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दुनिया के सारे नैतिक मूल्य औऱ शिक्षाएँ वंचितों को व्यवस्था का ईंधन बनाए रखने के षडयंत्र 

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अमिता नीरव

हम सब अपने बचपन में कई तरह की कहानियाँ सुनते-पढ़ते बड़े होते हैं। बचपन में पढ़ाई और सुनाई जाने वाली सारी कहानियों में आखिर में एक संदेश छुपा होता है। इन कहानियों के माध्यम से बच्चों को सकारात्मकता, सदाचार, ईमानदारी और नैतिकता के मूल्यों को अपनाने का संदेश दिया जाता है।

एक कहानी हम सबने अपने बचपन में सुनी है कि किसी वक्त में एक जंगल में एक कछुआ और एक खरगोश में दोस्ती थी। एक दिन कुछ औऱ दोस्तों ने दोनों के बीच एक प्रतिस्पर्धा करवाई। प्रतिस्पर्धा ये थी कि जंगल के दूसरे किनारे पर स्थित नदी तक कछुए औऱ खरगोश में से कौन सबसे पहले पहुँचेगा?

कछुआ तेज तेज चलने लगा, फिर भी खरगोश उससे बहुत आगे निकल गया। बहुत दूर निकलकर जब खरगोश ने पीछे देखा तो दूर-दूर तक कछुआ कहीं नजर नहीं आ रहा था। उसने सोचा बहुत चल लिया, अभी कछुआ बहुत दूर है तो थोड़ा सो लिया जाए। कुछ भी कर ले कछुआ उससे पहले तो पहुँच ही नहीं सकता है।

यही सोचकर खरगोश एक पेड़ की छाह में आराम करने लगा। उसे नींद लग गई। देर तक सोता रहा। जागा तो उसे रेस की याद आई और वह कूदता फाँदता नदी की तरफ गया। वहाँ जाकर देखा कि कछुआ वहाँ पहले से ही मौजूद था। साथ ही साथ अपने सारे काम काज निबटा कर बाकी दोस्त भी वहाँ मौजूद थे।

इसका मतलब यह हुआ कि खरगोश कितना ही तेज क्यों न हो, लेकिन यदि कछुआ चलता ही चलेगा तो वह जीत जाएगा। ये कहानी हममें से हरेक ने अपने बचपन में सुनी होगी। मैंने भी सुनी थी। पता नहीं आपके मन में इस कहानी को लेकर कुछ प्रश्न उठे थे या नहीं, मेरे मन में बहुत प्रश्न उठे थे।

पहला प्रश्न तो यही था कि, इस तरह की रेस करवाने का विचार जिसको भी आया, उसे यह विचार क्यों आया? दूसरा सवाल उठा कि चलो जिसे आया हो आ गया, लेकिन क्या कछुए की मति घास चरने गई थी, वह क्या सोचकर खरगोश से रेस लगाने के लिए राजी हो गया?

तीसरा सवाल उठा क्या खरगोश ने दूसरी बार रेस करने का प्रस्ताव नहीं दिया? चौथा, यदि दूसरी बार भी रेस होती तो क्या खरगोश दूसरी बार भी ऐसा ही करता?  पाँचवा सवाल था कि यदि खरगोश को सोना ही था तो नदी पर पहुँचकर सोता, यदि वहाँ जाकर सोता तो क्या कछुआ जीता होता?

इसी तरह पंचतंत्र की एक औऱ कहानी है जिसमें प्यासा कौवा घड़े की तली में पहुँचे पानी को लाने के लिए कंकर-कंकर डालता है और फिर अपनी प्यास बुझाता है। अपने बचपन में इस कहानी को विजुअल्स के साथ बचत के विज्ञापन में भी देखे हैं।

इस कहानी को पढ़-सुनकर अक्सर सोचा करती थी कि जिस कौवे को प्यास लगी है, यदि वह कंकर-कंकर डालकर पानी ऊपर लाने की कोशिश करेगा तो पानी तो जब ऊपर आएगा, आएगा, मगर कौवा जरूर प्यास के मारे मर जाएगा। इतनी इर्रेशनल कहानी क्यों बनाई गई है?

