझे कहीं भी भाजपा के पक्ष में लहर या धार्मिक ध्रुवीकरण नहीं दिखलाई पड़ा था। कोई पत्रकार या ऐसा व्यक्ति मुझे नहीं मिला जिसमें यह कहा हो कि भाजपा का ध्रुवीकरण करने का प्रयास सफल हो रहा है ,यदि ऐसा होता तो अयोध्या, मथुरा और हिजाब जैसे मुद्दों की चुनाव में गूंज सुनाई देती, जो सुनाई नहीं दी।
फिर क्या कारण हो सकता है जीत का ?
सपा गठबंधन की हार के कई कारण गिनाए जा रहे हैं। ई वी एम की गड़बड़ी, चुनाव आयोग तथा उत्तर प्रदेश के अफसरों द्वारा भा ज पा के एजेंट के तौर पर काम करना, भा ज पा का बेतहाशा खर्च, सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग आदि मुद्दें सपा गठबंधन की हार के कारण बतलाने वाला विश्लेषण नाकाफी लगता है।
हिंदुओं के दिमाग में यह विचार स्थापित कर देना कि भा ज पा के राज में ही हिंदू सुरक्षित है तथा योगी कानून व्यवस्था की स्थिति को दुरुस्त रख सकते हैं तथा गुंडागर्दी पर अंकुश लगा सकते हैं। जिसका तात्पर्य यह है कि मुसलमानों को भयभीत कर रख सकते हैं। यह वही विचार है, जिसके चलते भाजपा ने 2014, 2017 और 2019 में कामयाबी हासिल की थी।
इसमें वह विशेष तौर पर कामयाब इसलिए हो पाई क्योंकि उसने यह विचार ( परसेप्शन) मतदाताओं के दिमाग में स्थापित कर दिया कि सपा गठबंधन आया तो पहले की तरह गुंडागर्दी बढ़ेगी । तथ्य यह है कि योगी राज में नेशनल क्राइम ब्यूरो के मुताबिक अल्पसंख्यकों , महिलाओं और दलितों के खिलाफ अपराधों में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन सपा गठबंधन यह बात मतदाताओं के बीच पहुंचाने में अर्थात योगी के गुंडा राज के खिलाफ परसेप्शन बनाने में असफल रहा।
समाजवादी पार्टी गठबंधन ने ढाई गुना सीटें पाई तथा अब तक के चुनावों में सर्वाधिक डेढ़ गुना वोट हासिल किए है परंतु उसे यह स्वीकार करना चाहिए कि वह अपनी चुनावी घोषणाओं को मतदाताओं तक पहुंचाने में कामयाब नहीं हुई।
ऐसा नहीं है कि घोषणा से कोई लाभ नहीं हुआ। सभी घोषणाओं से चुनावी लाभ मिला विशेष कर ओल्ड पेंशन स्कीम, 300 यूनिट निशुल्क बिजली,1500 रुपये की समाजवादी पेंशन और 22 लाख युवाओं को नौकरी परंतु जितना लाभ इन घोषणाओं को मतदाताओं तक पहुंचाने और उनका विश्वास हासिल करने के बाद हो सकता है उसका 10 प्रतिशत भी नहीं हो पाया। भा ज पा दूसरी तरफ गोदी मीडिया और सरकारी तंत्र के माध्यम से महिलाओं और गरीबों के बीच एक लाभार्थियों का समूह खड़ा कर उनसे वोट लेने में कामयाब रही।
बहुत सारे लोग यह टिप्पणी कर रहे हैं कि किसान आंदोलन का कोई प्रभाव उत्तर प्रदेश चुनाव में नहीं हुआ लेकिन मैं मानता हूं कि गठबंधन के पक्ष में वातावरण किसान आंदोलन के चलते ही बना।
124 सीटें इसी वातावरण के चलते मिलीं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह उम्मीद की जा रही थी कि वहां किसान आंदोलन के चलते सपा गठबंधन को एकतरफा वोट पड़ेगा लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश तो छोड़िए लखीमपुर खीरी में भी भा ज पा का जीतना यह बतलाता है कि भाजपा अंडर करेंट के तौर पर ध्रुवीकरण करने में सफल रही। दूसरी तरफ आंदोलनकारी आंदोलन के प्रभाव को वोट में तब्दील करने में नाकामयाब रहे।
जिसका अर्थ यह है कि भा ज पा को सजा देने की जो अपील संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा की गई थी उसका असर तो पड़ा लेकिन असर इतना नहीं था कि उससे भा ज पा हार जाती और सपा गठबंधन जीत जाता।
पूर्वांचल में सपा गठबंधन के बड़ी संख्या में सीटें हासिल कर लेने से यह पता चलता है कि सपा द्वारा बनाया गया सामाजिक गठबंधन कारगर रहा। अब इसी तरह का गठबंधन पूरे उत्तरप्रदेश में खड़ा करने की जरूरत है, विशेषकर पश्चिम में।
