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आरएसएस के उद्भव की सामाजिक-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : एक विश्लेषण

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तेजपाल सिंह तेज

          बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में भारतीय समाज कई स्तरों पर उथल-पुथल से गुजर रहा था। औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध स्वतंत्रता का संघर्ष तेज हो रहा था, वहीं भारतीय समाज के भीतर—विशेषकर जाति संरचना और धार्मिक पहचान—को लेकर गहरे बदलाव के संकेत भी दिखने लगे थे। इसी दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना (1925) हुई। यह लेख उस सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ को समझने का प्रयास करता है जिसमें आरएसएस का जन्म हुआ—विशेषकर दलित उभारसुधारवादी आंदोलनोंआर्य समाज की गतिविधियों, और ब्राह्मण समुदाय की सामाजिक चिंताओं के संबंध में प्रस्तुत तर्कों के आधार पर।

1. बीसवीं सदी की शुरुआत में विदर्भ और दलित चेतना का उदय:

          उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों और बीसवीं सदी के पहले दो दशकों में विदर्भ, विशेषकर   नागपुर क्षेत्र, सामाजिक परिवर्तन का प्रमुख केंद्र बन गया था। ज्योतिबा फुले के सत्यशोधक समाज, महार समुदाय के संगठनों, और उभरते हुए दलित नेतृत्व ने परंपरागत जाति-व्यवस्था को खुली चुनौती देना शुरू कर दिया था।

महत्वपूर्ण घटनाएँ व संगठन:

·        सत्यशोधक समाज की शाखाएं अमरावती, द्वारधा और अन्य क्षेत्रों में सक्रिय थीं।

·        महार महासभा (1908) — विट्ठल राव जी मून पांडे द्वारा स्थापित—ने शिक्षा, तर्क और सामाजिक समानता पर ज़ोर दिया।

·        1913, 1917 और 1920 के दलित सम्मेलन — जिनमें शिक्षा, रोजगार और सामाजिक न्याय की मांगों को प्रमुखता मिली।

·        1920: नागपुर सम्मेलन — शाहू महाराज के संरक्षण में आयोजित इस कार्यक्रम में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलितों की आत्म-मुक्ति और हिंदू धर्म की जातिगत संरचना की आलोचना प्रस्तुत की।

          इन आंदोलनों ने दलित समाज में आत्मसम्मान, शिक्षा और संगठन की नई चेतना जगाई। इससे समाज के पारंपरिक प्रभुत्व वाले वर्गों, विशेषकर ब्राह्मणों में असुरक्षा की भावना बढ़ी—यह तर्क कुछ शोधों में दर्ज है कि इसी पृष्ठभूमि ने “हिंदू धर्म पर खतरा” जैसी भाषा को जन्म दिया।

2. आर्य समाज और जाति-प्रथा पर विमर्श:

          आर्य समाज 19वीं और 20वीं सदी के प्रमुख सुधारवादी हिंदू संगठनों में से एक था, जिसके विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा।

आर्य समाज के दोहरे प्रभाव:

·        जाति-व्यवस्था की आलोचना – आर्य समाज जन्माधारित जाति को अस्वीकार करता था और ‘वर्ण’ के सिद्धांत को कर्म-आधारित बताता था।

·        शुद्धि आंदोलन – इसका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम या ईसाई समुदाय में गए लोगों को “पुनः हिंदू” बनाना था।

          इन दोनों ही प्रक्रियाओं ने सामाजिक तनाव बढ़ाए। आर्य समाज जाति-भेद पर प्रहार तो करता था, पर उसकी प्राथमिकता दलितों को अधिकार देना नहीं बल्कि हिंदू समुदाय का विस्तार करना थी। स्वामी श्रद्धानंद द्वारा चलाया गया शुद्धि-अभियान इसी दृष्टिकोण का उदाहरण था, जिसने बाद में धार्मिक ध्रुवीकरण को और तीखा किया और तबलीगी जमात के उभार को भी प्रेरित किया (1926–27)।

3. ब्राह्मण समुदाय की सामाजिक-राजनीतिक चिंता:

          नागपुर और विदर्भ क्षेत्र में उभरते दलित संगठनों, आर्य समाज की जाति-समालोचना, और सुधारवादी आंदोलनों ने पारंपरिक सामाजिक पदानुक्रम को चुनौती दी। ऐसे में उच्च-जातियों, विशेषकर ब्राह्मण समुदाय में यह आशंका उभरी कि जाति-व्यवस्था पर बढ़ते सवाल उनके सामाजिक-धार्मिक वर्चस्व को कमजोर कर देंगे।

कुछ प्रमुख कारण:

