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*आंबेडकर बनाम हिंदुत्व: सामाजिक न्याय बनाम सांस्कृतिक राष्ट्रवाद*

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-तेजपाल सिंह ‘तेज’

          डॉ. भीमराव आंबेडकर और समकालीन हिंदुत्व के बीच टकराव कोई व्यक्तिगत या वैचारिक असहमति भर नहीं है; यह भारत की सामाजिक संरचना को देखने के दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों का संघर्ष है। जहाँ आंबेडकर हिंदू समाज को उसके भीतर मौजूद असमानताओं, अन्याय और अमानवीयता के आधार पर परखते हैं, वहीं हिंदुत्व उसे एक सांस्कृतिक–राजनीतिक इकाई के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसमें आंतरिक आलोचना को “विभाजनकारी” कहा जाता है। यह अध्याय इसी मूलभूत विरोध को स्पष्ट करता है—कि क्यों आंबेडकर का विचार हिंदुत्व के लिए असुविधाजनक ही नहीं, बल्कि खतरनाक भी है।

1. आंबेडकर का प्रश्न: हिंदू धर्म सुधार योग्य है या त्याज्य?

          आंबेडकर की आलोचना हिंदू धर्म के बाहरी रूपों तक सीमित नहीं थी। वे हिंदू समाज की मूल संरचना पर प्रश्न उठाते हैं। उनके लिए जाति कोई सामाजिक विकृति नहीं, बल्कि हिंदू धर्म की केन्द्रीय संगठनात्मक प्रणाली थी। उनका यह कथन निर्णायक है–“जाति व्यवस्था हिंदू समाज की आत्मा है।” यही कारण है कि आंबेडकर सामाजिक सुधार से आगे बढ़कर धार्मिक विमर्श तक जाते हैं। वे यह पूछते हैं कि यदि कोई धर्म–

·        जन्म के आधार पर मनुष्य की गरिमा तय करता है

·        समानता को असंभव बनाता है

·        और बहुसंख्यक समाज को अपमान और दासता में रखता है–तो क्या वह धर्म नैतिक रूप से बचाव योग्य है? यह प्रश्न हिंदुत्व के लिए अस्वीकार्य है, क्योंकि हिंदुत्व धर्म को प्रश्न से ऊपर रखता है।

2. हिंदुत्व की रणनीति: आंबेडकर को प्रतीक बनानाविचार को निष्क्रिय करना:

          समकालीन हिंदुत्व आंबेडकर को पूरी तरह नकार नहीं सकता। उनकी सामाजिक स्वीकृति और संवैधानिक भूमिका उसे ऐसा करने से रोकती है। इसलिए हिंदुत्व एक वैकल्पिक रणनीति अपनाता है—आंबेडकर को स्वीकार करनापर उनके विचारों को अलग-थलग कर देना। इस रणनीति के अंतर्गत–

·        अंबेडकर को “महान राष्ट्रनिर्माता” कहा जाता है

·        उन्हें संविधान तक सीमित कर दिया जाता है

·        लेकिन हिंदू धर्म और जाति पर उनकी तीखी आलोचना को लगभग पूरी तरह गायब कर दिया जाता है

          हिंदुत्व आंबेडकर को icon बनाता है, intellectual threat नहीं रहने देता।

3. जाति का प्रश्न: आंबेडकर बनाम हिंदू एकता का मिथक:

          हिंदुत्व का केंद्रीय दावा “हिंदू एकता” है। आंबेडकर इस दावे को सिरे से खारिज करते हैं।

उनके अनुसार:

·        जाति व्यवस्था हिंदुओं को एक समाज बनने ही नहीं देती

·        जहाँ अंतर्विवाह नहीं, वहाँ भाईचारा नहीं

·        और जहाँ भाईचारा नहीं, वहाँ राष्ट्र नहीं

          आंबेडकर के लिए राष्ट्र निर्माण की पूर्व शर्त सामाजिक समानता है, जबकि हिंदुत्व के लिए राष्ट्र एक सांस्कृतिक पहचान है। यही कारण है कि हिंदुत्व जाति को “आंतरिक सुधार” का विषय कहकर टाल देता है, जबकि आंबेडकर उसे राजनीतिक और नैतिक संकट मानते हैं।

4. धर्म और नैतिकता: आंबेडकर की निर्णायक असहमति:

          आंबेडकर धर्म को उसकी नैतिक उपयोगिता के आधार पर परखते हैं। यदि कोई धर्म सामाजिक न्याय का विरोध करता है, तो वह धर्म नहीं, बल्कि सामाजिक उत्पीड़न की व्यवस्था है। हिंदुत्व इसके विपरीत–

·        धर्म को सांस्कृतिक पहचान बनाता है

·        नैतिक प्रश्नों को भावनात्मक राष्ट्रवाद में ढक देता है

·        और धार्मिक आलोचना को “अपमान” घोषित करता है

          इस संदर्भ में अम्बेडकर का बौद्ध धर्म स्वीकार करना केवल आध्यात्मिक निर्णय नहीं था; यह हिंदू सामाजिक संरचना का नैतिक बहिष्कार था।

5. ग्राम्शी के संदर्भ में: क्यों आंबेडकर हिंदुत्व के लिए असहज हैं:

          यदि ग्राम्शी के cultural hegemony सिद्धांत से देखें, तो आंबेडकर हिंदुत्व की सांस्कृतिक सहमति को तोड़ते हैं। वे–

·        उत्पीड़न को नियति नहीं मानते

·        परंपरा को पवित्र नहीं मानते

·        और धर्म को आलोचना से मुक्त नहीं रखते

इसलिए आंबेडकर:

·        सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भाषा को स्वीकार नहीं करते

·        “पहले हिंदू, बाद में दलित” जैसे आग्रह को खारिज करते हैं

·        और समानता को पहचान से ऊपर रखते हैं

यही कारण है कि हिंदुत्व आंबेडकर को पूरी तरह अपनाने से डरता है।

6. समकालीन राजनीति में आंबेडकर की प्रासंगिकता:

आज जब–

·        जाति आधारित हिंसा जारी है

·        संसाधनों का असमान वितरण बना हुआ है

·        और सामाजिक सम्मान जन्म से निर्धारित होता है

          तब आंबेडकर का प्रश्न और अधिक तीखा हो जाता है–

“क्या हिंदू समाज लोकतांत्रिक हो सकता है?” हिंदुत्व इस प्रश्न का उत्तर देने के बजाय, इसे राष्ट्र-विरोधी विमर्श कहकर खारिज कर देता है।

निष्कर्ष: यह टकराव क्यों अपरिहार्य है:

          आंबेडकर और हिंदुत्व के बीच टकराव अस्थायी नहीं है। यह तब तक रहेगा, जब तक:

·        हिंदू एकता सामाजिक समानता पर आधारित नहीं होती

·        धर्म नैतिक आलोचना से ऊपर रखा जाता है

·        और जाति को समस्या नहीं, पहचान माना जाता है

आंबेडकर की दृष्टि में–
समानता के बिना धर्म अमानवीय है।

हिंदुत्व की दृष्टि में:
आलोचना के बिना धर्म राष्ट्र है।

          यही वह बिंदु है जहाँ यह संघर्ष केवल वैचारिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत बन जाता है।

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