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*अमेरिका की दादागिरी,वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी*  

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रामस्वरूप मंत्री 

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी इस बात की तस्दीक करती है कैसे महाशक्तियां अपने हितों के लिए नैतिकता की परवाह नहीं करतीं. वेनेजुएला के प्राकृतिक संसाधनों पर अमेरिकी प्रभुत्व की लालसा, कमजोर देशों पर उसकी दादागिरी को उजागर किया है. वेनेजुएला संकट, एक तरह से न्याय का हनन और ‘सुपरपावर’ की मनमानी है.अमेरिका ने वेनेजुएला में अपनी सेना भेज कर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को गिरफ्तार करवा कर न्यूयार्क बुलवा लिया. अब जिनको इसमें नैतिकता-अनैतिकता के पेंच देखने हैं, देखते रहें. महाबली देश अपने हित देखते हैं. उन्हें नैतिकता या अनैतिकता में कोई भरोसा नहीं है. अमेरिका ही क्यों रूस और चीन भी यही करते हैं. पिछले चार वर्ष से रूस के राष्ट्रपति पुतिन यूक्रेन से युद्ध कर रहे हैं. यूरोप के सभी देश और अमेरिका पुतिन का विरोध कर रहे हैं लेकिन पुतिन मोर्चा खोले हैं. चीन रोज ताइवान को धमकाता है मगर कोई भी देश उसका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहा. यही कारण है कि मादुरो को उनके देश से उठवा कर भी ट्रंप चौड़े हो रहे हैं.

वेनेजुएला के राष्‍ट्रपति निकोलस मादुरो को अमेरिका द्वारा हिरासत में लेने के बाद से ही वहां का कच्‍चा तेल चर्चा में है. दुनिया का मानना है कि अमेरिका और ट्रंप भले ही मादुरो को पकड़ने के लिए कुछ भी तर्क दे, असल वजह तो वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार ही हैं, जिन पर अर्से से अमेरिका की नजर थी. अमेरिका की योजना दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक को फिर से चालू करना और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करना है. हालांकि, इस योजना को धरातल पर उतारना अमेरिका के लिए आसान नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि वेनेजुएला की ज़मीन से काला सोना निकालना अब केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि 100 अरब डॉलर का एक ऐसा जोखिम भरा निवेश है जिसकी सफलता की कोई गारंटी नहीं है. फिलहाल ट्रंप के लिए वेनेजुएला का तेल भंडार एक ऐसे खजाने की तरह है जिसकी चाबी तो मिल गई है, लेकिन जिस तिजोरी में यह बंद है, वह पूरी तरह जंग खा चुकी है और उसे खोलना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है.राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के 12 साल के शासनकाल और उससे पहले ह्यूगो चावेज़ के दौर में भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और निवेश की भारी कमी ने इस ‘सोने की खान’ को कबाड़ में बदल दिया है. राइस यूनिवर्सिटी के बेकर इंस्टीट्यूट फॉर पब्लिक पॉलिसी के अनुसार, वेनेजुएला का तेल उत्पादन जो 1974 में 40 लाख बैरल प्रतिदिन था, अब घटकर महज 10 लाख बैरल रह गया है. तेल क्षेत्रों में आग लगने की घटनाएं, चोरी और उपकरणों का रखरखाव न होना आम बात हो गई है. हालत यह है कि जिस तेल बंदरगाह पर पहले सुपरटैंकर एक दिन में लोड हो जाते थे, वहां अब उपकरणों की खराबी के कारण पांच-पांच दिन लग रहे हैं.

पाइपलाइनों का विशाल नेटवर्क लीक हो रहा है और कई जगहों पर तो सरकारी कंपनियों ने ही पाइपों को उखाड़कर कबाड़ के रूप में बेच दिया है. इस बुनियादी ढांचे को फिर से खड़ा करने के लिए अगले एक दशक तक हर साल कम से कम 10 अरब डॉलर के निवेश की आवश्यकता होगी. वेनेजुएला का ओरिनोको बेसिन (Orinoco Basin) दुनिया के सबसे विशाल तेल भंडारों में से एक माना जाता है, जहां करीब 500 अरब बैरल तेल होने का अनुमान है. लेकिन आज यह क्षेत्र उपेक्षा और अपराध का केंद्र बन चुका है. वहां लगे ड्रिलिंग रिग्स  लावारिस छोड़ दिए गए हैं. ड्रिलिंग पैड्स से कीमती पुर्जे दिनदहाड़े लूटे जा रहे हैं और उन्हें काले बाजार में बेचा जा रहा है.