·        दलित संगठनों का तेज़ विस्तार।

·        जाति-आधारित विशेषाधिकारों को चुनौती।

·        सुधारवादियों—जैसे राजा राम मोहन राय, विवेकानंद—द्वारा कर्मकांड और सामाजिक रूढ़ियों की आलोचना।

·        औपनिवेशिक शासन के कारण आधुनिक शिक्षा व वैज्ञानिक दृष्टि का प्रसार।

          यह वही सामाजिक वातावरण था जिसमें “हिंदू धर्म खतरे में है” जैसी राजनीतिक भाषा का प्रयोग बढ़ा। विभिन्न वर्गों को एक बड़े “हिंदू पहचान” के भीतर संगठित करना इसी प्रतिक्रिया का हिस्सा माना जाता है।

4. आरएसएस का गठन और उसका सामाजिक आधार:

          1925 में केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा नागपुर में आरएसएस की स्थापना इन्हीं जटिल परिस्थितियों में हुई। प्रारंभिक नेतृत्व का बड़ा हिस्सा उच्च-जाति विशेषकर ब्राह्मण पृष्ठभूमि से था—जैसे बी.एस. मुंजे, गोळवलकर, सावरकर (यद्यपि सावरकर औपचारिक तौर पर RSS के सदस्य नहीं थे, परंतु वैचारिक प्रेरणा का स्रोत थे)।

आरएसएस की स्थापना के पीछे बताई जाने वाली प्रमुख प्रेरणा:

·        हिंदुओं को “समाजिक और सांस्कृतिक रूप से संगठित” करना।

·        ‘हिंदू पहचान’ के नाम पर विभिन्न जातियों को एक साझा ढांचे में लाना।

·        जातिगत संघर्षों पर “सामाजिक सद्भाव” की भाषा के माध्यम से पर्दा डालना।

·        सुधारवादी आंदोलनों और दलित उभार से उत्पन्न सामाजिक दबावों का सामना करना।

          आरएसएस जाति-व्यवस्था पर खुलकर आलोचना नहीं करता। उसकी प्राथमिकता सामाजिक संतुलन और ‘संस्कृतिक एकता’ के माध्यम से हिंदू समाज का संगठन रही। संगठन का शीर्ष नेतृत्व लंबे समय तक ब्राह्मण समुदाय के बीच केंद्रित रहा, जिसे आलोचक सामाजिक संरचना के संरक्षण का उदाहरण मानते हैं।

5. स्वतंत्रता के बाद : राजनीतिक प्रभाव और जाति-विमर्श:

          स्वतंत्र भारत में आरएसएस-प्रेरित संगठनों का विस्तार हुआ, जिसका राजनीतिक रूप भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रूप में दिखता है। सत्ता-संरचना में सवर्ण और उच्च-जाति नेतृत्व की प्रधानता, दलित-पिछड़े समुदायों पर हिंसा और भेदभाव की घटनाएँ, तथा आरक्षण संबंधी बहसें, इस पूरे विमर्श को आज भी प्रासंगिक बनाए रखती हैं। कई आलोचकों का मत है कि–

·        प्रतीकात्मक पदों पर दलित-पिछड़े नेताओं की नियुक्ति तो होती है, पर निर्णय-सत्ता उच्च-जातियों के हाथ में केंद्रित रहती है।

·        आरक्षण और समान अवसरों पर लगातार दबाव बनाया जाता है।

·        शिक्षा, नौकरियों और संस्थाओं में हाशिए के समुदायों को कमजोर करने वाली नीतियाँ सक्रिय हैं।

          इन विश्लेषणों का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि जाति-संरचना का मूल स्वरूप आज भी अनेक क्षेत्रों में कायम है और उसे चुनौती देने वाले आंदोलनों का प्रभाव सीमित किया जाता रहा है।

        निष्कर्षतआरएसएस का उद्भव केवल धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान के प्रसार का परिणाम नहीं था। यह भारतीय समाज के भीतर गहरे सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों विशेषकर जातिगत सत्ता संरचनादलित उभारसुधारवादी विचारधारा, और समुदायों के बीच धार्मिक तनाव—का सम्मिलित परिणाम था। दलित आंदोलनों, आर्य समाज और अन्य सुधारवादी प्रयासों ने परंपरागत सामाजिक पदानुक्रम को चुनौती दी, जिसके प्रतिकार में ब्राह्मण नेतृत्व वाले संगठनों ने व्यापक “हिंदू एकता” की विचारधारा को आगे बढ़ाया। आरएसएस का गठन इसी ऐतिहासिक संदर्भ में हुआ और इसके प्रभाव आज भी भारतीय राजनीति व समाज में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

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