मुनेश त्यागी
सरकार ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के 400 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके उस पर 5 साल के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। अगर यह प्रतिबंध मजबूत सबूतों के आधार पर लगाया गया है तो ठीक है, मगर यदि इसके पीछे केवल सांप्रदायिक विचार काम कर रहे हैं और केवल सांप्रदायिक जनता की वाहवाही लूटनी है तो, इस प्रकार की प्रतिबंध लगाने की कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
सरकार ने कहा है कि पीएफआई को बाहर से फंडिंग होती है, इसके लोग हथियारों की ट्रेनिंग लेते हैं और आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहते हैं, जो देश हितों के खिलाफ है। इसके अतिरिक्त इसकी गतिविधियां देश हित और समाज हित में नहीं है जिसके कारण पीएफआई पर प्रतिबंध लगाया गया है।
अब यह मामला अदालत में जाएगा जहां इसकी वैधता को जांचा परखा जाएगा। प्रभावित लोग इसे विभिन्न न्यायालयों में चुनौती देंगे, जहां पर सरकार को पुख्ता सबूतों द्वारा अपनी कार्यवाही को वैध साबित करना होगा। 20 साल पहले ऐसे ही सिम्मी नाम के संगठन को प्रतिबंधित किया गया था जहां उस पर 20-22 वर्षों तक मुकदमा चलता रहा और अब जाकर उस पर लगाए गए प्रतिबंधों को गैरकानूनी करार दिया गया है। इस सबसे सरकार की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं और सरकार अपने कर्मों को न्यायालय में कानूनी नहीं ठहरा पाई है और उसे अदालत में मुंह की खानी पड़ी है।
हमारा कहना है कि भारत में अमन, शांति और कानून का राज कायम करने के लिए सभी सांप्रदायिक और आतंकवादी संगठनों जैसे r.s.s. बौद्ध, सिख और इसाई सांप्रदायिकता पर भी तुरंत प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए और उनकी हर आतंकवादी, हत्यारी और सांप्रदायिक गतिविधियों पर तुरंत प्रभावी रोक लगाई जानी चाहिए, तभी जाकर भारत में स्थाई अमन और शांति कायम हो सकेगी और भारत में संविधान और कानून का शासन स्थापित किया जा सकेगा वरना सिर्फ एक संगठन पर प्रतिबंध लगाकर भारत की एकता और अखंडता को महफूज नहीं रखा जा सकता।
इससे पहले आर एस एस पर तीन बार, गांधी की हत्या के बाद, आपातकाल और बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद प्रतिबंध लगाया जा चुका है। इससे आर एस एस की विचारधारा समाप्त नहीं हो पाई और वह धन बल के साथ दिन दूनी और रात चौगुनी गति से भूलती फलती गई। ऐसे ही प्रतिबंध कई माओवादी संगठनों पर भी लगाए गए हैं, मगर उनका भी खत्म नहीं हो पाया है।
यहां पर मुख्य सवाल यह है कि क्या इन सांप्रदायिक और आतंकवादी संगठनों को सिर्फ प्रतिबंध लगाकर ही समाप्त किया जा सकता है? इनके खात्मे के लिए सरकार को इन देश विरोधी, मानव विरोधी, कानून विरोधी और समाज विरोधी ताकतों के खिलाफ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और बौद्धिक रूप से अभियान चलाकर इन्हें परास्त करना होगा। जनता में इनके जन विरोधी, आतंकवादी, साम्प्रदायिक और हिंसक स्वरूप और विचारधारा के स्वरूप का भंडाफोड़ करना होगा। इनकी नीतियों और कार्यप्रणाली का भंडाफोड़ करके, इन्हें पूरे देश की जनता के सामने नंगा करना होगा और इनके असली मंसूबों की जानकारी जनता को देनी होगी।
इसके लिए तमाम पार्टियों को एकजुट करके, एक देशव्यापी मुहिम के द्वारा, जनता को अवगत कराना होगा कि ये तमाम ताकतें संविधान विरोधी हैं, कानून के शासन विरोधी हैं, जनतंत्र, गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ हैं। इनका संवैधानिक मूल्यों से कोई लेना देना और विश्वास नहीं है।
इसी के साथ इन देशविरोधी, सांप्रदायिक और आतंकवादी ताकतों को भारत की शिक्षा प्रणाली से दूर रखना होगा। देश निर्माण के लिए भारत की शिक्षा व्यवस्था को इनके सहारे नहीं छोड़ा जा सकता। इनके द्वारा दी जा रही शिक्षा में बहुत सारे बच्चों और लोगों के दिमाग में सांप्रदायिक नफरत और हिंसा भर दी है। इसी के साथ भारत में धर्मनिरपेक्ष, आधुनिक, जनवादी और समाजवादी शिक्षा का प्रचार प्रसार करके तमाम छात्र छात्राओं को इनके मनहूस इरादों से दूर रखना होगा ताकि जनता में धर्मनिरपेक्ष, जनवादी और आधुनिक समाजवादी सिद्धांतों और मूल्यों का प्रचार-प्रसार हो सके और भारत की जनता को ज्ञान विज्ञान और आधुनिक शिक्षा के मूल्यों से परिपूर्ण किया जा सके।
उपरोक्त कदम उठाकर ही भारत को सांप्रदायिक, आतंकवादी और हिंसावादी संगठनों और मानसिकता से छुटकारा मिल पाएगा। सरकार द्वारा की गई इस आधी अधूरी कार्रवाई से कोई काम नहीं चलने वाला है और इन आधे अधूरे कदमों से इनदेश विरोधी ताकतों के मंसूबों को परास्त नहीं किया जा सकता।