ट्रंप प्रशासन की योजना है कि एक्सॉन मोबिल, शेवरॉन और कोनोकोफिलिप्स जैसी दिग्गज कंपनियों को यहां फिर से काम पर लगाया जाए. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का मानना है कि अमेरिकी कंपनियां इस भारी कच्चे तेल को निकालने में खूब रुचि दिखाएगी, क्योंकि यह अमेरिकी गल्फ कोस्ट की रिफाइनरियों के लिए तकनीकी रूप से सबसे उपयुक्त है. लेकिन सवाल यह है कि क्या कंपनियां उस क्षेत्र में निवेश करेंगी जहां सुरक्षा का कोई नामोनिशान नहीं है?

राजनीतिक अस्थिरता निवेश के रास्ते का सबसे बड़ा कांटा

तेल कंपनियां मुनाफा चाहती हैं, लेकिन उससे पहले वे स्थिरता चाहती हैं. वेनेजुएला में फिलहाल जो राजनीतिक संक्रमण चल रहा है, वह बेहद धुंधला है. निकोलस मादुरो को अमेरिकी सैनिकों द्वारा हिरासत में लिए जाने के बाद वहां सत्ता का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है. हालांकि ट्रंप का कहना है कि अब उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज सत्ता संभाल रही हैं, लेकिन उन्हें मादुरो की करीबी माना जाता है. सरकारी तेल कंपनी पीडीवीएसए के पूर्व प्रबंधकों का स्पष्ट कहना है कि जब तक देश में एक नई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नेशनल असेंबली नहीं बनती, तब तक कोई भी बड़ी कंपनी अरबों डॉलर लगाने का जोखिम नहीं लेगी. कंपनियां यह सुनिश्चित करना चाहती हैं कि उनके द्वारा किए गए अनुबंध भविष्य में किसी नई सरकार द्वारा रद्द नहीं किए जाएंगे, जैसा कि चावेज़ के दौर में हुआ था.

ट्रंप की योजना की सफलता काफी हद तक उन कंपनियों पर निर्भर है जिनका वेनेजुएला के साथ पुराना और कड़वा इतिहास रहा है. 2000 के दशक के मध्य में ह्यूगो चावेज़ ने एक्सॉन मोबिल और कोनोकोफिलिप्स की संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. इन कंपनियों को आज भी अपने अरबों डॉलर के मुआवजे और बकाया ऋण का इंतजार है. फिलहाल केवल शेवरॉन ही एक विशेष लाइसेंस के तहत वहां काम कर रही है और कुल उत्पादन का 25% हिस्सा संभाल रही है. एक्सॉन और कोनोकोफिलिप्स जैसी कंपनियों ने अभी तक ट्रंप की योजना पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है. वेनेजुएला में दोबारा प्रवेश करने से पहले ये कंपनियां न केवल मुआवजे की मांग करेंगी, बल्कि भविष्य के लिए लोहे जैसी मजबूत कानूनी सुरक्षा भी चाहेंगी.

डोनाल्ड ट्रंप ने इस मिशन के लिए अपनी सबसे मजबूत टीम को मैदान में उतारा है. आंतरिक मंत्री डग बर्गम और ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट को अमेरिकी तेल कंपनियों की रुचि का आकलन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. ये दोनों ट्रंप की ‘नेशनल एनर्जी डोमिनेंस काउंसिल’ के सर्वेसर्वा हैं. इनका प्राथमिक लक्ष्य अमेरिका को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना और रूस या मध्य पूर्व के देशों पर निर्भरता कम करना है.

अमेरिकी रणनीति यह है कि वेनेजुएला के तेल उत्पादन को फिर से 30-40 लाख बैरल प्रतिदिन तक ले जाया जाए, जिससे वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें कम हो सकें और अमेरिका का दबदबा बढ़े. लेकिन भू-राजनीतिक विशेषज्ञ क्लेटन सीगल का मानना है कि जब तक अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी और प्रतिबंधों का दौर खत्म नहीं होता, तब तक कोई भी ठोस निवेश जमीन पर नहीं दिखेगा.

