नरेन्द्र कुमार*
सभी वामपंथी पार्टियों से हमारी अपील है कि नारों और झंडों में अंबेडकर को आत्मसात करने के पहले उनके पूरे जीवन के राजनीति का स्टैंड, आंदोलन तथा लेखन का मूल्यांकन करते हुए उनके वर्ग चरित्र, विश्व पूंजीवाद तथा कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रति उनके रुख को समझा जाए। बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने भारत में तो कम्युनिस्ट शासन का समर्थन करने की बात कही है, लेकिन यूरोप तथा अमेरिका के बारे में उनका मानना है कि वहां लोकतंत्र सफल होगा। आज की परिस्थिति और विश्व पूंजीवाद का संकट यह साबित कर रहा है कि दुनिया में कहीं भी पूंजीवाद तथा पूंजीवादी लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता है। इस इंटरव्यू के आधार पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अंबेडकर का विश्व दृष्टिकोण पूंजीवादी लोकतंत्र के पक्ष में था, और अपने यहां के शासक वर्ग से विभिन्न पक्षों पर अंतर्विरोध की स्थिति में वे कम्युनिस्टों के पक्ष में बोल रहे हैं।
दरअसल इतिहास की एक बड़ी सच्चाई है कि अपने जन्म काल से ही कम्युनिस्टों ने ही वर्ग संघर्ष के साथ-साथ जातीय उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष किया है, जमीनी लड़ाई का मूल्यांकन किया जाए तो जाति व्यवस्था का भौतिक तथा उत्पादक आधार तब ग्रामीण समाज में मौजूद सामंती तथा दस्तकारी, ब्राह्मणवादी जजमनिका व्यवस्था थी जिसपर सबसे ज्यादा प्रहार कम्युनिस्ट ही कर रहे थे। इसलिए जनवादी आंदोलनों के उसूल के तहत अंबेडकर को कम्युनिस्ट आकर्षित कर रहे थे। अंबेडकर की कम्युनिस्टों के प्रति आकर्षण
एक मजबूत उदाहरण है कि कम्युनिस्ट लोग जाति व्यवस्था तथा जातीय उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे और निश्चय ही यदि वे जिंदा होते तो जनवादी आंदोलनों तथा सामंतवाद विरोधी संघर्षों में उनके साथ कम्युनिस्टों की एकता बनती। इस मायने में अंबेडकर बड़े पूंजीपतियों से निराश होकर जातीय उत्पीड़न के खिलाफ कॉमनिस्टों साथ आते नजर आते हैं। उनकी स्वीकारोक्ति से यह भी साबित होता है कि अंबेडकर विश्व पूंजीवाद के द्वारा पुराने प्रतिक्रियावादी सामंती ब्राह्मणवादी उत्पीड़न को समाप्त किए जाने कि जो उम्मीद लगा रखी होगी, उससे निराश होकर सही दिशा में बढ़ रहे थे।
आज की तारीख में नेहरू तथा गांधी को आर एस एस की तुलना में चाहे जितना प्रगतिशील साबित करने की कोशिश की जाए उन दिनों कांग्रेस का सामाजिक आधार प्रतिक्रियावादी सामंतों का बड़ा हिस्सा था ही जिसके दबाव में कांग्रेसी ने कभी भूमि सुधार को सही तरीके से लागू नहीं किया। कांग्रेस के साथ समझौतावादी रुख तथा पश्चिमी पूंजीवाद के प्रभाव में होने के कारण अंबेडकर भी कभी क्रांतिकारी भूमि सुधार के लिए संघर्ष का नेतृत्व नहीं किया जो किसी इंटरव्यू में या अन्य जगह उनके इस स्वीकारोक्ति से जाहिर होता है। उन्होंने शहरी दलितों की समस्याओं को ज्यादा तरजीह दिया और गांव के दलितों की समस्या को जोरदार तरीके से नहीं उठा पाए। शहरी मजदूरों में भी दलितों की अच्छी खासी संख्या थी जो मजदूरी की गुलामी के तहत पूंजीपतियों के निर्मम शोषण के शिकार हो रहे थे। अंबेडकर चाहते तो शहरों में इस गुलामी के खिलाफ दलितों की मुक्ति के लिए बड़ा अभियान चलाकर कम्युनिस्टों के साथ संयुक्त मोर्चा बना सकते थे। जाति के प्रश्न पर ट्रेड यूनियन के अंदर आंतरिक संघर्ष चलाया जाना चाहिए और यह काम आंबेडकर यूनियनों के संयुक्त मोर्चा के साथ-साथ वैचारिक संघर्ष के रूप में चला सकते थे। लेकिन ऐसा न कर जाति के नाम पर मजदूर आंदोलन में ही एक तरह से उन्होंने फूट डाल दिया।
जो लोग आज भी जनवादी या नव जनवादी क्रांति,भूमि सुधार आंदोलन आदि को एजेंडा बनाए हुए हैं उनके लिए अंबेडकर को आगे रखना आसान होगा लेकिन जो लोग विश्व पूंजीवाद और उससे जुड़े भारतीय पूंजीवाद को प्रहार के मुख्य बिंदु के रूप में देखते हैं उनके लिए अंबेडकर के विचारों से कोई भी रोशनी नहीं मिलती है क्योंकि , अंबेडकर कभी भी निजी संपत्ति के खात्मा, उत्पादन के तमाम संसाधनों के सामाजिकरण तथा सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के समर्थक नहीं थे। यह तथ्य आज के पूंजीवादी लोकतंत्र में स्पष्ट है कि निरपेक्ष लोकतंत्र नहीं चल सकता है, जिस पूंजीवाद को लोकतंत्र के नाम पर महिमामंडित किया जा रहा है, वह खुलेआम पूंजी की गुलामी कर रहा है।आज कोरोना वायरस के काल में जब मजदूर महानगरों, गांव तथा कस्बों में भूखे मर रहे हैं, तब भी यह पूंजीवादी लोकतंत्र गोदाम में अपने अनाज को रोक कर रखे हुए है, और बड़ी ही बेरहमी व बेशर्मी के साथ मजदूरों के खिलाफ ,मजदूरों को नजरअंदाज करके फैसले ले ले रहे हैं। तो जहां तक बीबीसी को दिए गए अंबेडकर के इंटरव्यू की बात है, अंबेडकर कम्युनिस्टों के द्वारा जनवादी आंदोलनों के दायरे में जो जाति उत्पीड़न तथा सामंती उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे, वे साथ दिखते हैं लेकिन अब तक की तमाम रचनाओं में या अपने व्यवहार में अंबेडकर कहीं भी पूंजी, पूंजीपति तथा पूंजीवादी लोकतंत्र को समाप्त कर समाजवादी समाज का निर्माण कर, तमाम उत्पादन के साधनों को समाज के अंदर लाने तथा समाजवाद से साम्यवाद की तरफ प्रस्थान करने की लड़ाई का समर्थन करते नहीं दिखते हैं। फिर भी हमें अंबेडकर का मेहनतकश जनता के पक्ष में जो योगदान है उसे स्वीकार करते हुए उनकी रचनाओं में तथा भारतीय समाज पर जो उनका भावनात्मक प्रभाव है उसका वित्त पूंजी पोषित साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था के खिलाफ व्यापक संघर्ष के लिए स्वीकार किया जाना चाहिए।
*नरेन्द्र कुमार*

