अग्नि आलोक

कमाल की बुद्धि है संघियों की 

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गोपाल राठी

स्वामी विवेकानंद ,महात्मा गांधी ,सुभाषचन्द्र बोस ,सरदार वल्लभभाई पटेल लालबहादुर शास्त्री ,अंबेडकर ,जेपी  लोहिया , पर दावा करते करते अब इन्होंने हरिशंकर परसाई पर भी दावा ठोंक दिया l

आज़ादी के आंदोलन में उदासीन ,तटस्थ रहकर अंग्रेजों को सहयोग करने वाली संघी बिरादरी  हमेशा इस अपराधबोध से ग्रस्त रही है कि उसके पास गर्व करने लायक उनके कुनबे का कोई स्वतन्त्रता संग्राम का नायक नहीं है l इसलिए वे ज़िन्दगी भर कांग्रेसी रहे उपेक्षित कांग्रेसी नेताओं का कुछ इस अंदाज में ज़िक्र करते है मानो वे उनकी ही पार्टी से निकले हों l कांग्रेसी नेता एवं प्रथम गृहमंत्री सरदार पटेल की सबसे बड़ी मूर्ती बनाकर देश और दुनिया को यह बताने का प्रयास किया गया कि सरदार पटेल की विरासत के सच्चे उत्तराधिकारी संघी ही है l कुछ दिनों के लिए यह गांधीवादी समाजवादी भी हो गए लेकिन इस चोले में वोट नही मिले तो फिर से संघी हो गए l जेपी का नाम भी कुछ दिनों तक बहुत भुनाया इन लोगों ने l विदेशों में तो सिर्फ गांधी जी को ही लोग जानते है और मानते है इसलिए वहां तो मोदी जी को गांधी जी का मज़बूरी में उल्लेख करना पड़ता है l लेकिन देश जानता है कि यह गांधी नहीं गोडसे की विचारधारा के अनुयायी है l

कमोबेश यही स्थिति साहित्य की रही है l आज़ादी और आज़ादी के बाद हिंदी या अन्य भारतीय भाषा का कोई बड़ा कवि ,लेखक संघी विचारधारा से प्रेरित नहीं रहा l बहुत से लेखक  कवि धार्मिक ज़रूर थे लेकिन उनके लेखन में कभी साम्प्रदायिक भावना नहीं रही l उनकी दृष्टि भारतीय समाज को जोड़ने की रही तोड़ने की नहीं l अर्थात साहित्यिक दृष्टि से भी यह दरिद्र थे और दरिद्र है l

अब एक नई रणनीति के तहत औसत बुद्धि के लोगो को प्रभावित करने के लिए लेखकों कवियों को उनके जन्मदिन पुण्यतिथि पर स्मरण किया जा रहा है ताकि यह संदेश जाए कि इस पार्टी में भी साहित्य पढ़ने लिखने वाले लोग हैं l

मज़ेदार बात यह है कि जिन परसाई जी को श्रद्धांजलि दी जा रही है उन्होंने ज़िन्दगी भर संघ ,जनसंघ और भाजपा की फासिस्ट और सांप्रदायिकता के खिलाफ लिखा है l उनके व्यंग की पैनी धार से कुपित होकर संघियों ने उन्हें शारीरिक रूप से नुकसान भी पहुंचाया था l

 इस बगुला भक्ति से ना परसाई जी खुश होते और ना उनके चाहने वाला प्रसन्न है l बल्कि इनकी बुद्धि पर तरस आ रहा है l  जनता की आंखों में धूल झोंकने की इस स्कीम का स्याह पहलू यह है कि किसी ने परसाई जी को नहीं पढ़ा l अगर किसी संघी ने परसाई जी को पढ़ लिया होता तो ऐसा दुस्साहस कदापि नहीं करता l

हिंदी साहित्य में व्यंग विधा को स्थापित करने वाले हिंदी के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई को पुण्यतिथि पर सादर स्मरण l

(संदर्भ : परसाई पुण्यतिथि पर भाजपा की एक पुरानी पोस्ट )

(गोपाल राठी )

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