इसमें कोई शक नहीं कि जिस तरह से वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस को उठवाया गया वह न्यायसंगत नहीं है. पर आगे कौन आए, सब चुप हैं. यह अपने आप में अनहोनी है. मादुरो के शासन में कितनी भी गड़बड़ियां हों, वे अमेरिका को ड्रग और हथियारों की तस्करी करवाते हों फिर भी वे एक स्वतंत्र देश के राष्ट्रपति हैं. वेनेजुएला खुद भी संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है इसलिए यदि अमेरिका के राष्ट्रपति को उनसे कोई दिक्कत थी तो वे विश्व मंच पर जा सकते हैं. अपने से सजा देना एक तरह से युद्ध अपराध है. लेकिन ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं’ की तर्ज पर अमेरिका की इस हेकड़ी को पूरी दुनिया स्तब्ध सी देखती रह गई. बाद में रूस, चीन, उत्तर कोरिया आदि देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस कार्रवाई की कड़ी निंदा तो की. मगर अमेरिका का कुछ बिगड़ा!

1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका को चुनौती देने वाला कोई देश नहीं रहा इसलिए अमेरिका ने हर उस राष्ट्र को आड़े हाथों लिया जो उसके व्यापार के रास्ते में बाधा था. अमेरिका ने इराक के राष्ट्रपति के साथ भी यही सलूक किया था. क्यूबा के साथ किया, लीबिया के साथ किया. मगर आज रूस और चीन मिल कर ऐसी शक्ति बन गए हैं, जो अमेरिका को चुनौती देने में सक्षम हैं. इसलिए अमेरिका हर क्षण इनसे भयभीत रहता है और हर उस राष्ट्र को दबाने की कोशिश करता है जो रूस और चीन के निकट जा रहे हो. अमेरिका की देखादेखी ये राष्ट्र भी कमजोर और विरोधी राजनीतिक विचार वाले राष्ट्रों में दखल करते हैं. रूस ने यूक्रेन से इसलिए युद्ध छेड़ा क्योंकि उसे आशंका थी कि यूक्रेन अमेरिकी लॉबी के साथ जा रहा है. यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की अमेरिकी संधि से बंधे देशों के संगठन NATO में जाने की इच्छा जताते भी रहे हैं.

दादागिरी में अमेरिका सबसे ऊपर
यह अलग बात है कि उसे NATO में जगह नहीं मिली और खुद NATO भी अब मात्र दिखावे का रह गया है. अमेरिका स्वयं भी अब NATO को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रहता. नाटो संधि से जुड़े देश भी डोनाल्ड ट्रंप के मनमाने फरमानों से परेशान हैं. मगर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सीलिया फ्लोरेस को उठवा कर अमेरिका ने बता दिया कि दादागिरी में वह सबका उस्ताद है. रात को अमेरिकी सैनिक वेनेजुएला गए और राष्ट्रपति के आवास से उनको उठा लिया. न्यूयार्क लाकर दोनों को डिटेंशन सेंटर में रखा गया है. अब उन पर ड्रग और हथियारों की तस्करी के मामले में मुकदमा चलेगा. यहां प्रश्न यह उठता है कि अमेरिकी प्रशासन किस अधिकार से यह मुकदमा चलाएगा. वेनेजुएला कैरेबियन देशों में सर्वाधिक प्राकृतिक सम्पदा है और अमेरिका की नजर इसी पर है.

लैटिन अमेरिकी देशों पर ट्रंप की नजर
उत्तरी और दक्षिण अमेरिका के बीच में स्थित लातिन अमेरिकी देशों की भू राजनीतिक स्थिति तथा उनमें मौजूद नेचुरल रिसोर्सेज अमेरिका (USA) की आंखों में चुभते रहे हैं. वह येन-केन-प्रकारेण इन कैरेबियन देशों को अपने चंगुल में रखने का इच्छुक रहा है. ग्वाटेमाला, डोमेनिकन गणराज्य, क्यूबा, बहामास, बारबडोस, त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे देश तो अमेरिका का विरोध करने की स्थिति में नहीं बचे हैं. ग्वाटेमाला में अमेरिका ने 1954 में जैकोबो अरबेज का तख्ता पलट किया था. डोमेनिकन गणराज्य पर 1965 में आक्रमण किया ताकि प्रगतिशील समाजवादी विचारधारा वाली सरकार वहां सत्ता पर न आ जाए. लैटिन अमेरिकी क्षेत्रों और कैरेबियन देशों से निश्चिंत होने के बाद उसकी नजर अब दक्षिण अमेरिकी देशों पर है. इसका पहला निशाना वेनेजुएला बना. यूं भी वेनेजुएला में मादुरो की सरकार समाजवादी विचारों वाली थी.

