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*अमेरिका परस्ती का शिकार हुआ  नोबेल शांति पुरस्कार* 

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   –-सुसंस्कृति परिहार 

शायद यह पहला मौका था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नोबेल शांति पुरस्कार के लिए तड़फते दिखे जिनको दुनियां के बहुसंख्यक देश युद्ध रोपने और उस देश को बर्बाद  कर लूटने वाले देश के नाम से जानते हैं। ये जानकर लोगों को खुशी हुई कि वे इस महत्वपूर्ण पुरुस्कार के काबिल नहीं पाए गए।

यह पुरस्कार जिन महोदया को दिया गया और उन्हें  लोकतंत्र के उद्धारक के रूप में पेश किया गया है।सरसरी तौर पर उनकी जो जीवन गाथा सामने आई उसे पढ़कर लोग अगले साल के लिए राहुल गांधी के संघर्ष और कामयाबी के लिए नोबेल शांति पुरस्कार की उम्मीद कर बैठे।जबकि  इन मोहतरमा के बारे में जानकारों की जो ख़बर आई वह चिंताजनक है और ऐसे हालात सामने आ रहे हैं कि लोग अब इस महत्वपूर्ण पुरुस्कार को भी संदेहास्पद मान रहे हैं ।

 मारिया मचाडो की राजनीति हिंसा में डूबी हुई है। उन्होंने सदैव विदेशी हस्तक्षेप की माँग की है, यहाँ तक कि गाजा के विनाश के सूत्रधार, इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से सीधे अपील की है कि वे “आज़ादी” के नाम पर बमों से वेनेज़ुएला को “आज़ाद” कराने में मदद करें। उन्होंने प्रतिबंधों की माँग की है, युद्ध का वह मौन रूप जिसके प्रभावों ने—जैसा कि द लैंसेट और अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययनों से पता चला है—युद्ध से ज़्यादा लोगों की जान ली है, और पूरी आबादी के लिए दवा, भोजन और ऊर्जा की आपूर्ति ठप कर दी है।

 अमेरिका और नेतन्याहू की नीतियों पर फिदा मारिया माचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार देकर नोबेल समिति पर अब संदेह और पक्षधरता का आरोप लग रहा है  सच बात ये है कि इससे ख़ुद वेनेजुएला के लोग अवाक हैं। मारिया माचाडो को वेनेजुएला में अमेरिका की घोषित पिट्ठू माना जाता है। इसीलिए डोनाल्ड ट्रंप इज़राइल समर्थक मारिया माचाडो को नोबल शांति पुरस्कार दिए जाने पर जश्न मना रहे हैं। अप्रत्यक्षत: यह पुरस्कार अमेरिकी नीतियों को समर्पित नज़र आ रहा है।

  मारिया माचाडो की बदनीयत को 2002 की कारमोना डिक्री पर उनके हस्ताक्षर देख कर महसूस कर सकते हैं। यह एक तरह से वेनेजुएला के संविधान को खत्म करके तख्तापलट का घोषणा-पत्र था। इसके पीछे अमेरिका था। 2005 में मारिया अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश से मिलती हैं और बुश उन्हें लोकतंत्र का सेनानी घोषित कर देते हैं। अमेरिका लंबे समय से ऐसे नेता की तलाश में था जो उसे वेनेजुएला में एंट्री दिला सके। वेनेजुएला के किसी बड़े नेता का अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलना और उसका समर्थन करना वहां के लोग गद्दारी के तौर पर देखते हैं। इस गद्दारी के एवज़ में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने उन्हें लोकतंत्र सेनानी घोषित करने में बेहिसाब पैसा और ताक़त लगा दी थी । इसके लिए अमेरिका ने USAID और दूसरी एजेंसियों के ज़रिए वेनेजुएला और विश्व मीडिया में मारिया माचाडो की इमेज बिल्डिंग का एक लंबा अभियान चलाया। यह जॉर्ज बुश का पैसा था कि वो रातों रात राष्ट्रपति पद की दावेदार बन बैठीं। अमेरिका ह्यूगो शावेज़ को उखाड़ फेंकने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार थे। लेकिन मारिया के पास जनसमर्थन नहीं था। कुछ हज़ार लोगों की एक अराजक भीड़ ज़रूर थी। विश्व मीडिया ने उसी को व्यापक जनसमर्थन और जनसैलाब की तरह पेश किया।

ये वही मारिया माचाडो हैं जिन्हें डोनाल्ड ट्रंप ने स्वतंत्रता और लोकतंत्र की योद्धा कहा है। और मुफ्त में नहीं कहा है। ये वही मारिया माचाडो हैं जिन्होंने कैरिबिया में अमेरिकी युद्धपोतों की तैनाती के ट्रंप के एलान का बाहें फैलाकर स्वागत किया। ये वही मारिया माचाडो हैं जिन्होंनें अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के लिए वेनेजेुएला की संप्रभुता प्लेट में सजाकर अमेरिका के सामने रख दी। ये वही मारिया माचाडो हैं जिन्होंने कहा अमेरिका को हमारे देश पर आर्थिक प्रतिबंध लगा देना चाहिए। और तो और अमेरिका की शह पर उन्होंने अवैध तरीके से एक अंतरिम सरकार तक की स्थापना कर डाली जिसकी राष्ट्रपति वो ख़ुद बन बैठीं। ये वही मारिया माचाडो हैं जिन्होंने इज़राइल में वेनेजुएला का दूतावास खोले जाने की खुली वकालत की। ये वही मारिया माचाडो हैं जो चाहती हैं कि वेनेजुएला के प्राकृतिक संसाधनों को अमेरिका समर्थित बड़े कॉरपोरेट्स के हवाले कर देना चाहिए। छोटे कारोबारियों से नफ़रत करने वाली मारिया माचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार मिलना एक ऐसी घटना है जिसपर ख़ुद वेनेजुएला के लोग स्तब्ध हैं।

 ।इसीलिए मिशेल एलनर कह रहे हैं कि जब मारिया कोरिना मचाडो जैसे दक्षिणपंथी नोबेल पुरस्कार जीतते हैं, तो ‘शांति’ का कोई मतलब नहीं रह जाता।वेनेजुएला के ग़रीब, साधारण और लोकतंत्र पसंद लोगों की नजरों में मारिया माचाडो अमेरिका की दलाल हैं। नोबेल कमेटी ने उन्हें शांति का पुरस्कार देकर डोनाल्ड ट्रंप को ख़ुश कर दिया है। वो सिर्फ नाटक कर रहे हैं नाराजगी का। यहां ट्म्प की खुशी मायने नहीं रखती है।यक़ीनन दुनियां के इस सबसे बड़ा पुरस्कार ने अपनी गरिमा चकनाचूर कर दी है।

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