अग्नि आलोक

आजादी का अमृत महोत्सव-गवालियर के गनेशी लाल ने गांधी जी की हजामत बनाई 

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।। डॉ. राम विद्रोही ।।

ग्वालियर में कांग्रेस के जनाधार को संगठित कर उसे विस्तारित करके प्रभावी बनाने में कर्मठ स्वतंत्रता सेनानी गणेशी लाल का अविस्मरणीय योगदान रहा है। इस लिहाज से उन्हें कांग्रेस के प्रथम पुरूष मान लेने में किसी प्रकार की अतिश्योक्ति नहीं होगी। स्वतंत्रता पूर्व और बाद में गणेशी लाल की प्रेरणा से कई लोग कांग्रेस के साथ जुडे, सत्ता और संगठन के ऊंचे पदों तक भी पहुंचे पर वह गणेशी लाल को भूल गए और गणेशी लाल जीवन पर्यन्त कांग्रेस का झण्डा उठाए पार्टी के नींव के पत्थर ही बने रहे। गणेशी लाल की आर्थिक स्थिति अत्यन्त कमजोर थी, पेशे से वह हजामत बनाने का काम करते थे। ऐसे संकटापूर्ण हालातों में उन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष में जो योगदान दिया उसके सामने किसी अन्य का त्याग तुच्छ लगता है। गणेशी लाल ग्वालियर के एक मात्र ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे जिन्हें गांधी जी के सानिद्य में उनके आश्रम में रहने का सौभाग्य मिला था।

आश्रम में रहते हुए वह गांधी जी की दाढी और हजामत बनाया करते थे। इस के लिए गणेशी लाल ने गांधी से आग्रह किया था जिसे उन्होंने सहजता से स्वीकार कर लिया। जिस चादर पर वह गांधी जी को हजामत और दाढी बनाने के लिए बैठाते थे वह चादर, उस्तरा, केंची और बाल कटिंग मशीन को उन्होंने अपनी आखरी सांस तक सहेज कर रखा। गणेशी लाल जैसे निर्धनतम व्यक्ति के लिए तो यह उसके जीवन की अनुपम और अमूल्य सम्पत्ति थी। उन्होंने अपनी इस पूंजी को न केवल सहेज कर रखा बल्कि लोगों को भी बडे गर्व के साथ यह बताते थे कि उन्होंने इस चादर पर बैठा कर गांधी की दाढी और हजामत बनाई थी, यह उस्तरा, केंची और यह बाल काटने की मशीन थी। आश्रम में रहते हुए गणेशी लाल के मन में कभी यह ख्याल ही नहीं आया होगा कि वह जिस व्यक्ति की सेवा कर रहे हैं वह कालजयी इतिहास पुरूष है। गणेशी लाल के मन में भले ही ऐसा कोई ख्याल न आया हो, क्यों कि वह तो गांधी जी की सेवा मान कर ही यह काम कर रहे थे किन्तु उस समय के कठोर काल ने उन्हें इतिहास का एक पात्र तो स्वीकार कर ही लिया। ग्वालियर के मुरार उप नगर में जोहरी लाल घर में सन 1912 में जन्मे गणेशी लाल के परिवार का गुजारा उनके परम्परागत पेशे से ही होता था। किशोरावस्था से ही गणेशी लाल अपने इस पुश्तैनी धंधे से जुड गए थे। अपनी व्यवहार कुशलता के कारण गणेशी लाल का सम्पर्क कई ऐसे लोगों से होता गया जो देश की आजादी के लिए कई तरीकों से संघर्ष कर रहे थे। उन लोगों के विचारों  के प्रभाव और उनके साहसिक कार्यों ने किशोर गणेशी लाल के  मन में राष्ट्रीय विचारों का संचार किया जो धीरे धीरे मजबूत होता गया। गणेशी लाल की दुकान मुरार के सदर बाजार में हुआ करती थी, स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य केन्द्र भी मुरार ही रहा था जिसका प्रशासन सीधे अंग्रेजों के अधीन था। गणेशी लाल की दुकान पर ग्राहकों के अलावा अन्य लोगों का भी जमघट लगा रहता था और वहां स्वतंत्रता संघर्ष को लेकर सूचनाओं का आदान प्रदान होता रहता था, वहां आजादी को लेकर बहसें भी होती थीं। रोजाना शाम को गणेशी लाल की दुकान एक तरह से स्वतंत्रता समर्थकों की बैठक में बदल जाया करती थी। गणेशी लाल के ग्राहकों में मुरार के प्रशासक किचलू भी हुआ करते थे। उनके कानों तक भी गणेशी लाल की दुकान से चलने वाली गतिविधियों की खबरें पहुंचती थी। मामला दरबार (महाराजा सिंधिया) तक पहुंच गया और अन्तत: गणेशी लाल की सदर बाजार की दुकान बन्द हो गई। गणेशी लाल सन 1932 से ही राष्ट्रीय कार्यों में सक्रिय हो गए थे और खादी के वस्त्र पहनने लगे थे। एक तरह से वह गांधी जी पर मुग्ध हो थे। जिस का प्रभाव उनकी आखरी सांस तक दिखाई देता रहा। जब आम तौर पर कांग्रेसियों ने गांधी टोपी पहनना बन्द कर दिया था तब भी गणेशी लाल जी सिर पर हमेशा गांधी टोपी चमकती रही। वह उस समय के उन चुनिन्दा स्वतंत्रता सेनानियों में से थे जिन्होंने सब से पहले खादी और गांधी टोपी को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया था।  