मादुरो वेनेजुएला को उबार नहीं सके
वेनेजुएला अपनी प्राकृतिक संपदा के चलते विश्व के सर्वाधिक संपन्न देशों में से एक था. मगर वहां की शासन व्यवस्था विफल रही और खजाने से रेवड़ियां बांटी गईं. मुफ्त खजाना लुटाने से इस संपन्न लैटिन अमेरिकी देश की आर्थिक स्थिति जर्जर हो चुकी है. मादुरो अपने शासन काल में इसे उबारने में विफल रहे. फिर भी इसके लिए वहां के लोगों को मादुरो के विरुद्ध पहल करनी थी. चुनाव निष्पक्ष हों इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में कोई कमेटी बनाई जाती पर अमेरिका का चौधरी बनना सभी को खल है. इसलिए दबी जुबान से ही सही अमेरिकी लॉबी के देशों ने भी ट्रंप के इस कदम का विरोध किया है. रूस, चीन, उत्तर कोरिया का तो खैर अमेरिकी विरोधी गुट है ही मगर फ्रांस ने भी मादुरो की गिरफ्तारी की निंदा की है. भारत ने इस मामले में कूटनीतिक प्रतिक्रिया दी है.

भारत को फंसा 8300 करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद
यूं भी वेनेजुएला में भारत की तेल कंपनी ONGC का प्रोजेक्ट है. वेनेजुएला को उसे एक बिलियन डॉलर (8300 करोड़ रुपये) देने हैं लेकिन मादुरो इस भुगतान को लटकाये थे. अब भविष्य में यदि अमेरिकी देख रेख में नई सरकार बनी तो भारत को अपनी फंसी रकम वापस पाने की उम्मीद बंधेगी. अमेरिका का आज विश्व के लगभग सभी बड़े पेट्रो तेल उत्पादक देशों पर नियंत्रण है. वेनेजुएला में तेल के भंडार दुनिया में सबसे अधिक हैं, अब मादुरो को गिरफ्तार कर लेने से वेनेजुएला में जो भी सरकार बनेगी, वह अमेरिकी निर्देशों पर काम करेगी. इससे रूस और चीन दोनों घबराए हुए हैं. रूस इसलिए क्योंकि वह तेल निर्यातक है और अभी तक वेनेजुएला की सरकार उसके अनुकूल थी अब मामला पलट जाएगा. चीन इसलिए क्योंकि वेनेजुएला में चीन की भी रिफाइनरी है, उनका काम अटक जाएगा इसलिए इन देशों में घबराहट है.

वेनेजुएला से पलायन
करीब सवा नौ लाख वर्ग किमी में फैला वेनेजुएला दक्षिण अमेरिका महाद्वीप का एक उष्ण कटिबंधीय देश है. इसकी मुख्य भाषा स्पेनिश है. इसके पूर्व में गुयाना, पश्चिम में कोलम्बिया, उत्तर में कैरिबियाई देश और दक्षिण में ब्राजील देश है. यह अटलांटिक और प्रशांत महासागर के बीच सेतु का काम करता है. 1811 में इसे स्पेन से स्वतंत्रता मिली थी. बाद में यहां कच्चे तेल के अकूत भंडार मिले. भारत से इसकी मित्रता रही है पर यहां की सरकार द्वारा मुफ्त में चलाई गई तमाम योजनाओं के कारण बेरोजगारी, गरीबी भी चरम पर आ गई. इसीलिए वेनेजुएला से भारी संख्या में आबादी का पलायन होता है और ये लोग अमेरिका जाते हैं.

फ्लोरेस की गिरफ्तारी से गुस्सा
जब अमेरिका की प्रवर्तन टीम के सैनिकों ने राष्ट्रपति मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार किया तब वेनेजुएला की राजधानी कराकस की सड़कों पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं दिखीं. मादुरो समर्थकों में गुस्सा था और वे शोक में डूबे थे वहीं उनके विरोधी Libertad, libertad! के नारे लगाते हुए झंडे लहरा रहे थे. मादुरो की पत्नी सीलिया की देश में काफी प्रतिष्ठा थी. उनके टीवी कार्यक्रम Con Cilia en Familia घरेलू गर्माहट और मातृत्व का चेहरा दिखाता था, जबकि आलोचक उन्हें भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का प्रतीक मानते थे. सीलिया फ्लोरेस की गिरफ्तारी के विरोध में यूरोपीय नेताओं ने भी गुस्सा जताया है. फ्रांस के बाद जर्मनी के चांसलर ने भी इसे उचित नहीं माना. यूरोपीय लोगों को यह भी भय है कि भविष्य में ट्रंप कनाडा को भी हड़प सकते हैं. क्यूबा को भी वे निशाना बनाएंगे.