उस पर बचत के विज्ञापन में इस कहानी का इस्तेमाल करते हुए क्या इस तथ्य पर विचार किया गया कि ऐसे एक-एक, दो-दो सिक्कों को डालने से कौन अमीर बना है कभी? क्यों इस तरह की कहानियों का इस्तेमाल करके गरीबों को सपने दिखाए जाते हैं?

हमारी मायथोलॉजी में हमने रावण, कंस, कौरव सहित सारे कथित खलनायकों को अंततः हारते देखा है। हमारी पूरी चेतना में यह बात अच्छे से बैठा दी गई है कि कुछ भी हो जाए, आखिरकार जो अन्यायी है, आतताई है, खलनायक है उसे मरना ही है। मतलब हर हाल में अच्छाई जीतेगी ही जीतेगी।

इससे ठीक उलट इस्लाम में पैगंबर हजरत मोहम्मद और उनका परिवार आतताइयों से लड़कर शहीद होता है। खुद ईसा मसीह को सलीब नसीब होती है। मतलब पौराणिकता हमें आदर्श समाज का सपना देती है औऱ ऐतिहासिक तथ्य हमारे उस सपने को ध्वस्त कर देते हैं।

हमने अपने बड़ों से सुना है कि, पाप का घड़ा भरता है, करनी का फल इसी जन्म में भोगना पड़ता है या जैसी करनी वैसी भरनी या फिर भगवान सब देख रहा है। ये कहकर प्रतिरोध की प्रवृत्ति को दबा दिया जाता है। मगर हमारे सामने एक भी उदाहरण ऐसा होता नहीं है।

जीवन के हमारे अनुभव हमें बताते हैं कि इस दुनिया में किसी के भी पाप का घड़ा नहीं भरता है, किसी को भी करनी का फल नहीं मिलता है, भगवान किसी भी दुखियारे के साथ आकर खड़ा नहीं होता है। कोई कछुआ कभी नहीं जीतता है। सिक्के-सिक्के जोड़ने से कभी कोई अमीर नहीं हुआ है।

तो फिर हमारे सामने इस तरह की कहानियां, इस तरह के आदर्श क्यों प्रस्तुत किए जाते हैं? लंबे समय तक मैं इस प्रश्न से जूझती रही हूँ। जिन दिनों मैं पढ़ती थी उन दिनों साहित्य पढ़ने के मेरे शौक पर एक दोस्त ने कहा था, ये सब पढ़ने के लिए जिंदगी पडी है, पहले करियर पर ध्यान देना चाहिए।

उस वक्त मुझे उसकी बात एकदम सही लगी थी। हालाँकि करियर पर ध्यान तब भी नहीं दिया गया। फिर भी लगा कि यह बात तो सही कह रहा है। आज लगता है कि उस बात के बीज हमें सारी नैतिक कथाओं और पौराणिक उद्धरणों में मिल जाएँगे।

असल में सारी नैतिक और पौराणिक कथाएँ इंसान को व्यवस्था का ईँधन बनाए रखने के उपकरण हैं। ताकि विपरीत परिस्थितियों में भी गरीब भला, ईमानदार औऱ नैतिक बना रहे। वह बिना बहुत उम्मीद के, भगवान के भरोसे रहकर लगातार काम करता रहे, दौड़ का हिस्सा बना रहे।

सोचें यदि सबको यह समझ आने लग जाए कि ये सब कहानियाँ हमें लगातार जोते रहने के लिए घड़ी गई है तो सबसे पहले तो हम अपनी परिस्थितियों से ही विद्रोह करेंगे। क्योंकि तब हम यह समझ पाएँगे कि कोई ईश्वर न्याय करने के लिए कहीं नहीं है। होता तो कहीं तो न्याय होता दिखता।

दूसरे, हम यह भी समझने लगेंगे कि ये सारी कहानियाँ झूठ है, क्योंकि असल जिंदगी में हमने कभी किसी कछुए को खरगोश से जीतते नहीं देखा है, किसी कौवे को एक-एक कंकर डालकर प्यास बुझाते नहीं देखा है, कभी किसी राम, कृष्ण को जीतते नहीं देखा। क्योंकि यह सिर्फ कहानियों में ही होता है। हकीकत बिल्कुल उलट होती है।

दुनिया के सारे नैतिक मूल्य औऱ शिक्षाएँ वंचितों को व्यवस्था का ईंधन बनाए रखने के षडयंत्र हैं।

#सूत्र_विस्तार

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