प्रसिद्ध साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी और समता संस्कृति के चिन्तक जगन्नाथ प्रसाद मिलिन्द ने महा पुरूषों के संस्मरण पुस्तक में गाण्ेशी लाल के गांधी आश्रम में जाने का उल्लेख किया है। मिलिन्द जी लिखते हैं कि मुरार के स्वतंत्रता सेनानी गणेशी लाल एक दिन उनसे मिलने आए और गांधी जी के आश्रम में कुछ दिन रहने, वहां का जीवन सीखने और गांधी जी की सेवा करने की इच्छा व्यक्त की। मिलिन्द जी शांतिनिकेतन में अध्यापक रह चुके थे और वह गांधी जी आश्रम में अध्यापक भी रहेथे इस लिए गणेशी लाल चाहते थे कि वह गांधी जी को पत्र लिख कर उनके आश्रम आने की स्वीकृति प्राप्त कर लें। मिलिन्द जी ने काफी संकोच के साथ गांधी जी को पत्र लिखा और उन्होंने गणेशी लाल को आश्रम में आने की अनुमति दे दी। गणेशी लाल जी के लिए तो यह अविस्मरणीय और रोमांचक अनुभव तो था ही पर मिलिन्द जी भी गांधी जी की उदारता और सरलता के कायल हो गए। मिलिन्द जी ने लिखा है कि गणेशी लाल जैसे सामान्य व्यक्ति को महत्व दे कर गांधी जी ने उनके जीवन को अवश्य ही स्तुत्य बना दिया। इन्ही क्षणों में गणेशी लाल ने नियमो का पालन करते हुए आश्रम की सेवा करने के साथ साथ गांधी जी की भी सेवा करने की इच्छा उनके सामने व्यक्त की तो गांधी जी ने इसे सहज ही स्वीकार कर लिया। इस के बाद जब भी गांधी जी आश्रम में रहे, गणेशी लाल उनकी दाढी और हजामत बनाते रहे। गांधी जी के  बैठने वाली चादर, दाढी बनाने का उस्तरा, बाल बनाने की मशीन और केंची यह सभी वस्तुएं गणेशी लाल जी ने जीवन भर सहेज कर रखीं। क्यों कि उनके पास जीवन की यही सब से बडी अमूल्य सम्पदा थी।

भारत छोडो आंदोलन में संघर्ष करते हुए 28 अगस्त 1942 को गणेशी लाल को गिरफ्तार किया गया। उनके साथ सत्याग्रह करते हुए अन्य बीस स्वतंत्रता सेनानियों को भी गिरफ्तार किया गया था जिन में विजय गोविन्द द्विवेदी, कवि रत्न पाराशर और रविदत्त शर्मा आदि प्रमुख थे। वह 30 जून 1943 को अन्य स्वतंत्रता सेनानियों के साथ जेल से रिहा किए गए। इस दौरान उन्हें ग्वालियर, सबलगढ और मुंगावली जेल में बन्दी बना कर रखा गया। विपरीत पारिवारिक परिस्थितियों में भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले गणेशी लाल को उनके अवदान का कुछ भी प्रतिफल नहीं मिला। उनका हाथ पकड कर कई लोग सत्ता के शिखर तक पहुंचे लेकिन गणेशी लाल के मन में कभी इस बात का मलाल तक नहीं आया। हालांकि गांधी जी की दाढी और हजामत बनाने के कारण गणेशी लाल की प्रसिद्धि कांग्रेस के बडे नेताओं को तक भी थी। जवाहर लाल नेहरू उनसे व्यक्तिगत परिचित थे। इस के बाद भी गणेशी लाल हमेशा कांग्रेस की नींव के पत्थर ही बने रहे और कभी इस की शिकायत नहीं की। चाहते तो वह भी सत्ता का सुख भोग सकते थे, उनके सामने ऐसा अवसर भी था पर उन्होंने याचक की तरह कभी किसी से कुछ नहीं मांगा और आजादी के बाद भी गरीबी में ही जीवन जीते रहे। वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली द्वारा सम्पादित पुस्तक- महासमर के योद्धा में कक्का डोंगर सिेह ने भी अपने संस्मरण में कहा है कि वह स्वयं और अन्य कई बडे नेता गणेशी लाल जी की प्रेरणा से ही कांग्रेस में शामिल हुए। भारत छोडो आंदोलन के बाद जेल से रिहा होने पर गणेशी लाल ने मुरार बरादरी स्थित अपना मकान कांग्रेस को दान कर दिया। गणेशी लाल का मकान कच्ची पाटोर का ही था और उसके साथ कुछ खुली जमीन भी थी, यहां पर पक्का निर्माण पूर्व मंत्री राजेन्द्र सिंह ने कराया था। आज भी मुरार की बारादरी में कांग्रेस का दफ्तर गणेशी लाल से दान में मिले मकान में ही चलता है। गणेशी लाल के जन्म शताब्दि वर्ष पर सन 1912 में समाजवादी चिन्तक रघु ठाकुर जी की पहल पर कुछ सामाजिक संगठनों ने बारादरी चौराहे पर गणेशी लाल जी की प्रतिमा लगाने का अभियान चलाया था लेकिन राजनीतिक समर्थन के अभाव में यह अपने नतीजे तक नहीं पहुंच सका। शायद गणेशी लाल जैसे सामान्य हैसीयत के स्वतंत्रता सेनानी राजसत्ता की दृष्टि में इस योग्य नहीं हैं कि किसी प्रमुख सार्वजनिक स्थान पर उनकी प्रस्तर प्रतिमा स्थापित की जा सके। क्यों कि हमारे राजतंत्रीय लोकतंत्र ने इन स्थानों को विशिष्ठ व्यक्तियों की प्रतिमाओं के लिए ही आरक्षित कर लिया है। इसी तरह की प्रतिगामी सोच के कारण ग्वालियर अभी तक मानव सूचकांक के मामले में पिछडों में भी सब से अन्तिम छोर पर बना हुआ है।

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