कनाडा को टैरिफ से कंट्रोल करेंगे
अमेरिका के लोग मादुरो की गिरफ्तारी को अनुचित नहीं मानते. खुद वेनेजुएला से अमेरिका आ कर बसे लोग भी ट्रंप के इस कदम को सही ठहराते हैं. न्यूजर्सी के उद्यमी और भारतीय प्रवासियों में लोकप्रिय चरण सिंह कहते हैं कि पिछले चुनाव में खुद मादुरे गलत तरीकों का इस्तेमाल कर जीते थे. उनका चुनाव गैर कानूनी था इसीलिए मादुरे की घोर विरोधी मारिया कोरिना मचाडो को 2025 का नोबल प्राइज मिला. उन्होंने बताया कि जो लोग कह रहे हैं अब वेनेजुएला जैसी गत कनाडा की होगी तो बता दूं यह भ्रम है. उनके अनुसार कनाडा में राजनीतिक स्थिति इतनी गड़बड़ नहीं है. यूं भी कनाडा एक लोकतांत्रिक देश है. डोनाल्ड ट्रंप धमकी भले दें पर कनाडा को कभी वे अपना 51 वां राज्य नहीं बना पाएंगे क्योंकि कनाडा कामनवेल्थ देश है और उसका संवैधानिक प्रमुख इंग्लैंड का राजा है इसलिए कनाडा के साथ ऐसा नहीं करेंगे, उसे टैरिफ से कंट्रोल करेंगे.

क्यूबा का संकट
पेंसिलवानिया स्टेट में वैज्ञानिक प्रोफेसर महेंद्र सिंह के अनुसार, कनाडा को हड़पना कतई संभव नहीं है. कनाडा को अमेरिकी लोग अपनी ही बिरादरी का और छोटा भाई मानते हैं. दूसरे वह श्वेत लोगों का देश है. दोनों में भाषायी और सांस्कृतिक तथा एथिनिक एकता है. इसके अतिरिक्त कनाडा की आबादी भले कम हो पर एरिया अमेरिका से ज़्यादा है. इसलिए वह कनाडा को टारगेट नहीं करेगा. अमेरिका का अगला निशाना ईरान हो सकता है. महेंद्र सिंह ने कहा कि वामपंथी विचारों वाले राजनीतिक कारणों से अमेरिकी कार्रवाई पर हंगामा करते हैं पर सच यह है कि वेनेजुएला के लोग इस कार्रवाई से खुश हैं. निकोलस मादुरे ने अपने देश को चौपट कर दिया था. यही स्थिति क्यूबा की है. उनके अनुसार क्यूबा के कम्युनिस्ट शासन में शिक्षा, स्वास्थ्य फ्री है मगर रोजगार नहीं है, लोग गरीब हैं इसीलिए क्यूबा के लोग भी भाग-भाग कर अमेरिका आते हैं.फिलाडेल्फिया के आईटी प्रोफेशनल अतुल अरोड़ा के अनुसार, ट्रंप अमेरिका फर्स्ट की अपनी पॉलिसी पर चल रहे हैं. उनके लिए वेनेजुएला पर नियंत्रण आवश्यक था. चीन जिस तरह से वेनेजुएला में इन्वेस्ट कर रहा था, उससे आशंका थी कि एक दिन मादुरे अपने देश को चीन के हाथों सौंप देंगे. यूं भी चीन जिस किसी देश में इन्वेस्ट करता है या कोई कारखाना लगाता है, उससे उस देश को कोई लाभ नहीं होता. वह अधिकारी से लेकर सफाई कर्मचारी तक अपने देश से लाता है. इस तरह चीन उस देश के नेचुरल रिसोर्सेस का इस्तेमाल तो करता है पर उसका लाभ उस देश को नहीं मिलता इसलिए भी वेनेजुएला के लोग मादुरे के विरोध में थे. उनके अनुसार भी डोनाल्ड ट्रंप कनाडा को तो नहीं पर अब वे एशियाई देश ईरान में दखल करेंगे

(लेखक इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार और समाजवादी पार्टी मध्य प्रदेश के महासचिव हैं) 

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