
डा सलमान अरशद
कहीं पढ़ा था कि बीफ़ एक्सपोर्ट में भारत की 19.2% की हिस्सेदारी है। इस मैदान में सबसे आगे ब्राजील है और भारत बेहद कम फासले पर ब्राजील के पीछे है। ये भी पढ़ा था कि भारत 18.50 लाख टन मांस निर्यात करता है। मांस निर्यात करने वाले तमाम क़त्ल खाने सवर्ण हिन्दुओं के हैं, इन्हीं में से एक भाजपा के संगीत सोम भी हैं। क्या कभी आपने सुना कि जीव दया के किसी ठेकेदारों ने इन कत्लखानों पर हमला किया है?
एक और बात, ये लाखों जानवर जिन्हें काटकर विदेशी मुद्रा कमाई जाती है, ये भी “निरीह और बेजुबान” ही होते हैं। पॉस कॉलोनियों के निवासी जो कुत्तों के साथ खाते, पीते, टहलते और सोते हैं, उन्हें कॉलोनी में एक बकरे के आ जाने से जय श्रीराम के नारे लगाने की प्रेरणा जीवदया या स्वच्छता से नहीं मुसलमानों से नफरत से मिलती है।
ईद से एक दो दिन पहले शहरी मुसलमान बकरा खरीद कर लाते हैं, लेकिन कुर्बानी के लिए उन्हें किसी निश्चित जगह ले जाते हैं। वैसे भी फ्लैट की बनावट ऐसी होती ही नहीं कि उनके भीतर जानवर काट कर तैयार किया जा सके, लेकिन नफरत की आग में सुलग रहे लोगों को इतना सोचने की फुरसत कहाँ हैं।
मुसलमानों का दानवीकरण आज का सियासी अभियान है। इस अभियान की आड़ में उन्होंने आपके मन और विचारों पर कब्ज़ा कर लिया है। अब आपको 100 पर चुका पेट्रोल और महंगी गैस नज़र नहीं आती। सरकारी स्कूली तंत्र और सरकारी अस्पताल के पूरे सिस्टम को खत्म कर देने की साजिश नज़र नहीं आती। चलो मान लेते हैं कि मिडिल क्लास को इनकी ज़रूरत नहीं है लेकिन मिडिल क्लास सड़क पर भगवा गमछा बांध कर उत्पात करने भी नहीं जाता लेकिन जो जाते हैं, उन्हें तो देखना चाहिये न !
आपकी बहसों से बैंकों का अरबो रूपया लेकर भाग चुके कर्ज़खोरों को हटा दिया गया और आपको पता भी नहीं, आपको तो ये भी मालूम नहीं कि जानबूझ कर बैंकों का पैसा न दे रहे लुटेरों पर भी सरकार मेहरबान होने जा रही है।
मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा अभियान और उनके दानवीकरण पर पानी की तरह पैसा इसी लिए बहाया जा रहा है कि आप मोनू मानेसरों पर लहालोट होते रहे हैं लेकिन खुद को लुटते हुए न देख पायें।
वरना आप में से बहुत से लोग होली पर उस भीड़ का हिस्सा थे जो बकरे का मांस खरीदने के लिए लाइन में खड़ी थी। आंकड़े कहते हैं कि 70 प्रतिशत भारतीय मांसाहारी हैं, आंकड़े ये भी कहते हैं कि मुसलमान सिर्फ 14 प्रतिशत हैं।
मनुस्मृति पूरी मीनू शेयर करती है कि किस मांस से ब्राह्मणों की सेवा करने पर आपके पूर्वज कितने दिन तृप्त रहते हैं, इनमें गाय और बकरे भी शामिल हैं। सनातन धर्म का इतिहास बताता है कि मांसाहार इस देश में कभी भी वर्जित नहीं रहा।
एक अवतार जिनके नाम से अहिंसा का पूरा करोबार चलता है, अतिसार यानी दस्त होने पर कबूतर का मांस खाते हैं और इनके पुराने ग्रंथ बताते हैं कि मछली खाते वक़्त क्या सावधानी रखनी चाहिए। संदर्भ सहित भी लिख सकता हूँ लेकिन फिर अनपढ़ों और कुपढ़ों कि फ़ौज से उलझना पड़ेगा।
सार ये कि, खानपान इस देश में हमेशा ही लोगों की अपनी पसंद का मामला रहा है। लोग अपनी हैसियत और पसंद के हिसाब से भोजन करते हैं।
बाकी मांसाहार की अति इस दुनिया को बहुत नुकसान पहुंचा रही है, इसलिए अगर इसे सीमित किया जा सके तो बेहतर ही होगा, लेकिन ये होगा शिक्षा और जागरूकता से। जैसे में स्वम् साग, सब्जी और फलों पर गुजारा करना पसंद करता हूँ।
दस साल से ज़्यादा शुद्ध शाकाहारी रहा हूँ, सूर्यास्त के पश्चात खाना भी नहीं खाया। साधु संतों के बीच ख़ूब समय बिताया और जाना कि आपका अच्छा या बुरा होना आपकी शिक्षा और परवरिश से तय होता है भोजन से नहीं।
मुसलमान विरोधी घृणा अभियान से ख़ुद को अलग कर लें तो ये आपका आप पर एहसान होगा, मुसलमानों पर दया नहीं।
इतना तो हम भी जानते हैं कि 30 करोड़ मुसलमानों को न तो मारा जा सकता है न भगाया जा सकता है। आपको इन्हीं के साथ रहना है, लड़ कर रहें या प्रेम से, चुनना आपको है।