पुष्पा गुप्ता
मुस्लिम किरदार गुलाब खान एक निर्धन व्यक्ति का नाम था। बरसाने की पवित्र धरती पर उसका जन्म हुआ। ब्रह्मा आदि जिस रज की कामना करते हैं, उसका उसे जन्म से ही स्पर्श हुआ था। पढ़ा-लिखा कुछ नहीं था पर सारंगी अच्छी बजा लेता था।
श्री राधा रानी के मंदिर के प्रांगण में जब भी पदगान हुआ करता था, उसमें वह सारंगी बजाया करता था। यही उसकी अजीविका थी। मंदिर से जो प्रसाद और दान-दक्षिणा प्राप्त होती, उसी से वह अपना जीवन निर्वाह करता था।
गुलाब खान की एक छोटी लड़की थी। जब गुलाब मंदिर में सारंगी बजाता तो लड़की नृत्य करती थी। उस लड़की के नृत्य में एक आकर्षण था, एक प्रकार का खिंचाव था। उसका नृत्य देखने के लिए लोग स्तंभ की भांति खड़े हो जाते। गुलाब अपनी बेटी से वह बहुत प्यार करता था। उसने बड़े प्रेम से उसका नाम रखा—राधा।
वह दिन आते देर न लगी जब लोग उससे कहने लगे, “गुलाब लड़की बड़ी हो गई है। अब उसका विवाह कर दे।”
राधा केवल गुलाब की बेटी न थी वह पूरे बरसाने की बेटी थी। सभी उससे प्यार करते और उसके प्रति भरपूर स्नेह रखते। जब भी कोई गुलाब से उसकी शादी करवाने को कहता उसका एक ही उत्तर होता, “शादी करूँ कैसे? शादी के लिए तो पैसे चाहिए न?”
एक दिन श्रीजी के मंदिर के कुछ गोस्वामियों ने कहा, “गुलाब तू पैसों की क्यों चिन्ता करता है? उसकी व्यवस्था श्रीजी करेंगी। तू लड़का तो देख?”
जल्दी ही अच्छा लड़का मिल गया। श्रीजी ने कृपा करी। पूरे बरसाने ने गुलाब को उसकी बेटी के विवाह में सहायता करी। धन की कोई कमी न रही, गुलाब का भण्डार भर गया, राधा का विवाह बहुत धूम-धाम से हुआ। राधा प्रसन्नतापूर्वक अपनी ससुराल विदा हो गई।
गुलाब अपनी बेटी से बहुत प्रेम करता था और उसके जीवन का वह एकमात्र सहारा थी। अतः राधा की विदाई से उसका जीवन पूरी तरह से सूना हो गया। राधा के विदा होते ही गुलाब गुमसुम-सा हो गया। तीन दिन और तीन रात तक श्रीजी के मंदिर में सिंहद्वार पर गुमसुम बैठा रहा।
लोगों ने उसको समझाने का बहुत प्रयत्न किया किन्तु वह सुध-बुध खोया ऐसे ही बैठा रहा, न कुछ खाता था, न पीता था। बस हर पल राधा-राधा ही रटता रहता था।
चौथे दिन जब वह श्रीजी के मंदिर में सिंहद्वार पर गुमसुम बैठा था तो सहसा उसके कानों में एक आवाज आई, “बाबा ! बाबा ! मैं आ गई। सारंगी नहीं बजाओगे मैं नाचूंगी।”
उस समय गुलाब सो रहा था या जाग रहा था कहना कठिन था। बंद आँखों से वह सारंगी बजाने लगा और राधा नाचने लगी। आज उसकी पायलों में मन-प्राणों को हर लेने वाला आकर्षण था। इस झंकार ने गुलाब की अंतरात्मा तक को झकझोर दिया था।
उसके तन और मन की आँखें खुल गईं। उसने देखा उसकी बेटी राधा नहीं बल्कि स्वयं राधारानी हैं, जो नृत्य कर रही हैं।
सजल और विस्फारित नेत्रों से बोला, “बेटी ! बेटी…”! और जैसे ही कुछ कहने की चेष्टा करते हुए स्नेह से कांपते और डगमगाते हुए वह उनकी ओर अग्रसर हुआ राधारानी मंदिर की ओर भागीं तो गुलाब भी उनके पीछे-पीछे भागा।
इस घटना के पश्चात गुलाब को कभी किसी ने नहीं देखा। उसके अदृश्य होने की बात एक पहेली बन कर रह गई। कई दिनों तक जब गुलाब का कोई पता नहीं चला तो सभी ने उसको मृत मान लिया। सभी लोग बहुत दुखी थे, गोसाइयों ने उसकी स्मृति में एक चबूतरे का निर्माण करवाया।
कुछ दिनों के पश्चात मंदिर के गोस्वामी जी शयन आरती कर अपने घर लौट रहे थे। तभी झुरमुट से आवाज आई, “गोसाईं जी ! गोसाईं जी !”
गोसाईं जी ने पूछा, “कौन?”
गुलाब झुरमुट से निकलते हुए बोला, “मैं आपका गुलाब।”
गोसाईं जी बोले, “तू तो मर गया था।”
गुलाब बोला, “मुझे श्रीजी ने अपने परिकर में ले लिया है। अभी राधारानी को सारंगी सुना कर आ रहा हूँ। देखिए राधारानी ने प्रशाद के रूप में मुझे पान का बीड़ा दिया है।”
गोस्वामी जी उसके हाथ में पान का बीड़ा देखकर चकित रह गए क्योंकि यह बीड़ा वही था जो वह राधारानी के लिए अभी-अभी भोग में रखकर आ रहे थे।”
गोसाईं जी ने पूछा,”तो तू अब रहता कहाँ है ?”
उसने उस चबूतरे की तरफ इशारा किया जो वहाँ के गोसाइयों ने उसकी स्मृति में बनवाया था।
तभी से वह चबूतरा ‘गुलाब सखी का चबूतरा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया और लोगों की श्रद्धा का केंद्र बन गया।