तमाम सारे चैनलों पर यह बहस लगातार चलती रही कि क्या महंगाई, बेरोजगारी, छुट्टा पशु, कोरोना काल में हुई बड़ी संख्या में मौतों का चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ा है, यह नतीजा निकालना एकदम गलत होगा। पूर्वांचल में बड़ी संख्या में वोट मिलने का कारण उक्त सभी मुद्दे भी हैं परंतु बाकी सभी सीटों पर इन मुद्दों का उतना असर नहीं हुआ कि भा ज पा हार जाती।
हार और जीत को समझने के लिए बसपा द्वारा भा ज पा के साथ मिलकर बनाई गई रणनीति का भी अहम योगदान रहा। बसपा ने 122 सीटों पर सपा गठबंधन के मुस्लिम उम्मीदवारों के खिलाफ मुस्लिम तथा यादव उम्मीदवारों के खिलाफ यादव उम्मीदवार उतारे जिसके परिणाम स्वरूप भा ज पा को 75 सीटों पर बढ़त हासिल हुई। यही बात कांग्रेस के बारे में 10 -15 सीटों को लेकर कहीं जा सकती है। भले ही उसने भाजपा से मिलकर यह नहीं किया हो लेकिन असर तो वही पड़ा है । कांग्रेस को 2024 को देखते हुए सपा से गठबंधन करना चाहिए था ।लेकिन भाई – बहन जीतने से ज्यादा पार्टी का संगठन बनाने की रणनीति पर काम करते रहे ।
गठबंधन कैसे होता। कांग्रेस पिछली बार की तरह 120 सीट चाहती थी।
जबकि उसे वही सीटें मांगनी थीं जहां वह नंबर एक या दो पर थी।
कुल मिलाकर बड़ी संख्या में सीटें सपा गठबंधन विपक्ष के वोट बंट जाने के कारण हार गया । इस तरफ भा ज पा की विपक्ष को बांटने की रणनीति काम आई । विपक्ष एकजुट होता तो उसका असर गोआ पर भी पड़ता।
बिहार में जब विधान सभा चुनाव हुए थे तब सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर तेजस्वी यादव को हरा दिया था, वही वाकया उत्तर प्रदेश में भी दोहराया गया है। तेजस्वी की तरह अखिलेश की सभाओं की बड़ी संख्या में लोग आ रहे थे परंतु वे वोट में तब्दील नहीं हुए।
सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग सत्तारुढ़ पार्टियों द्वारा मतदाता सूची में नाम जुड़वाने तथा कट्टर विपक्षी मतदाताओं के नाम कटवाने से लेकर पोस्टल बैलट को प्रभावित करने के साथ-साथ खराब हुई ई वी एम मशीन को पहले से प्रोग्राम की गई मशीनों से बदलकर किया जाता है। वी वी पी पी ए टी की पर्चियों की हर विधान सभा मे गिनती सीमित कर न्यायालय की इसमे अपरोक्ष सहयोग करता है।
इस कला में भाजपा महारथ हासिल कर चुकी है। चुनाव नतीजों के माध्यम से यह साफ हो गया है कि सपा गठबंधन को विपक्ष में बैठना होगा। अखिलेश यादव के समक्ष यह एक बड़ा अवसर होगा, जब वे लगातार सड़कों पर संघर्ष कर 2024 के चुनाव के लिए पार्टी को तैयार कर सकते हैं। समाजवादी पार्टी तमाम गठबंधन के असफल प्रयोग पहले कर चुकी है इसके बावजूद उसे 2024 के लिए नया गठबंधन बनाने के लिए तैयार होना पड़ेगा ताकि वह भा ज पा का मुकाबला कर सकें।
तमाम जानकारों का यह कहना है कि जब तक ईवीएम को चुनाव प्रक्रिया से अलग नहीं किया जाएगा, तब तक विपक्ष का भाजपा से मुकाबला करना संभव नहीं होगा।
यह काम तो 2019 के पहले ही हो जाना चाहिए था। देश में तमाम जनआंदोलन से जुड़े ई वी एम की जानकारी रखने वाले साथियों ने ई वी एम हटाओ, देश बचाओ अभियान शुरू भी किया था, विपक्षी पार्टियों ने औपचारिक तौर पर उसका समर्थन भी किया था लेकिन कोई प्रभावशाली आंदोलन विपक्षियों ने मिलकर ई वी एम के खिलाफ नहीं किया। अब समय आ गया है कि देश में लोकतंत्र को बचाने के लिए तथा चुनाव प्रक्रिया में आम लोगों का विश्वास कायम करने के लिए विपक्षी दल व्यापकतम गठबंधन बनाकर ई वी एम सहित महंगाई, बेरोजगारी,एम एस पी की कानूनी गारन्टी,सम्पूर्ण कर्ज़ा मुक्ति ,सभी जरूरतमंद परिवारों को 5 हज़ार की माहवार पेंशन जैसे मुद्दे को लेकर राष्ट्रव्यापी संघर्ष की शुरुआत करें।
संयुक्त किसान मोर्चा के 380 दिन के आंदोलन ने साबित कर दिया है कि संघर्ष से ही सरकार को झुकाया जा सकता है। पिछली बार बिहार में जब चुनाव आयोग की सांठगांठ कर भाजपा ने तेजस्वी यादव को हरा दिया था तब से विपक्ष द्वारा यदि आंदोलन चलाया होता तो समाजवादी पार्टी गठबंधन को आज यह दिन देखना नहीं पड़ता।

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